
#रांची #नगर_राजनीति : जनआंदोलनों से निकले नेतृत्व ने कैसे राजधानी रांची को पहली बार संवेदनशील और सहभागी शहरी शासन की दिशा दी।
- झारखंड गठन के बाद राजधानी रांची में निर्वाचित नगर निगम की मांग से उपजा जनआंदोलन।
- 2008 में गैर-दलीय आधार पर हुआ ऐतिहासिक नगर निगम चुनाव।
- रमा खलखो बनीं रांची की पहली आदिवासी महिला मेयर, लगभग 46 हजार मतों से विजय।
- स्वच्छता, परिवहन, आवास और राजस्व वृद्धि में नगर निगम को मिला नया आयाम।
झारखंड राज्य के गठन के बाद जब रांची को राजधानी बनाया गया, तब मेरे जैसे अनेक लोगों के मन में यह विश्वास जगा था कि अब इस शहर का समुचित और सुनियोजित विकास होगा। राजधानी का दर्जा अपने साथ उम्मीदें भी लाता है—बेहतर नागरिक सुविधाएं, जवाबदेह शासन और जनभागीदारी से चलने वाला प्रशासन। लेकिन उस समय यह साफ़ दिख रहा था कि जब तक तीसरे स्तर की सरकार, यानी निर्वाचित नगर निगम, अस्तित्व में नहीं आएगा, तब तक यह सारी उम्मीदें अधूरी ही रहेंगी।
इसी कारण नगर निकाय चुनाव को लेकर जनदबाव और आंदोलन तेज़ होते जा रहे थे। मैंने स्वयं देखा और महसूस किया कि किस तरह सामाजिक कार्यकर्ताओं और जन आंदोलनों से जुड़े लोगों ने सरकार पर लगातार दबाव बनाया। इन्हीं आंदोलनों के बीच से रमा खलखो का नेतृत्व उभरकर सामने आया। वे झारखंड जनाधिकार मंच के माध्यम से लगातार यह सवाल उठा रही थीं कि बिना निर्वाचित नगर निकाय के रांची का भविष्य अंधकारमय रहेगा।
2008 का चुनाव और ऐतिहासिक मोड़
आख़िरकार वर्ष 2008 में नगर निगम चुनाव की घोषणा हुई। यह चुनाव गैर-दलीय आधार पर हुआ, जिसने इसे और भी चुनौतीपूर्ण बना दिया। किसी भी प्रत्याशी के पास पार्टी का चुनाव चिन्ह या संगठनात्मक ढाल नहीं थी—सबको अपने व्यक्तित्व, संघर्ष और जनता के भरोसे पर चुनाव लड़ना था। रांची की मेयर सीट आदिवासी महिला के लिए आरक्षित थी, इसलिए यह तय था कि शहर को पहली बार एक आदिवासी महिला नेतृत्व देने जा रहा है।
इस ऐतिहासिक अवसर पर रमा खलखो ने चुनाव लड़ा और लगभग 46 हजार मतों के साथ विजय प्राप्त की। उस दिन मुझे यह महसूस हुआ कि रांची को सिर्फ़ एक मेयर नहीं मिली, बल्कि उसे एक ऐसा नेतृत्व मिला जो आंदोलनों की आग में तपकर आया था। इस तरह रांची को उसकी पहली आदिवासी महिला मेयर मिली—यह केवल एक राजनीतिक घटना नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय और लोकतंत्र की बड़ी उपलब्धि थी।
पहली निर्वाचित बोर्ड और जनता की उम्मीदें
यह भी पहली बार हुआ था कि मेयर और डिप्टी मेयर का सीधा चुनाव जनता ने किया। मतदान के प्रति आम लोगों का उत्साह अभूतपूर्व था। स्वाभाविक रूप से नगर निगम से अपेक्षाएं भी बहुत अधिक थीं। रमा खलखो के नेतृत्व में गठित पहली निर्वाचित बोर्ड ने अपने पाँच वर्षों के कार्यकाल में यह कोशिश की कि विकास का लाभ समाज के अंतिम पायदान पर खड़े व्यक्ति तक पहुँचे।
स्वच्छता और शहरी सेवाओं की नई शुरुआत
मुझे याद है कि उस समय रांची को स्वच्छ और सुंदर शहर बनाने का संकल्प लिया गया था। रमा खलखो के नेतृत्व में नगर निगम ने पहली बार सॉलिड वेस्ट मैनेजमेंट सिस्टम को व्यवस्थित ढंग से लागू किया। इसके लिए एटूजेड कंपनी का चयन किया गया। घर-घर कचरा उठाने की व्यवस्था शुरू हुई, प्रत्येक घर को गीले और सूखे कचरे के लिए अलग-अलग डस्टबिन दिए गए और कचरे का निष्पादन वैज्ञानिक पद्धति से इटकी डंप यार्ड में होने लगा। इससे शहर में स्वच्छता को लेकर एक नई चेतना पैदा हुई।
इसी कार्यकाल में शहरी जलापूर्ति योजना पर गंभीरता से काम शुरू हुआ। जेएनएनयूआरएम योजना के तहत नगर निगम ने पहली बार 70 सिटी बसों की खरीदारी की, जिससे सार्वजनिक परिवहन को नई गति मिली। बेघर और शहरी गरीबों के लिए मधुकम खादगढ़ा, मधुकम रुगड़ीगढ़ा, चिरौंदी और नामकुम में आवासीय योजनाएं शुरू की गईं। ये सभी प्रयास इस बात का प्रमाण थे कि इच्छाशक्ति हो, तो सीमित संसाधनों में भी बड़े बदलाव संभव हैं।
आर्थिक आत्मनिर्भरता की दिशा
मेरे लिए यह भी उल्लेखनीय रहा कि रमा खलखो के कार्यकाल में नगर निगम की आर्थिक स्थिति को सुदृढ़ करने पर विशेष ध्यान दिया गया। जब वे मेयर बनी थीं, तब नगर निगम का वार्षिक राजस्व लगभग 8 करोड़ रुपये था। भवन नक्शा स्वीकृति, होल्डिंग टैक्स और जलकर संग्रह व्यवस्था को दुरुस्त कर राजस्व बढ़ाने की दिशा में ठोस कदम उठाए गए। परिणामस्वरूप कुछ ही वर्षों में निगम की आय बढ़कर लगभग 15 करोड़ रुपये तक पहुँच गई। जब लोगों को बेहतर सुविधाएँ मिलने लगीं, तो उन्होंने भी कर भुगतान को अपनी जिम्मेदारी के रूप में स्वीकार किया।
आंदोलन से सत्ता तक की मिसाल
आज पीछे मुड़कर देखता हूँ, तो यह साफ़ समझ में आता है कि रमा खलखो का मेयर बनना रांची के शहरी इतिहास का एक महत्वपूर्ण मोड़ था। उनका नेतृत्व इस बात का उदाहरण है कि आंदोलन से निकला व्यक्ति सत्ता में आने के बाद भी संवेदनशील और जवाबदेह रह सकता है। यह कार्यकाल हमें यह भी सिखाता है कि लोकतंत्र केवल चुनाव जीतने का नाम नहीं, बल्कि जनता के भरोसे को नीतियों और कामों में बदलने की प्रक्रिया है।
रांची की पहली आदिवासी महिला मेयर के रूप में रमा खलखो का योगदान आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा रहेगा। यह हमें याद दिलाता है कि यदि नेतृत्व ज़मीन से जुड़ा हो, तो शहरों की दिशा और दशा दोनों बदली जा सकती हैं।
रमा खलखो एक बार फिर रांची नगर निगम मेयर पद के लिए चुनाव मैदान में हैं। उनके इस नए राजनीतिक प्रयास के लिए उन्हें हार्दिक शुभकामनाएं।
न्यूज़ देखो: रांची के शहरी लोकतंत्र की जीवंत मिसाल
रमा खलखो का पहला कार्यकाल यह दर्शाता है कि जब जनआंदोलन से निकला नेतृत्व प्रशासन की बागडोर संभालता है, तो शहरी विकास केवल योजनाओं तक सीमित नहीं रहता, बल्कि सामाजिक न्याय और भागीदारी का स्वरूप ले लेता है। हर खबर पर रहेगी हमारी नजर।
— हृदयानंद मिश्र (अधिवक्ता एवं वरिष्ठ कांग्रेस नेता)








