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संथाली भाषा में भारतीय संविधान का ऐतिहासिक प्रकाशन, ओल चिकी लिपि को मिला राष्ट्रीय सम्मान

#राष्ट्रपतिभवन #संथालीसंविधान : ओल चिकी लिपि में संविधान जारी होना आदिवासी समाज के लिए गौरवपूर्ण क्षण।

राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने राष्ट्रपति भवन में आयोजित कार्यक्रम में संथाली भाषा और ओल चिकी लिपि में भारतीय संविधान का विमोचन किया। यह पहली बार है जब देश का संविधान संथाली भाषा में आधिकारिक रूप से उपलब्ध कराया गया है। इस अवसर को आदिवासी भाषाओं और सांस्कृतिक पहचान के संरक्षण की दिशा में ऐतिहासिक कदम माना जा रहा है। झारखंड सहित देशभर के संथाली समाज में इसे गौरव और आत्मसम्मान से जुड़ा निर्णय बताया जा रहा है।

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  • राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने ओल चिकी लिपि में संविधान का किया विमोचन।
  • राष्ट्रपति भवन में आयोजित विशेष कार्यक्रम में हुआ ऐतिहासिक कार्य।
  • संथाली समाज को अपनी भाषा में संविधान पढ़ने-समझने का अवसर।
  • पूर्व मुख्यमंत्री रघुबर दास ने निर्णय को बताया मील का पत्थर।
  • ओल चिकी लिपि के संरक्षण और विस्तार को मिली राष्ट्रीय मान्यता।

भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में एक महत्वपूर्ण अध्याय उस समय जुड़ गया, जब देश का संविधान संथाली भाषा में उपलब्ध कराया गया। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू द्वारा ओल चिकी लिपि में संविधान का विमोचन न केवल भाषाई समावेशन का प्रतीक है, बल्कि यह आदिवासी समाज की सांस्कृतिक पहचान और संवैधानिक अधिकारों को सशक्त करने वाला निर्णय भी है। यह कदम देश की बहुभाषी और बहुसांस्कृतिक आत्मा को और मजबूती प्रदान करता है।

राष्ट्रपति का संदेश: गर्व और आत्मसम्मान का क्षण

कार्यक्रम को संबोधित करते हुए राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने कहा कि यह संथाली समाज के लिए गर्व और खुशी का विषय है कि अब वे भारतीय संविधान को अपनी मातृभाषा में पढ़ और समझ सकेंगे। उन्होंने विश्वास जताया कि इससे संविधान के मूल्यों, अधिकारों और कर्तव्यों की समझ आम जन तक और गहराई से पहुंचेगी। राष्ट्रपति ने कहा कि जब नागरिक अपनी भाषा में संविधान से जुड़ते हैं, तब लोकतंत्र की जड़ें और मजबूत होती हैं।

ओल चिकी लिपि को राष्ट्रीय मंच

संथाली भाषा की ओल चिकी लिपि को लंबे समय से संवैधानिक और शैक्षणिक मान्यता की आवश्यकता महसूस की जा रही थी। संविधान का इस लिपि में प्रकाशन इस दिशा में निर्णायक कदम माना जा रहा है। यह न केवल भाषा के संरक्षण का माध्यम बनेगा, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए सांस्कृतिक धरोहर को जीवित रखने का आधार भी तैयार करेगा।

रघुबर दास की प्रतिक्रिया: ऐतिहासिक और दूरदर्शी निर्णय

इस ऐतिहासिक पहल पर प्रतिक्रिया देते हुए झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री रघुबर दास ने इसे आदिवासी समाज और ओल चिकी लिपि के लिए मील का पत्थर बताया। उन्होंने माननीय राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू, उपराष्ट्रपति सीपी राधाकृष्णन और केंद्रीय कानून एवं न्याय राज्य मंत्री अर्जुन राम मेघवाल के प्रति आभार व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि संथाली भाषा में संविधान का प्रकाशन ओल चिकी लिपि को राष्ट्रीय पहचान दिलाने वाला निर्णय है।

डबल इंजन सरकार के प्रयासों का उल्लेख

रघुबर दास ने यह भी याद दिलाया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में झारखंड में डबल इंजन सरकार के दौरान ओल चिकी लिपि को स्कूली पाठ्यक्रम में कक्षा पांच तक शामिल किया गया था। इसे पढ़ाने के लिए शिक्षकों की बहाली की प्रक्रिया भी शुरू की गई थी। इसके साथ ही रेलवे स्टेशनों पर ओल चिकी लिपि में उद्घोषणा जैसी पहलें की गई थीं, जिससे भाषा को सार्वजनिक जीवन में स्थान मिला।

पंडित रघुनाथ मुर्मू को सम्मान

पूर्व मुख्यमंत्री ने ओल चिकी लिपि के जनक पंडित रघुनाथ मुर्मू के योगदान को भी रेखांकित किया। उनके नाम पर साहित्य पुरस्कार की शुरुआत को भाषा और संस्कृति के संरक्षण की दिशा में अहम कदम बताया गया। उन्होंने कहा कि ऐसे प्रयासों से न केवल भाषा जीवित रहती है, बल्कि समाज का आत्मविश्वास भी बढ़ता है।

आदिवासी अधिकार और संवैधानिक जागरूकता

संथाली भाषा में संविधान की उपलब्धता आदिवासी समाज के लिए केवल प्रतीकात्मक उपलब्धि नहीं है, बल्कि यह व्यावहारिक रूप से उनके अधिकारों और कर्तव्यों को समझने का माध्यम बनेगी। ग्रामसभा, पंचायती राज, वनाधिकार और सामाजिक न्याय जैसे विषयों को अपनी भाषा में समझना अब अधिक सहज होगा, जिससे संवैधानिक जागरूकता बढ़ेगी।

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सांस्कृतिक समावेशन की दिशा में मजबूत कदम

भारत जैसे विविधताओं से भरे देश में यह पहल भाषाई समावेशन का उदाहरण है। यह संदेश देती है कि लोकतंत्र केवल शासन की व्यवस्था नहीं, बल्कि सभी संस्कृतियों और भाषाओं को साथ लेकर चलने की प्रक्रिया है। संथाली भाषा में संविधान का प्रकाशन इसी सोच का सशक्त प्रमाण है।

न्यूज़ देखो: लोकतंत्र और भाषा का सम्मान

संथाली भाषा में संविधान का प्रकाशन यह दर्शाता है कि भारतीय लोकतंत्र हर नागरिक को उसकी पहचान के साथ जोड़ना चाहता है। यह पहल आदिवासी भाषाओं के संरक्षण और अधिकारों की समझ को नई दिशा देगी। अब यह जिम्मेदारी सरकारों और समाज की है कि इस उपलब्धि को जमीनी स्तर तक पहुंचाया जाए। हर खबर पर रहेगी हमारी नजर।

अपनी भाषा में संविधान, सशक्त नागरिक का आधार

जब संविधान जनता की भाषा में बोलता है, तब लोकतंत्र जीवंत होता है। यह पहल हमें यह सोचने को प्रेरित करती है कि स्थानीय भाषाओं का सम्मान ही राष्ट्रीय एकता को मजबूत करता है।
आप इस ऐतिहासिक निर्णय को कैसे देखते हैं? अपनी राय साझा करें, इस खबर को आगे बढ़ाएं और भाषा व संविधान के प्रति जागरूकता फैलाने में सहभागी बनें।

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