
#बिहार #कर्पूरी_ठाकुर : संघर्ष, सिद्धांत और सामाजिक समरसता से भरा जीवन भारतीय राजनीति की अमूल्य धरोहर बना।
बिहार के जननायक कर्पूरी ठाकुर का जीवन सामाजिक न्याय, समानता और सिद्धांतवादी राजनीति का प्रतीक रहा है। 24 जनवरी 1924 को समस्तीपुर जिले के पितौंझिया गांव में जन्मे कर्पूरी ठाकुर ने साधारण पृष्ठभूमि से निकलकर राष्ट्रीय राजनीति में विशिष्ट पहचान बनाई। स्वतंत्रता आंदोलन से लेकर समाजवादी राजनीति तक उनकी भूमिका निर्णायक रही। भारत रत्न से सम्मानित यह नेता आज भी वंचित वर्गों के लिए प्रेरणा स्रोत बना हुआ है।
- 24 जनवरी 1924 को पितौंझिया, समस्तीपुर में हुआ था जन्म।
- सामाजिक न्याय और समाजवाद के प्रखर समर्थक के रूप में पहचान।
- 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में सक्रिय भागीदारी।
- पिछड़े और वंचित वर्गों के अधिकारों के लिए संघर्ष।
- हिंदी और मैथिली साहित्य के प्रति विशेष अनुराग।
कर्पूरी ठाकुर का जीवन केवल राजनीतिक उपलब्धियों तक सीमित नहीं था, बल्कि वह विचार, संघर्ष और सामाजिक प्रतिबद्धता की जीवंत मिसाल था। साधारण परिवार में जन्मे कर्पूरी ठाकुर ने प्रारंभ से ही शिक्षा, वाद-विवाद और सार्वजनिक जीवन में गहरी रुचि दिखाई। उनका व्यक्तित्व समय के साथ एक ऐसे नेता के रूप में उभरा, जिसने सत्ता से अधिक समाज के अंतिम पंक्ति में खड़े व्यक्ति की चिंता की।
बचपन और शिक्षा से संघर्ष की शुरुआत
कर्पूरी ठाकुर का जन्म 24 जनवरी 1924 को गोकुल ठाकुर और रामदुलारी देवी के घर हुआ। प्रारंभिक शिक्षा गांव के प्राइमरी स्कूल में हुई, जहां उनकी प्रतिभा से शिक्षक भी प्रभावित रहते थे। आगे चलकर उन्होंने उसी विद्यालय में शिक्षक और प्रधानाध्यापक के रूप में भी सेवा दी, जो आज लक्ष्मीनारायण राजकीय मध्य विद्यालय के नाम से जाना जाता है।
ताजपुर में पढ़ाई के दौरान वे प्रतिदिन लगभग 16 किलोमीटर पैदल यात्रा करते थे, जो शिक्षा के प्रति उनकी लगन को दर्शाता है। आर्थिक सहयोग चाचा ध्रुपद ठाकुर ने दिया, जिससे उनकी पढ़ाई निर्बाध चलती रही।
नाम से पहचान तक की ऐतिहासिक घटना
1930 के दशक के अंतिम वर्षों में समस्तीपुर के कृष्णा टॉकीज सभागार में समाजवादी नेता पंडित रामनंदन मिश्र के भाषण के दौरान बालक कपूरी ठाकुर ने प्रभावशाली वक्तव्य दिया। इससे प्रभावित होकर मिश्र जी ने कहा था—
“तुम कपूरी नहीं, कर्पूरी हो।”
यहीं से कपूरी ठाकुर, कर्पूरी ठाकुर के रूप में पहचाने जाने लगे। यह घटना उनके पूरे जीवन की वैचारिक दिशा तय करने वाली साबित हुई।
स्वतंत्रता आंदोलन और समाजवाद की ओर कदम
1940 में मैट्रिक उत्तीर्ण करने के बाद उन्होंने सीएम कॉलेज दरभंगा से उच्च शिक्षा प्राप्त की। 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन ने उनके जीवन की दिशा बदल दी। राम मनोहर लोहिया, आचार्य नरेंद्र देव, राहुल सांकृत्यायन, रामवृक्ष बेनीपुरी जैसे समाजवादी विचारकों से प्रभावित होकर वे सक्रिय राजनीति में उतरे।
1945 से 1947 के बीच वे कांग्रेस समाजवादी पार्टी में सक्रिय रहे और किसानों के हित में कार्य करते हुए जमींदारों से भूमि लेकर भूमिहीनों में वितरण कराया।
जननायक बनने की राजनीतिक यात्रा
1946 के पूसा किसान सम्मेलन ने कर्पूरी ठाकुर को जननायक के रूप में स्थापित कर दिया। वे अल्प समय में ही बिहार की राजनीति में मजबूत स्तंभ बन गए। विपक्ष के नेता के रूप में उनकी भाषण शैली तीखी, तर्कपूर्ण और जनहित से जुड़ी होती थी।
वे सरकार की पक्षपातपूर्ण नीतियों, महंगाई, कानून व्यवस्था और प्रशासनिक लापरवाही पर खुलकर प्रहार करते थे, जिससे सत्ता पक्ष असहज हो जाता था।
सामाजिक न्याय और विकास की वैचारिक त्रिवेणी
कर्पूरी ठाकुर की राजनीति तीन प्रमुख स्तंभों पर आधारित थी—
पहला, सरकारी पक्षपात और अन्याय के खिलाफ संघर्ष।
दूसरा, दलित, पिछड़े और वंचित वर्गों की आवाज को राजनीतिक मंच देना।
तीसरा, औद्योगिक विकास के साथ संसाधनों का समान वितरण।
उनका मानना था कि विकास तभी सार्थक है, जब उसका लाभ समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुंचे।
भाषा, साहित्य और सांस्कृतिक दृष्टि
कर्पूरी ठाकुर हिंदी भाषा के प्रबल समर्थक थे और रामधारी सिंह दिनकर, महादेवी वर्मा, नागार्जुन जैसे साहित्यकारों को गहराई से पढ़ते थे। मैथिली साहित्य से भी उनका विशेष लगाव था।
उन्होंने उत्तर और दक्षिण भारत के बीच भाषाई समन्वय के लिए यह विचार रखा कि हिंदी क्षेत्र में तमिल भाषा को भी अनिवार्य रूप से पढ़ाया जाए, ताकि सांस्कृतिक दूरी कम हो और राष्ट्रीय एकता मजबूत बने।
सादगी और सिद्धांतों की राजनीति
कर्पूरी ठाकुर की सादगी, ईमानदारी और सिद्धांतनिष्ठा आज भी राजनीतिक जीवन के लिए उदाहरण है। उन्होंने सत्ता को साधन नहीं, सेवा का माध्यम माना। उनके निर्णयों में तात्कालिक लाभ नहीं, दीर्घकालिक सामाजिक प्रभाव की सोच होती थी।
न्यूज़ देखो: सामाजिक न्याय की राजनीति का स्थायी संदर्भ
कर्पूरी ठाकुर का जीवन बताता है कि राजनीति केवल सत्ता प्राप्ति नहीं, बल्कि समाज परिवर्तन का माध्यम भी हो सकती है। उन्होंने वंचित वर्गों को राजनीतिक पहचान दी और विकास को सामाजिक न्याय से जोड़ा। आज के दौर में उनकी विचारधारा और अधिक प्रासंगिक हो गई है। हर खबर पर रहेगी हमारी नजर।
सिद्धांतों को अपनाएं, समाज को मजबूत बनाएं
जननायक कर्पूरी ठाकुर का जीवन हमें सिखाता है कि संघर्ष, सादगी और विचारधारा से ही स्थायी बदलाव आता है।
आज जरूरत है कि हम उनके मूल्यों को समझें और सामाजिक समानता के लिए सक्रिय भूमिका निभाएं।
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