हमारे सपनों का झारखंड अब भी अधूरा, विजय ठाकुर ने जताई आंदोलनकारियों का दर्द और युवा पीढ़ी की निराशा

हमारे सपनों का झारखंड अब भी अधूरा, विजय ठाकुर ने जताई आंदोलनकारियों का दर्द और युवा पीढ़ी की निराशा

author News देखो Team
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#झारखंड #स्थापना_दिवस : झारखंड राज्य के 25 वर्षों में विकास की उम्मीदें टूटीं – आंदोलनकारियों के सपने अधूरे और युवाओं के मन में बढ़ती हताशा
  • झारखंड राज्य के गठन के 25 वर्ष पूरे होने पर सरकार बड़े पैमाने पर कार्यक्रमों की तैयारी में जुटी है।
  • राज्य के संघर्षशील आंदोलनकारियों को अब तक नहीं मिला उचित मान-सम्मान और पेंशन का अधिकार।
  • बेरोजगारी, पलायन और भ्रष्टाचार ने झारखंड की प्रगति को गहरी चोट पहुंचाई है।
  • JSSC, JPSC, JTET जैसी परीक्षाओं में लगातार अनियमितताओं ने युवाओं का भरोसा तोड़ा है।
  • औद्योगिक विकास और रोजगार सृजन के वादे अब भी अधूरे, जबकि नेताओं और अधिकारियों की सुविधाएँ बढ़ीं।

झारखंड राज्य अपने गठन के 25 वर्ष पूरे करने जा रहा है। यह वही राज्य है जिसके लिए आंदोलनकारियों ने वर्षों तक संघर्ष किया, जेल गए और अपने प्राणों की आहुति दी। लेकिन आज जब राज्य सरकार इसे धूमधाम से मनाने की तैयारी कर रही है, तब कई आंदोलनकारी और जागरूक नागरिक पूछ रहे हैं कि क्या सच में यह जश्न का अवसर है या आत्ममंथन का? झारखंड के आंदोलनकारी विजय ठाकुर ने अपने निवेदन में वह पीड़ा व्यक्त की है जो हर उस व्यक्ति के दिल में है जिसने इस राज्य को संघर्ष से पाया, लेकिन आज उसकी हालत देखकर निराश है।

संघर्ष से मिली आज़ादी, पर अधूरे रह गए सपने

विजय ठाकुर लिखते हैं कि जब हमने अलग झारखंड राज्य का सपना देखा था, तो हमारी उम्मीद थी कि खनिज संपदा से परिपूर्ण यह भूमि खुशहाली का प्रतीक बनेगी। लोगों को रोजगार मिलेगा, पलायन रुकेगा और यहां के युवाओं को अपने ही राज्य में बेहतर भविष्य मिलेगा। पर आज, बेरोजगारी और पलायन पहले से कई गुना बढ़ गए हैं। गरीब परिवारों के सदस्य जीविका की तलाश में बाहर जाते हैं और कई बार दुर्घटनाओं में अपनी जान गंवा बैठते हैं।

राज्य सरकार के पास संसाधन तो हैं, पर इच्छाशक्ति का अभाव है। उद्योग-धंधे लगाने की दिशा में ठोस कदम नहीं उठाए जा रहे। झारखंड जैसे संसाधन संपन्न राज्य में अब भी गरीबी रेखा से नीचे जीवन जीने वालों की संख्या बहुत अधिक है।

विकास के नाम पर नेताओं की सुविधाओं का विस्तार

बिहार से अलग होने के बाद झारखंड में सड़क, बिजली और भवन निर्माण तो हुआ, लेकिन यह विकास आम जनता की बजाय नेताओं और अधिकारियों की सुख-सुविधाओं तक सीमित रह गया। महंगी गाड़ियाँ, आलीशान दफ्तर और मोटी तनख्वाहों के साथ भ्रष्टाचार ने भी उतनी ही तेजी से विकास किया जितनी उम्मीद जनता ने की थी अपने राज्य से।

यह भी लिखा गया है कि कम पढ़े-लिखे जनप्रतिनिधि और कुछ अधिकारियों के मनमाने फैसलों ने राज्य की प्रगति को अवरुद्ध कर दिया है। शिक्षा व्यवस्था की दुर्दशा और सरकारी नियुक्तियों में अनियमितता इसका प्रमाण है।

रोजगार की राह में भ्रष्टाचार की दीवार

राज्य के युवाओं की सबसे बड़ी समस्या नौकरी और परीक्षा प्रणाली में अविश्वास है। JSSC CGL परीक्षा चार-पाँच बार आयोजित की जा चुकी है, फिर भी परिणाम विवादों में उलझे हैं। JTET की परीक्षा को हुए नौ साल बीत चुके हैं। JPSC की परीक्षाएँ समय पर पूरी नहीं होतीं। हर बार पेपर लीक, भ्रष्टाचार और लापरवाही ने युवाओं का भविष्य अंधेरे में धकेल दिया है।

इससे झारखंड के छात्रों और युवाओं का आत्मविश्वास टूटता जा रहा है। हज़ारों पद खाली होने के बावजूद विभागों को प्रभार में चलाया जा रहा है, जिससे नई भर्तियाँ ठप हैं।

सामाजिक योजनाओं पर सवाल

विजय ठाकुर ने राज्य सरकार की नीतियों पर सवाल उठाते हुए कहा कि सक्षम और युवा महिलाओं को हर माह ₹2500 की आर्थिक सहायता देना जबकि वृद्ध और असहाय को ₹1000 देना सामाजिक दृष्टि से विरोधाभासी है। उन्होंने कहा कि ऐसी योजनाओं से वास्तविक सशक्तिकरण नहीं, बल्कि निर्भरता बढ़ती है।

भूले जा रहे हैं आंदोलनकारी, बढ़ रही है फर्जी सूची

झारखंड आंदोलन से जुड़े सच्चे संघर्षशील आंदोलनकारियों को आज भी उनका सम्मान, पेंशन और आरक्षण का अधिकार नहीं मिल पाया है। मंचों से नेता घोषणाएँ तो करते हैं, पर अमल नहीं होता। आंदोलनकारी चिन्हितीकरण आयोग में फर्जी नामों का चयन और पैसे का लेनदेन खुलेआम हो रहा है।

विजय ठाकुर ने कहा: “हमने झारखंड राज्य अपने खून-पसीने से पाया था, लेकिन आज असली आंदोलनकारी गुमनामी में मर रहे हैं, और नकली लोग लाभ उठा रहे हैं।”

उन्होंने यह भी कहा कि आंदोलनकारियों की संख्या लगातार घट रही है। उम्र, गरीबी और बीमारी के कारण कई आंदोलनकारी दम तोड़ रहे हैं, पर सरकार को इसकी परवाह नहीं।

आंदोलन की विरासत पर ग्रहण

पूर्व मुख्यमंत्री अर्जुन मुंडा और सुदेश महतो की सरकारों ने आंदोलनकारियों के लिए जेल जाने की शर्त लागू कर उनके अधिकारों पर रोक लगा दी थी। मौजूदा सरकार ने भी इस नीति को सुधारने में कोई रुचि नहीं दिखाई है।

विजय ठाकुर का कहना है कि अगर यही हाल रहा, तो आने वाले वर्षों में एक भी सच्चा आंदोलनकारी जीवित नहीं रहेगा, और तब यह स्थापना दिवस मनाने का कोई अर्थ नहीं रह जाएगा।

न्यूज़ देखो: झारखंड के जश्न में छिपी बेचैनी

यह लेख झारखंड के 25 साल की हकीकत को सामने लाता है। जहां सरकार उपलब्धियों का बखान कर रही है, वहीं आंदोलनकारियों की आवाज़ अब भी अनसुनी है। युवाओं की बेरोजगारी, भ्रष्टाचार और पलायन राज्य की दिशा पर सवाल खड़े कर रहे हैं। यह समय उत्सव का नहीं, आत्ममंथन का है।

हर खबर पर रहेगी हमारी नजर।

सजग नागरिक ही झारखंड का भविष्य बदल सकते हैं

अब वक्त है कि हम सभी अपने राज्य की दिशा और दशा पर विचार करें। आंदोलनकारियों के सपनों को साकार करने की जिम्मेदारी हम सबकी है। युवाओं को जागरूक होकर व्यवस्था में पारदर्शिता और जवाबदेही की मांग करनी चाहिए। भ्रष्टाचार, बेरोजगारी और पलायन से मुक्ति के लिए एकजुट होकर आवाज़ उठाना ज़रूरी है।

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