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खरसावां गोलीकांड भारत के लोकतांत्रिक इतिहास का वह दर्दनाक अध्याय जिसे भुलाया नहीं जा सकता

#खरसावां #आदिवासी_इतिहास : आज़ादी के बाद निहत्थे आदिवासियों पर चली गोलियों की त्रासदी।

1 जनवरी 1948 को झारखंड के खरसावां में घटित गोलीकांड भारत के स्वतंत्रता पश्चात इतिहास की सबसे दुखद घटनाओं में से एक है। राष्ट्रीय ध्वज फहराने के दौरान प्रशासनिक कार्रवाई में सैकड़ों निहत्थे आदिवासियों की जान चली गई। यह घटना आदिवासी अधिकारों, लोकतंत्र और संवाद की विफलता का प्रतीक मानी जाती है। आज भी यह त्रासदी न्याय और ऐतिहासिक स्वीकार्यता की प्रतीक्षा कर रही है।

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  • 1 जनवरी 1948 को खरसावां में हुआ था ऐतिहासिक गोलीकांड।
  • हो, मुंडा और संथाल समुदाय के हजारों आदिवासी थे मौजूद।
  • राष्ट्रीय ध्वज फहराने के कार्यक्रम के दौरान बढ़ा तनाव।
  • निहत्थी भीड़ पर पुलिस फायरिंग, सैकड़ों मौतों का दावा।
  • घटना को आज भी शहादत दिवस के रूप में किया जाता है याद।

भारत को आज़ाद हुए कुछ ही महीने बीते थे। देश नई उम्मीदों, नए सपनों और लोकतांत्रिक मूल्यों की राह पर आगे बढ़ रहा था। लेकिन 1 जनवरी 1948 का दिन खरसावां के आदिवासी समाज के लिए आज़ादी के उत्सव का नहीं, बल्कि जीवन भर न भूलने वाले शोक का प्रतीक बन गया। यह वही दिन था, जब आज़ाद भारत में पहली बार खरसावां में राष्ट्रीय ध्वज फहराने का आयोजन किया गया था, और वही दिन इतिहास में खरसावां गोलीकांड के नाम से दर्ज हो गया।

खरसावां की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

खरसावां तत्कालीन सिंहभूम जिले का हिस्सा था, जो अब झारखंड राज्य में स्थित है। यह क्षेत्र आदिवासी बहुल रहा है, जहां हो, मुंडा और संथाल समुदाय पीढ़ियों से अपनी परंपरागत व्यवस्था, जमीन और स्वशासन के साथ रहते आए हैं। आज़ादी से पहले खरसावां एक रियासत थी और आदिवासी समाज को यह आशंका थी कि विलय के बाद उनके अधिकार, स्वायत्तता और सांस्कृतिक पहचान खतरे में पड़ जाएगी।

इसी पृष्ठभूमि में आदिवासी समाज अलग झारखंड राज्य, स्वशासन और अपने पारंपरिक अधिकारों की मांग कर रहा था। यह आंदोलन शांतिपूर्ण था, लेकिन प्रशासन इसे असंतोष और चुनौती के रूप में देख रहा था।

1 जनवरी 1948 का दिन

1 जनवरी 1948 को खरसावां में राष्ट्रीय ध्वज फहराने का कार्यक्रम तय किया गया था। इस अवसर पर दूर-दराज के गांवों से हजारों आदिवासी पुरुष, महिलाएं और बच्चे एकत्र हुए थे। उनके मन में आज़ादी के साथ-साथ अपने अधिकारों की रक्षा की उम्मीद भी थी।

कार्यक्रम के दौरान प्रशासन और आदिवासी भीड़ के बीच तनाव बढ़ता गया। संवाद की कमी, अविश्वास और प्रशासनिक कठोरता ने स्थिति को और जटिल बना दिया। इसी तनावपूर्ण माहौल में वह क्षण आया जिसने इतिहास की दिशा बदल दी।

कैसे हुआ गोलीकांड

स्थिति को नियंत्रित करने के नाम पर पुलिस और सुरक्षा बलों ने निहत्थी भीड़ पर गोली चला दी। लोग भगदड़ में इधर-उधर भागने लगे। महिलाएं, बच्चे और बुजुर्ग जान बचाने के लिए गिरते-पड़ते रहे। चारों ओर चीख-पुकार, खून और मातम का दृश्य था।

स्थानीय परंपराओं और जनस्मृतियों के अनुसार, इस गोलीबारी में सैकड़ों आदिवासियों की मौत हुई। हालांकि, आधिकारिक रिकॉर्ड में मृतकों की संख्या बहुत कम दिखाई गई, जिससे इस घटना को लेकर आज भी विवाद और असंतोष बना हुआ है। कई लोग गंभीर रूप से घायल हुए, जिनमें से कई जीवन भर के लिए अपंग हो गए।

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आधिकारिक चुप्पी और अधूरा न्याय

खरसावां गोलीकांड की सबसे बड़ी त्रासदी केवल जानों का जाना नहीं था, बल्कि इसके बाद की लंबी चुप्पी भी थी। इस घटना को लंबे समय तक न तो राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा मिली और न ही पीड़ितों को न्याय।

आदिवासी समाज का मानना है कि इस घटना को जानबूझकर इतिहास के हाशिये पर रखा गया। न कोई स्वतंत्र जांच, न दोषियों की जवाबदेही और न ही पीड़ित परिवारों के लिए समुचित मुआवजा।

आदिवासी अधिकार आंदोलन पर प्रभाव

खरसावां गोलीकांड ने आदिवासी समाज की चेतना को गहराई से झकझोर दिया। यह घटना आगे चलकर आदिवासी अधिकार आंदोलन के लिए एक निर्णायक मोड़ साबित हुई। जमीन, जंगल और जल पर अधिकार की लड़ाई को इस त्रासदी ने और मजबूत किया।

आज भी झारखंड और आसपास के क्षेत्रों में 1 जनवरी को शहादत दिवस के रूप में मनाया जाता है। लोग शहीदों को श्रद्धांजलि देते हैं और यह याद दिलाते हैं कि लोकतंत्र केवल सत्ता नहीं, बल्कि संवाद, सम्मान और मानवाधिकारों से बनता है।

न्यूज़ देखो: इतिहास से सीख लेने की ज़रूरत

खरसावां गोलीकांड यह बताता है कि आज़ादी के बाद भी सत्ता और समाज के बीच संवाद की कमी कितनी घातक हो सकती है। यह घटना आज भी सवाल करती है कि क्या आदिवासी समाज को उसका संवैधानिक सम्मान मिला। इतिहास को स्वीकार करना और उससे सीख लेना ही सच्चा न्याय है। हर खबर पर रहेगी हमारी नजर।

स्मृति से संकल्प तक

खरसावां के शहीद केवल अतीत की कहानी नहीं हैं, वे आज के लोकतंत्र की चेतावनी हैं। जब भीड़ पर गोली चलती है, तब केवल लोग नहीं मरते, विश्वास भी मरता है।
आइए, इस शहादत को केवल स्मरण तक सीमित न रखें, बल्कि संवाद, संवेदनशीलता और समान अधिकारों का संकल्प लें।
आपकी राय क्या है? इस ऐतिहासिक घटना को न्याय और पहचान कैसे मिलनी चाहिए—कमेंट करें, लेख साझा करें और स्मृति को ज़िंदा रखें।

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