#चतरा #शिक्षा_व्यवस्था : बदहाल शौचालय, वित्तीय अनियमितता और प्रशासनिक लापरवाही पर ग्रामीणों ने उठाए गंभीर सवाल
चतरा जिले के लावालौंग प्रखंड स्थित उत्क्रमित मध्य विद्यालय पोटम की स्थिति ने शिक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। विद्यालय में शौचालय जर्जर और अनुपयोगी होने से छात्राओं को झाड़ियों में शौच के लिए जाना पड़ रहा है। ग्रामीणों ने वित्तीय अनियमितता, मिड-डे मील में गड़बड़ी और प्रशासनिक लापरवाही की जांच की मांग की है।
- उत्क्रमित मध्य विद्यालय (UMS) पोटम में बदहाल शौचालय से छात्राएं परेशान।
- घनी जंगली घास से घिरा शौचालय पूरी तरह अनुपयोगी हो चुका।
- छात्राओं को सुरक्षा जोखिम के बीच झाड़ियों में शौच के लिए जाना पड़ रहा।
- ग्रामीणों ने लगाया सरकारी राशि में अनियमितता और दुरुपयोग का आरोप।
- मिड-डे मील व्यवस्था पर भी धांधली के आरोप, अधिकारियों की चुप्पी पर सवाल।
चतरा जिले के लावालौंग प्रखंड अंतर्गत स्थित उत्क्रमित मध्य विद्यालय (यूएमएस) पोटम की वर्तमान स्थिति शिक्षा व्यवस्था की जमीनी हकीकत को उजागर करती नजर आ रही है। आठवीं कक्षा तक संचालित इस विद्यालय में मूलभूत सुविधाओं का घोर अभाव देखने को मिल रहा है, जिसका सबसे अधिक असर छात्राओं पर पड़ रहा है। विद्यालय परिसर में बना शौचालय लंबे समय से देखरेख के अभाव में जर्जर और अनुपयोगी हो चुका है, जिससे बच्चियों को भारी परेशानी का सामना करना पड़ रहा है।
विद्यालय में स्वच्छता और सुरक्षा जैसी बुनियादी व्यवस्थाओं की कमी ने अभिभावकों और ग्रामीणों की चिंता बढ़ा दी है। ‘बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ’ जैसे सरकारी अभियान की भावना यहां की बदहाल स्थिति के बीच कमजोर पड़ती दिखाई दे रही है।
जंगली घास से घिरा शौचालय बना सफेद हाथी
विद्यालय परिसर में निर्मित शौचालय वर्तमान में उपयोग के लायक नहीं रह गया है। शौचालय के भीतर और उसके आसपास घनी एवं ऊंची जंगली घास उग आने के कारण यह पूरी तरह से अनुपयोगी हो चुका है।
देखरेख के अभाव में यह सुविधा केवल कागजों तक सीमित होकर रह गई है। छात्राओं के लिए बनाए गए शौचालय का उपयोग न हो पाना विद्यालय प्रबंधन की लापरवाही को दर्शाता है।
स्थानीय ग्रामीणों का कहना है कि कई बार सफाई और मरम्मत की मांग उठाई गई, लेकिन स्थिति में कोई ठोस सुधार नहीं हुआ।
छात्राओं की सुरक्षा और सम्मान पर गंभीर खतरा
शौचालय की अनुपलब्धता के कारण विद्यालय की छात्राओं को मजबूरी में झाड़ियों की ओट में शौच के लिए जाना पड़ रहा है। यह स्थिति न केवल असुविधाजनक है बल्कि उनकी सुरक्षा और गरिमा के लिए भी गंभीर खतरा उत्पन्न करती है।
विद्यालय का क्षेत्र आंशिक रूप से जंगली परिवेश से घिरा हुआ बताया जा रहा है, जिससे किसी अप्रिय घटना की आशंका भी बनी रहती है।
अभिभावकों का कहना है कि बच्चियों की सुरक्षा से जुड़ा यह मामला अत्यंत संवेदनशील है और इसे तत्काल प्राथमिकता के आधार पर सुलझाया जाना चाहिए।
प्रधानाध्यापक के रवैये पर ग्रामीणों के आरोप
ग्रामीणों और जागरूक नागरिकों ने विद्यालय के प्रधानाध्यापक (एचएम) के रवैये पर भी सवाल उठाए हैं। आरोप है कि जब विद्यालय की बदहाल स्थिति को लेकर सवाल पूछे जाते हैं, तो समाधान की दिशा में पहल करने के बजाय नाराजगी व्यक्त की जाती है।
ग्रामीणों का कहना है कि विद्यालय प्रशासन को जवाबदेही निभानी चाहिए, क्योंकि यह संस्था बच्चों के भविष्य से जुड़ी हुई है।
हालांकि इस संबंध में विद्यालय प्रशासन की आधिकारिक प्रतिक्रिया की प्रतीक्षा की जा रही है।
सरकारी राशि के उपयोग पर उठे वित्तीय अनियमितता के सवाल
विद्यालय प्रबंधन को मिलने वाली विकास एवं मरम्मत से संबंधित सरकारी राशि के उपयोग को लेकर भी ग्रामीणों और विद्यालय प्रबंधन समिति के कुछ सदस्यों ने गंभीर आरोप लगाए हैं।
आरोप है कि विकास कार्यों के नाम पर राशि की निकासी तो होती है, लेकिन जमीनी स्तर पर उसका प्रभाव दिखाई नहीं देता।
कुछ ग्रामीणों ने यह भी आरोप लगाया कि समिति अध्यक्ष से औपचारिक हस्ताक्षर लेकर वित्तीय प्रक्रिया पूरी की जाती है, जबकि वास्तविक कार्यों में पारदर्शिता की कमी है। इन आरोपों की आधिकारिक पुष्टि अभी शेष है और जांच के बाद ही वास्तविक स्थिति स्पष्ट हो सकेगी।
मिड-डे मील व्यवस्था पर भी सवाल
विद्यालय में संचालित मध्याह्न भोजन (मिड-डे मील) योजना को लेकर भी स्थानीय स्तर पर असंतोष देखने को मिल रहा है। ग्रामीणों का कहना है कि बच्चों को मिलने वाले भोजन की गुणवत्ता और व्यवस्था की नियमित निगरानी नहीं हो रही है।
यदि यह आरोप सही पाए जाते हैं, तो यह सीधे तौर पर बच्चों के पोषण और अधिकार से जुड़ा गंभीर मामला होगा।
शिक्षा विभाग की चुप्पी से बढ़ी चिंता
विद्यालय की दयनीय स्थिति को लेकर प्रखंड से लेकर जिला स्तर तक के शिक्षा अधिकारियों की निष्क्रियता पर भी सवाल उठने लगे हैं।
ग्रामीणों का कहना है कि कई बार शिकायत के बावजूद कोई ठोस निरीक्षण या कार्रवाई नहीं की गई, जिससे समस्या जस की तस बनी हुई है।
शिक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि विद्यालयों में बुनियादी सुविधाओं की नियमित निगरानी और सामाजिक ऑडिट की व्यवस्था को मजबूत करने की आवश्यकता है, ताकि इस तरह की समस्याओं का समय रहते समाधान हो सके।
उच्च स्तरीय जांच और कार्रवाई की मांग तेज
स्थानीय ग्रामीणों ने उपायुक्त (डीसी) चतरा एवं जिला शिक्षा पदाधिकारी (डीईओ) से पूरे मामले की उच्च स्तरीय जांच कराने की मांग की है।
ग्रामीणों का कहना है कि बच्चों के अधिकारों और शिक्षा से जुड़े संसाधनों में किसी भी प्रकार की लापरवाही या अनियमितता को बर्दाश्त नहीं किया जाना चाहिए।
उन्होंने यह भी मांग की है कि यदि वित्तीय गड़बड़ी, लापरवाही या कर्तव्य में शिथिलता की पुष्टि होती है, तो दोषियों के विरुद्ध कठोर प्रशासनिक कार्रवाई की जाए और विद्यालय में मूलभूत सुविधाओं को तत्काल बहाल किया जाए।
न्यूज़ देखो: बुनियादी सुविधाओं के बिना अधूरी है शिक्षा
UMS पोटम की स्थिति यह दर्शाती है कि केवल भवन और नामांकन से शिक्षा व्यवस्था मजबूत नहीं होती, बल्कि स्वच्छता, सुरक्षा और पारदर्शिता जैसी बुनियादी व्यवस्थाएं भी उतनी ही आवश्यक हैं। यदि छात्राओं को शौचालय जैसी मूल सुविधा से वंचित रहना पड़े, तो यह व्यवस्था पर गंभीर प्रश्नचिह्न है। हर खबर पर रहेगी हमारी नजर।
अब जिम्मेदारी तय करने का समय
बच्चों की शिक्षा और सुरक्षा से कोई समझौता नहीं होना चाहिए।
विद्यालयों में स्वच्छता और बुनियादी सुविधाएं सुनिश्चित करना प्रशासन की प्राथमिक जिम्मेदारी है।
समाज और अभिभावकों की सजगता ही बदलाव की शुरुआत बन सकती है।
आप भी अपने क्षेत्र के विद्यालयों की स्थिति पर नजर रखें और आवाज उठाएं।
इस महत्वपूर्ण मुद्दे को ज्यादा से ज्यादा साझा करें ताकि जिम्मेदारों तक सच पहुंच सके।
आपकी राय और सुझाव कमेंट में जरूर लिखें।