
#स्वतंत्रता_संग्राम : आजाद हिंद फौज की रानी झांसी रेजिमेंट की वह योद्धा जिसने जीवन भर देशसेवा को ही अपना धर्म माना
- सरस्वती राजामणि नेताजी सुभाष चंद्र बोस की आजाद हिंद फौज की साहसी वीरांगना रहीं।
- रानी झांसी रेजिमेंट की सदस्य के रूप में उन्होंने सशस्त्र संघर्ष में भाग लिया।
- लड़के का भेष धारण कर अंग्रेजों के खिलाफ जासूसी अभियान चलाया।
- गोली लगने के बावजूद साहस नहीं टूटा, जीवनभर लंगड़ाहट को गर्व की निशानी माना।
- वृद्धावस्था में भी अनाथालयों और वृद्धाश्रमों के लिए सेवा कार्य करती रहीं।
- 2018 में निधन, स्वतंत्रता संग्राम के एक जीवित अध्याय का अंत।
भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में अनगिनत वीर-वीरांगनाओं ने अपना योगदान दिया, लेकिन कुछ नाम ऐसे हैं जो समय के साथ धुंधले पड़ते जा रहे हैं। सरस्वती राजामणि भी उन्हीं में से एक हैं—एक ऐसी स्वतंत्रता सेनानी जिन्होंने न केवल आजादी की लड़ाई में अपना सर्वस्व न्योछावर किया, बल्कि जीवन के अंतिम पलों तक देशसेवा का संकल्प निभाया। उनका जीवन साहस, त्याग और निस्वार्थ सेवा की ऐसी मिसाल है जिसे जानना हर भारतीय के लिए आवश्यक है।
आजाद हिंद फौज की वीरांगना
सरस्वती राजामणि उन साहसी महिलाओं में से एक थीं जिन्होंने नेताजी सुभाष चंद्र बोस की आजाद हिंद फौज (INA) में शामिल होकर देश की आजादी के लिए सशस्त्र संघर्ष का मार्ग चुना। उस दौर में जब महिलाओं के लिए घर की चारदीवारी से बाहर निकलना भी चुनौतीपूर्ण था, उन्होंने सैन्य वर्दी पहनकर देश के लिए लड़ने का साहस दिखाया। आजाद हिंद फौज की रानी झांसी रेजिमेंट की सदस्य के रूप में उन्होंने नेताजी के ‘दिल्ली चलो’ के नारे को साकार करने के लिए संघर्ष किया। यह वह समय था जब भारतीय महिलाएं पारंपरिक भूमिकाओं से आगे बढ़कर सशस्त्र संघर्ष में भाग ले रही थीं। सरस्वती राजामणि जैसी महिलाओं ने यह साबित किया कि देशभक्ति और साहस में कोई लिंग भेद नहीं होता।
लड़के का भेष और जासूसी के रोमांचक किस्से
राजामणि ने अन्य महिला सहयोगियों के साथ मिलकर भेष बदलकर अंग्रेजों के खिलाफ काम किया। उन्होंने लड़का बनकर अंग्रेजों की भारत विरोधी योजनाओं की जानकारी इकट्ठा की। उस समय लड़के के रूप में उनका नाम मणि था। एक बार उनकी एक सहयोगी को ब्रिटिश सैनिकों ने पकड़ लिया। उसे बचाने के लिए राजामणि ने नृतकी का भेष धारण कर अंग्रेजों के शिविर में घुसपैठ की, ब्रिटिश सैनिक को नशीला पदार्थ खिलाया और अपनी साथी को मुक्त करा लिया।
जब वे अपनी साथी को भगा रही थीं, तभी एक ब्रिटिश गार्ड ने उनके पैर में गोली मार दी। गोली लगने के बावजूद वह वहां से निकलने में सफल रहीं। अंग्रेजों से बचने के लिए वह एक पेड़ पर चढ़ गईं। सर्च ऑपरेशन के कारण वह तीन दिन तक बिना मरहम-पट्टी और भूखी-प्यासी रहीं। अंततः वह अपनी साथी के साथ सकुशल आजाद हिंद फौज के कैंप में लौट आईं। इलाज न मिलने के कारण यह घाव जीवनभर की लंगड़ाहट बन गया, जिसे राजामणि अपने जासूसी दिनों की प्यारी याद मानती थीं।
नेताजी सुभाष चंद्र बोस उनके साहस से अत्यंत प्रसन्न हुए और उनकी प्रशंसा की। जापानी सम्राट ने स्वयं उन्हें मेडल से सम्मानित किया और रानी झांसी रेजिमेंट में लेफ्टिनेंट की रैंक प्रदान की।
स्वतंत्रता के बाद संघर्ष और सेवा
आजादी के बाद कई स्वतंत्रता सेनानियों को वह सम्मान और सुविधाएं नहीं मिलीं, जिनके वे हकदार थे। सरस्वती राजामणि का जीवन भी संघर्षों से भरा रहा। वह पेंशनर के रूप में साधारण जीवन व्यतीत करती रहीं, लेकिन उनका हृदय समाज सेवा के लिए हमेशा धड़कता रहा। वृद्धावस्था में भी वह दर्जी की दुकानों से बचे हुए कपड़े इकट्ठा करतीं, उनसे वस्त्र सिलतीं और अनाथालयों व वृद्धाश्रमों में दान कर देती थीं। उन्होंने यह सिखाया कि सेवा के लिए बड़े संसाधनों की नहीं, बल्कि समर्पित हृदय की जरूरत होती है।
आपदा में भी त्याग की मिसाल
2006 की हिंद महासागर सुनामी के समय, जब लाखों लोग प्रभावित हुए, सरस्वती राजामणि ने अपनी पूरी मासिक पेंशन राहत कोष में दान कर दी। सीमित आय के बावजूद उन्होंने जरूरतमंदों की मदद को अपना कर्तव्य माना।
2008 में, उन्होंने अपनी सेना की वर्दी और बिल्ले नेताजी सुभाष चंद्र बोस संग्रहालय, कटक को दान कर दिए, ताकि आने वाली पीढ़ियां स्वतंत्रता संग्राम के इस इतिहास को जान सकें।
एक युग का अंत
2018 में सरस्वती राजामणि का निधन हो गया। उनका जाना केवल एक व्यक्ति का अंत नहीं था, बल्कि स्वतंत्रता संग्राम के एक जीवित अध्याय का समापन था। हर गुजरते स्वतंत्रता सेनानी के साथ इतिहास का एक जीवित हिस्सा हमसे विदा हो जाता है।
सरस्वती राजामणि का जीवन हमें यह सिखाता है कि देशभक्ति केवल युद्धभूमि तक सीमित नहीं होती, बल्कि रोजमर्रा के छोटे-छोटे कार्यों में भी प्रकट होती है। उम्र, परिस्थितियां और सीमित साधन कभी भी सेवा की भावना को नहीं रोक सकते।
न्यूज़ देखो: गुमनाम नायकों की पहचान जरूरी
सरस्वती राजामणि जैसी वीरांगनाएं भारतीय इतिहास की वह धरोहर हैं, जिन्हें याद रखना हमारा दायित्व है। स्वतंत्रता केवल एक तिथि नहीं, बल्कि असंख्य बलिदानों की परिणति है। ऐसे गुमनाम नायकों को पहचान देना ही सच्ची श्रद्धांजलि है। हर खबर पर रहेगी हमारी नजर।
प्रेरणा जो आज भी जीवित है
आज जब हम आजाद भारत में सांस ले रहे हैं, तो यह जरूरी है कि हम ऐसे गुमनाम स्वतंत्रता सेनानियों को याद करें।
उनकी कहानी हमें साहस, त्याग और सेवा का रास्ता दिखाती है।
क्या हम उनकी विरासत को अगली पीढ़ी तक पहुंचा रहे हैं?
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