नीलांबर पीतांबर शहादत दिवस पर लावालौंग से हजारों आदिवासियों ने रांची पहुंचकर दी श्रद्धांजलि

नीलांबर पीतांबर शहादत दिवस पर लावालौंग से हजारों आदिवासियों ने रांची पहुंचकर दी श्रद्धांजलि

author Binod Kumar
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#लावालौंग #शहादत_दिवस : पारंपरिक वेशभूषा और नृत्य के साथ हजारों लोग शामिल हुए।

चतरा जिले के लावालौंग प्रखंड से हजारों आदिवासी शनिवार को रांची के मोरहाबादी मैदान में आयोजित नीलांबर पीतांबर शहादत दिवस कार्यक्रम में शामिल हुए। पारंपरिक वेशभूषा और सांस्कृतिक नृत्य के साथ लोगों ने अपनी भागीदारी दर्ज कराई। इस अवसर पर वीर शहीद नीलांबर पीतांबर को श्रद्धांजलि अर्पित की गई। कार्यक्रम ने आदिवासी समाज की एकजुटता और ऐतिहासिक गौरव को प्रदर्शित किया।

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  • लावालौंग प्रखंड से हजारों आदिवासी रांची के मोरहाबादी मैदान पहुंचे।
  • पारंपरिक वेशभूषा और नृत्य के साथ कार्यक्रम में भागीदारी।
  • 28 मार्च 1859 को वीर शहीदों को दी गई थी फांसी।
  • शहादत के 167 वर्ष पूर्ण होने पर श्रद्धांजलि अर्पित।
  • खरवार भोगता विकास संघ के कई प्रमुख नेता रहे मौजूद।
  • दर्जनों वाहनों से ग्रामीण सुबह ही रांची के लिए हुए रवाना।

चतरा जिले के लावालौंग प्रखंड से हजारों महिला और पुरुष आदिवासी शनिवार को राजधानी रांची पहुंचे, जहां मोरहाबादी मैदान में नीलांबर पीतांबर शहादत दिवस का आयोजन किया गया। इस कार्यक्रम में शामिल होने के लिए ग्रामीणों ने सुबह-सुबह ही विभिन्न गांवों से वाहन बुक कर यात्रा शुरू की। पारंपरिक वेशभूषा और नृत्य के साथ उनकी भागीदारी ने कार्यक्रम को सांस्कृतिक रूप से समृद्ध बना दिया।

ऐतिहासिक बलिदान की याद में आयोजन

नीलांबर और पीतांबर झारखंड के महान स्वतंत्रता सेनानी थे, जिन्होंने अंग्रेजों के खिलाफ संघर्ष में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। जानकारी देते हुए खरवार भोगता विकास संघ के वरिष्ठ नेता छठू सिंह भोगता ने बताया कि:

छठू सिंह भोगता ने कहा: “28 मार्च 1859 को पलामू के लेस्लीगंज में वीर शहीद नीलांबर पीतांबर को फांसी दी गई थी, जिसकी स्मृति में हर वर्ष यह शहादत दिवस मनाया जाता है।”

इस वर्ष उनकी शहादत के 167 वर्ष पूरे होने के उपलक्ष्य में कार्यक्रम का विशेष महत्व रहा।

पारंपरिक संस्कृति के साथ सहभागिता

लावालौंग प्रखंड क्षेत्र से पहुंचे हजारों आदिवासी महिला-पुरुष पारंपरिक वेशभूषा में सजे हुए थे। उन्होंने अपने पारंपरिक नृत्य और सांस्कृतिक प्रस्तुतियों के माध्यम से कार्यक्रम में अपनी उपस्थिति दर्ज कराई।

यह आयोजन केवल श्रद्धांजलि तक सीमित नहीं रहा, बल्कि आदिवासी संस्कृति, परंपरा और एकता का जीवंत उदाहरण भी बना।

श्रद्धांजलि अर्पित कर किया नमन

कार्यक्रम में शामिल लोगों ने रांची पहुंचकर नीलांबर पीतांबर की प्रतिमा पर श्रद्धांजलि अर्पित की। इस दौरान लोगों में अपने इतिहास और वीर शहीदों के प्रति गहरा सम्मान देखने को मिला।

प्रमुख लोगों की रही उपस्थिति

इस अवसर पर खरवार भोगता विकास संघ के कई प्रमुख सदस्य और समाज के गणमान्य लोग मौजूद रहे। इनमें मुख्य रूप से:

गुल्ली सिंह भोगता, कामाख्या सिंह भोगता, चंदू गंझू, जोगेंद्र सिंह भोगता, टिकेंद्र सिंह भोगता, लक्ष्मण सिंह भोगता, संतोष सिंह भोगता सहित आदिवासी भोगता समाज के कई लोग शामिल थे।

इनकी उपस्थिति ने कार्यक्रम को और भी प्रभावशाली बना दिया।

एकजुटता और जागरूकता का संदेश

यह आयोजन न केवल ऐतिहासिक स्मृति को जीवित रखने का माध्यम बना, बल्कि आदिवासी समाज की एकजुटता और जागरूकता का भी संदेश देता है। बड़ी संख्या में लोगों की भागीदारी इस बात का प्रमाण है कि समाज अपने इतिहास और विरासत के प्रति सजग है।

न्यूज़ देखो: विरासत के सम्मान से मजबूत होती पहचान

नीलांबर पीतांबर शहादत दिवस जैसे आयोजन यह दर्शाते हैं कि इतिहास को याद रखना केवल परंपरा नहीं, बल्कि पहचान को मजबूत करने का जरिया भी है। लावालौंग से हजारों लोगों की भागीदारी आदिवासी समाज की जागरूकता और एकजुटता को दर्शाती है। अब जरूरत है कि ऐसे आयोजनों को और व्यापक स्तर पर बढ़ावा दिया जाए ताकि नई पीढ़ी भी अपने इतिहास को जान सके। हर खबर पर रहेगी हमारी नजर।

इतिहास से सीख लेकर आगे बढ़ने का समय

हमारा अतीत ही हमारी पहचान की नींव है। वीर शहीदों के बलिदान को याद रखना और उससे प्रेरणा लेना हम सभी की जिम्मेदारी है।

ऐसे आयोजनों में भाग लेकर हम न केवल अपने इतिहास को सम्मान देते हैं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए एक मजबूत संदेश भी छोड़ते हैं।

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Written by

लावालोंग, चतरा

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