Giridih

झारखंडियों की पहचान को लेकर मुखर हुए टाइगर जयराम महतो, 1932 खतियान का टी-शर्ट पहन पहुंचे विधानसभा

#रांची #विधानसभा : झारखंडियों की पहचान पर उठाया बड़ा सवाल, बोले—संघर्ष जारी रहेगा
  • डुमरी विधायक टाइगर जयराम महतो पहनकर पहुंचे 1932 खतियान का टी-शर्ट।
  • विधानसभा में उठाया झारखंडियों की पहचान और अधिकार का मुद्दा।
  • बोले—25 साल बाद भी नहीं मिल पाई झारखंडियों को पहचान
  • भाषा, संस्कृति और खतियान के आधार पर पहचान सुनिश्चित करने की मांग।
  • कहा—हक और अधिकार के लिए संघर्ष जारी रहेगा

रांची स्थित झारखंड विधानसभा में आज एक अनोखा दृश्य देखने को मिला। डुमरी विधायक टाइगर जयराम कुमार महतो 1932 खतियान का टी-शर्ट पहनकर सदन पहुंचे। उन्होंने इस प्रतीकात्मक अंदाज से झारखंडियों की पहचान और अधिकार के सवाल को एक बार फिर जोरदार तरीके से उठाया।

“झारखंडियों को कब मिलेगा पहचान?”

विधानसभा के बाहर मीडिया से बातचीत में विधायक टाइगर जयराम महतो ने कहा कि झारखंड बने 25 साल हो चुके हैं, लेकिन अब तक झारखंडियों की पहचान को लेकर ठोस कदम नहीं उठाए गए। उन्होंने कहा कि राज्य की पहचान केवल उसके खतियान, भाषा और संस्कृति से है, और जब तक इसे आधिकारिक मान्यता नहीं मिलेगी तब तक झारखंडी समाज का दर्द खत्म नहीं होगा।

टाइगर जयराम महतो का बयान

टाइगर जयराम महतो: “झारखंडियों की पहचान भाषा, संस्कृति और 1932 खतियान है। झारखंडियों को कब मिलेगा पहचान? 25 साल से झारखंडियों की पहचान तक सुनिश्चित नहीं हो पायी है। झारखंडियों को हक, अधिकार और पहचान दिलाने की लड़ाई और संघर्ष जारी रहेगा।”

राजनीतिक गलियारों में चर्चा

विधानसभा सत्र के दौरान महतो का यह अंदाज सभी की नजरों में रहा। उनके 1932 खतियान टी-शर्ट को लेकर राजनीतिक गलियारों में भी चर्चा तेज हो गई है। महतो ने यह साफ संदेश देने की कोशिश की है कि झारखंड के मूलवासियों की पहचान का सवाल केवल चुनावी मुद्दा नहीं, बल्कि अस्तित्व से जुड़ा मामला है।

न्यूज़ देखो: पहचान की जड़ें खतियान से जुड़ी हैं

झारखंड का निर्माण ही मूलवासी-आदिवासी पहचान और हक की लड़ाई के आधार पर हुआ था। लेकिन 25 साल बाद भी यदि खतियान आधारित पहचान पर निर्णय नहीं लिया गया तो यह जनभावना के साथ अन्याय होगा। टाइगर जयराम महतो का यह कदम झारखंडी अस्मिता की लड़ाई को नए सिरे से गति देने का प्रतीक है।
हर खबर पर रहेगी हमारी नजर।

पहचान की लड़ाई में जागरूक बनें

यह सवाल सिर्फ नेताओं का नहीं बल्कि पूरे झारखंडी समाज का है। अब समय है कि हम सब मिलकर अपनी पहचान, भाषा और संस्कृति को बचाने की लड़ाई में जागरूक बनें। अपनी राय कॉमेंट करें और इस खबर को शेयर कर ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुँचाएँ।

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Surendra Verma

डुमरी, गिरिडीह

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