#खलारी #वन्यजीव_संरक्षण : मैकलुस्कीगंज के समीप पुतरी टोला गांव के पास मालगाड़ी की टक्कर से हाथी शावक की मौत, मानव-वन्यजीव संघर्ष और रेल सुरक्षा पर उठे सवाल
खलारी के मैकलुस्कीगंज के पास एलीफेंट कॉरिडोर क्षेत्र में मालगाड़ी की टक्कर से हाथी शावक की मौत ने वन्यजीव संरक्षण और रेल सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर प्रश्न खड़े कर दिए हैं। घटना के बाद हाथियों का झुंड ट्रैक के पास मंडराता रहा, जिससे क्षेत्र में दहशत और चिंता का माहौल बन गया।
- घटना मंगलवार देर शाम पुतरी टोला गांव के समीप बरवाडीह–बरकाकाना रेलखंड पर हुई।
- मालगाड़ी की टक्कर से एक हाथी शावक की मौके पर मौत हो गई।
- हादसा क्षेत्र के पारंपरिक एलीफेंट कॉरिडोर में हुआ बताया जा रहा है।
- घटना के बाद हाथियों का झुंड काफी देर तक रेल ट्रैक के पास मंडराता रहा।
- ग्रामीणों और जनप्रतिनिधियों ने जंगल कटाई और कॉरिडोर बाधित होने पर चिंता जताई।
- विशेषज्ञों ने गति नियंत्रण, सेंसर और अर्ली वार्निंग सिस्टम की जरूरत बताई।
खलारी। मैकलुस्कीगंज से लगभग 10 किलोमीटर दूर पुतरी टोला गांव के समीप मंगलवार देर शाम एक दर्दनाक रेल हादसे में मालगाड़ी की टक्कर से एक हाथी शावक की मौत हो गई। यह दुर्घटना बरवाडीह–बरकाकाना रेलखंड के उस संवेदनशील हिस्से में हुई, जिसे हाथियों का पारंपरिक आवागमन मार्ग यानी एलीफेंट कॉरिडोर माना जाता है। घटना के बाद पूरे क्षेत्र में अफरा-तफरी का माहौल बन गया और ग्रामीणों में गहरी चिंता देखने को मिली।
हादसे के बाद ट्रैक पर मंडराता रहा हाथियों का झुंड
प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, टक्कर के बाद आसपास मौजूद हाथियों का झुंड काफी देर तक रेल ट्रैक के आसपास मंडराता रहा। घायल शावक की कराह सुनकर झुंड में बेचैनी और आक्रोश स्पष्ट दिखाई दे रहा था।
स्थानीय ग्रामीण शातिश साहू ने बताया कि शावक गंभीर रूप से घायल अवस्था में तेज आवाज में कराह रहा था, जिससे माहौल बेहद संवेदनशील हो गया था।
घटना की सूचना फैलते ही आसपास के ग्रामीण मौके पर पहुंच गए, लेकिन हाथियों की मौजूदगी के कारण लोग दूरी बनाकर स्थिति पर नजर रखते रहे।
“यह पहली घटना नहीं” — ग्रामीणों ने जताई नाराजगी
स्थानीय निवासी मनोहर यादव ने इस घटना को लेकर गहरी नाराजगी जताई। उनका कहना है:
“यह पहली घटना नहीं है। जंगल लगातार कट रहे हैं। खनन और सड़क-रेल परियोजनाओं से हाथियों के रास्ते बाधित हो गए हैं। आखिर वे जाएंगे तो कहां?”
उनके अनुसार यह सिर्फ एक दुर्घटना नहीं, बल्कि बढ़ते मानव-वन्यजीव संघर्ष का संकेत है, जो आने वाले समय में और गंभीर रूप ले सकता है।
जंगलों के सिकुड़ने से बढ़ रहा मानव-वन्यजीव संघर्ष
डुमरो पंचायत की मुखिया सुनीता खलको ने बताया कि पिछले कुछ वर्षों में हाथियों का गांव की ओर आना लगातार बढ़ा है। उन्होंने कहा कि जंगलों का दायरा सिमटने, वन भूमि के खंडन और प्राकृतिक आवास के घटने के कारण वन्यजीव अब मानव बस्तियों के करीब आने को मजबूर हो रहे हैं।
उनका कहना है कि औषधीय वृक्षों की कमी और पर्यावरणीय असंतुलन ने भी वन्यजीवों के प्राकृतिक जीवन चक्र को प्रभावित किया है, जिससे उनके पारंपरिक मार्गों में बदलाव देखने को मिल रहा है।
रेलवे की जानकारी में है एलीफेंट कॉरिडोर क्षेत्र
काली कुर्मीटोला निवासी समाजसेवी सुशील उरांव ने बताया कि यह क्षेत्र लंबे समय से हाथियों के पारंपरिक आवागमन मार्ग के रूप में जाना जाता है। उन्होंने कहा कि अप और डाउन रेल लाइन के लगभग 500 मीटर क्षेत्र को एलीफेंट कॉरिडोर माना जाता है और इसकी जानकारी संबंधित विभागों को भी है।
उन्होंने सुझाव दिया कि यदि इस संवेदनशील क्षेत्र में ट्रेनों की गति सीमित करने के लिए स्पष्ट संकेतक बोर्ड लगाए जाएं और गति नियंत्रण का सख्ती से पालन कराया जाए, तो इस तरह की दुर्घटनाओं को काफी हद तक रोका जा सकता है। कम गति होने पर लोको पायलट स्थिति को बेहतर तरीके से नियंत्रित कर सकता है।
संरक्षण व्यवस्था और विभागीय समन्वय पर उठे सवाल
देश में वन्यजीव संरक्षण की जिम्मेदारी पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के अधीन आती है। झारखंड में भी हाथी कॉरिडोर की पहचान की जा चुकी है, लेकिन जमीनी स्तर पर प्रभावी निगरानी और विभिन्न विभागों के बीच बेहतर समन्वय की कमी अक्सर देखने को मिलती है।
विशेषज्ञों का मानना है कि कॉरिडोर से गुजरने वाले रेलखंडों पर विशेष सुरक्षा प्रोटोकॉल लागू करने की आवश्यकता है, ताकि वन्यजीवों की सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके और ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकी जा सके।
तकनीकी उपायों की बढ़ती जरूरत
वन्यजीव विशेषज्ञों के अनुसार, एलीफेंट कॉरिडोर वाले क्षेत्रों में आधुनिक तकनीकी उपाय बेहद जरूरी हैं। इनमें थर्मल सेंसर, ड्रोन निगरानी, अर्ली वार्निंग सिस्टम और स्थानीय सूचना तंत्र को मजबूत करना शामिल है।
इन उपायों से समय रहते ट्रेन चालकों को सतर्क किया जा सकता है और वन्यजीवों को ट्रैक से दूर रखने में मदद मिल सकती है।
देश के विभिन्न राज्यों में ट्रेन से टकराकर हाथियों की मौत की घटनाएं पूर्व में भी सामने आती रही हैं, जो वन्यजीव संरक्षण व्यवस्था के लिए गंभीर चुनौती मानी जाती हैं।
जैव विविधता के लिए संवेदनशील है मैकलुस्कीगंज क्षेत्र
मैकलुस्कीगंज और आसपास का इलाका जैव विविधता की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। यहां घने जंगल, वन्यजीवों की आवाजाही और पारंपरिक प्राकृतिक गलियारे मौजूद हैं। ऐसे में विकास परियोजनाओं और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन बनाना अत्यंत आवश्यक हो गया है।
यह घटना एक बार फिर यह सवाल खड़ा करती है कि क्या विकास की रफ्तार के साथ-साथ संरक्षण उपाय भी उतनी ही मजबूती से लागू किए जा रहे हैं, या फिर वन्यजीव लगातार जोखिम में धकेले जा रहे हैं।
न्यूज़ देखो: विकास और संरक्षण के बीच संतुलन की चुनौती
हाथी शावक की मौत केवल एक हादसा नहीं, बल्कि संरक्षण व्यवस्था की कमजोरियों का संकेत है। एलीफेंट कॉरिडोर जैसे संवेदनशील क्षेत्रों में विशेष सुरक्षा उपायों की तत्काल जरूरत है। यदि समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो मानव-वन्यजीव संघर्ष और बढ़ सकता है। हर खबर पर रहेगी हमारी नजर।
प्रकृति की रक्षा ही भविष्य की सुरक्षा
वन्यजीवों का संरक्षण हम सबकी सामूहिक जिम्मेदारी है।
विकास के साथ पर्यावरण संतुलन जरूरी है।
कॉरिडोर क्षेत्रों में सख्त सुरक्षा लागू होनी चाहिए।
संवेदनशील क्षेत्रों में जनजागरूकता भी उतनी ही आवश्यक है।
आइए, प्रकृति और वन्यजीवों की सुरक्षा के लिए आवाज उठाएं।
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