
#लातेहार #पेसा_विरोध : पेसा नियमावली को लेकर सरकार पर आदिवासी स्वशासन कमजोर करने का आरोप।
लातेहार जिले में पेसा कानून के कथित उल्लंघन को लेकर आदिवासी समाज का आक्रोश खुलकर सामने आया है। आदिवासी बुद्धिजीवी मंच ने झारखंड सरकार के खिलाफ समाहरणालय गेट पर जोरदार विरोध प्रदर्शन किया। मंच का आरोप है कि हाल में जारी पेसा नियमावली में ग्राम सभा की सर्वोच्चता को कमजोर किया गया है। इस मुद्दे को लेकर मुख्यमंत्री सहित जनप्रतिनिधियों के पुतले दहन कर विरोध जताया गया।
- आदिवासी बुद्धिजीवी मंच द्वारा समाहरणालय गेट पर विरोध प्रदर्शन।
- झारखंड उच्च न्यायालय के 29 जुलाई 2024 के आदेश का हवाला।
- पेसा नियमावली में ग्राम सभा की शक्ति कमजोर करने का आरोप।
- मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन सहित जनप्रतिनिधियों के पुतले दहन।
- अनुसूचित क्षेत्रों में पारंपरिक स्वशासन के उल्लंघन का दावा।
लातेहार जिले में अनुसूचित क्षेत्रों में लागू पेसा कानून को लेकर एक बार फिर आदिवासी समाज में असंतोष गहराता नजर आया। आदिवासी बुद्धिजीवी मंच के बैनर तले बड़ी संख्या में आदिवासी सामाजिक कार्यकर्ता, बुद्धिजीवी और ग्रामीण समाहरणालय गेट पर एकत्र हुए और राज्य सरकार की नीतियों के खिलाफ जोरदार प्रदर्शन किया। प्रदर्शनकारियों का कहना है कि पेसा कानून का उद्देश्य ग्राम सभा को सर्वोच्च बनाना है, लेकिन नई नियमावली इसके विपरीत है।
पेसा कानून और न्यायालय का आदेश
प्रदर्शन के दौरान वक्ताओं ने बताया कि झारखंड उच्च न्यायालय ने 29 जुलाई 2024 को एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया था कि अनुसूचित क्षेत्रों में लागू झारखंड पंचायत राज अधिनियम, 2001, केंद्रीय कानून पेसा अधिनियम 1996 के प्रावधानों के अनुरूप नहीं है। न्यायालय ने राज्य सरकार को दो माह के भीतर पेसा के अनुरूप नियमावली लागू करने का स्पष्ट निर्देश दिया था।
अवमानना मामला और नियमावली का विवाद
आदिवासी बुद्धिजीवी मंच के अनुसार, निर्धारित समय-सीमा में आदेश का पालन नहीं होने पर 9 दिसंबर 2024 को पाँच वरिष्ठ आईएएस अधिकारियों के खिलाफ न्यायालय अवमानना अधिनियम के तहत मामला दर्ज कराया गया। इसके बाद सरकार ने 23 दिसंबर 2025 को पेसा अधिनियम पारित किया और 2 जनवरी 2026 को उसकी नियमावली जारी की।
हालांकि मंच का आरोप है कि नई नियमावली में ग्राम सभा की सर्वोच्चता को कमजोर कर उपायुक्त सभा को अधिक अधिकार दिए गए हैं, जो पेसा कानून की मूल भावना के खिलाफ है।
आदिवासी संगठनों की मुख्य आपत्तियां
प्रदर्शनकारियों ने कहा कि पेसा कानून आदिवासी समाज के पारंपरिक स्वशासन, जल-जंगल-जमीन के अधिकार और ग्राम सभा की स्वायत्तता की रक्षा के लिए बनाया गया है। लेकिन नई नियमावली में निर्णय प्रक्रिया को प्रशासनिक नियंत्रण में देकर ग्राम सभा की भूमिका सीमित कर दी गई है।
एक वक्ता ने कहा:
आदिवासी बुद्धिजीवी मंच के प्रतिनिधि ने कहा: “पेसा कानून का मूल उद्देश्य ग्राम सभा को सर्वोच्च बनाना है, लेकिन सरकार की नियमावली इस भावना को कमजोर कर रही है।”
पुतला दहन और आक्रोश
अपनी मांगों को लेकर प्रदर्शनकारियों ने समाहरणालय गेट पर झारखंड सरकार, मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन और अन्य जनप्रतिनिधियों के पुतले दहन किए। इस दौरान सरकार के खिलाफ नारेबाजी की गई और पेसा कानून को आदिवासी हितों के अनुरूप संशोधित करने की मांग की गई।
प्रदर्शनकारियों का कहना था कि यदि सरकार ने जल्द ही नियमावली में संशोधन नहीं किया, तो आंदोलन को राज्यव्यापी स्तर पर तेज किया जाएगा।
अनुसूचित क्षेत्रों में बढ़ता असंतोष
आदिवासी संगठनों ने चेतावनी दी कि पेसा कानून के कमजोर क्रियान्वयन से अनुसूचित क्षेत्रों में सामाजिक तनाव बढ़ सकता है। उनका कहना है कि ग्राम सभा की अनदेखी से आदिवासी समाज का विश्वास शासन-प्रशासन से उठता जा रहा है, जो लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए गंभीर संकेत है।
न्यूज़ देखो: पेसा पर टकराव और आदिवासी स्वशासन की परीक्षा
यह मामला दर्शाता है कि पेसा कानून का क्रियान्वयन केवल औपचारिकता बनकर रह गया है। न्यायालय के आदेश के बावजूद नियमावली को लेकर उठ रहे सवाल सरकार की मंशा पर प्रश्नचिह्न खड़े करते हैं। ग्राम सभा की सर्वोच्चता को लेकर स्पष्टता और पारदर्शिता जरूरी है। अब यह देखना अहम होगा कि सरकार आदिवासी संगठनों की आपत्तियों पर क्या कदम उठाती है। हर खबर पर रहेगी हमारी नजर।
आदिवासी अधिकारों की रक्षा के लिए सजग रहना जरूरी
पेसा कानून केवल एक अधिनियम नहीं, बल्कि आदिवासी स्वशासन की आत्मा है। इसके सही क्रियान्वयन से ही जल, जंगल और जमीन पर समुदाय का अधिकार सुरक्षित रह सकता है। लोकतंत्र में जनभागीदारी तभी मजबूत होती है, जब ग्राम सभा सशक्त हो। इस मुद्दे पर आपकी राय बेहद महत्वपूर्ण है। अपनी सोच कमेंट में साझा करें, खबर को आगे बढ़ाएं और आदिवासी अधिकारों के प्रति जागरूकता फैलाने में सहभागी बनें।





