
#लातेहार #उच्च_शिक्षा : यूजीसी बिल को लेकर सामाजिक कार्यकर्ता ने जताई गंभीर आपत्ति।
केंद्र सरकार द्वारा प्रस्तावित यूजीसी बिल को लेकर देशभर में बहस तेज हो गई है। लातेहार में सामाजिक कार्यकर्ता अंकित कुमार तिवारी ने इस बिल को उच्च शिक्षा की स्वायत्तता के लिए खतरा बताया है। उनका कहना है कि इससे विश्वविद्यालयों की स्वतंत्रता, मेरिट आधारित व्यवस्था और मध्यम वर्गीय छात्रों की शैक्षणिक संभावनाएं प्रभावित होंगी। उन्होंने सरकार से बिल पर पुनर्विचार की मांग की है।
- यूजीसी बिल को लेकर शिक्षाविदों और सामाजिक संगठनों में चिंता।
- अंकित कुमार तिवारी ने उच्च शिक्षा की स्वायत्तता पर संकट की बात कही।
- नियुक्ति, पदोन्नति और अकादमिक निर्णयों पर असर की आशंका।
- सवर्ण और मध्यम वर्गीय छात्रों पर आर्थिक व शैक्षणिक दबाव बढ़ने की चेतावनी।
- सरकार से बिल वापस लेने या व्यापक विमर्श की मांग।
केंद्र सरकार द्वारा प्रस्तावित और लागू किए जा रहे विश्वविद्यालय अनुदान आयोग यानी यूजीसी बिल को लेकर देश के विभिन्न हिस्सों में असहमति और चिंता के स्वर लगातार तेज होते जा रहे हैं। शिक्षाविदों, छात्र संगठनों और सामाजिक कार्यकर्ताओं का मानना है कि यह बिल उच्च शिक्षा व्यवस्था की मूल भावना और स्वायत्तता को प्रभावित कर सकता है। इसी क्रम में लातेहार में ब्राह्मण समाज से जुड़े सामाजिक कार्यकर्ता अंकित कुमार तिवारी ने यूजीसी बिल का खुलकर विरोध किया है और इसे देश की शिक्षा व्यवस्था के लिए गंभीर चुनौती बताया है।
यूजीसी बिल और स्वायत्तता पर सवाल
अंकित कुमार तिवारी ने कहा कि यूजीसी बिल के माध्यम से विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों की स्वायत्तता को सीमित किया जा रहा है। उनका कहना है कि अब तक उच्च शिक्षण संस्थानों को शैक्षणिक, प्रशासनिक और अकादमिक निर्णय लेने की एक स्वतंत्र व्यवस्था प्राप्त थी, लेकिन नए प्रावधानों से यह स्वतंत्रता कमजोर हो सकती है।
उन्होंने आशंका जताई कि यदि संस्थानों के निर्णयों में बाहरी हस्तक्षेप बढ़ा, तो इसका सीधा असर शिक्षा की गुणवत्ता और शोध के स्तर पर पड़ेगा।
नियुक्ति और पदोन्नति व्यवस्था पर प्रभाव
अंकित तिवारी ने यह भी कहा कि यूजीसी बिल के लागू होने से शिक्षकों की नियुक्ति, पदोन्नति और मूल्यांकन प्रक्रिया में पारदर्शिता घट सकती है। उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालयों में योग्य शिक्षकों का चयन किसी भी शिक्षा व्यवस्था की रीढ़ होता है। यदि यह प्रक्रिया प्रभावित हुई, तो छात्रों को मिलने वाली शिक्षा का स्तर भी गिर सकता है।
उन्होंने कहा कि अकादमिक निर्णयों में स्वतंत्रता का अभाव रचनात्मकता और नवाचार को भी बाधित करेगा।
सवर्ण समाज और मेरिट आधारित व्यवस्था
अंकित कुमार तिवारी ने विशेष रूप से सामान्य वर्ग और सवर्ण समाज के छात्रों की स्थिति पर चिंता जताई। उन्होंने कहा कि इस वर्ग के अधिकांश छात्र बिना किसी आरक्षण के केवल मेरिट और कठिन परिश्रम के आधार पर आगे बढ़ते हैं। पहले से ही सीमित संसाधनों और कड़ी प्रतिस्पर्धा का सामना कर रहे इन छात्रों के लिए यूजीसी बिल के बाद उच्च शिक्षा और अधिक कठिन हो सकती है।
उनका कहना है कि यदि शिक्षा प्रणाली में संतुलन नहीं रहा, तो मेरिट आधारित व्यवस्था कमजोर पड़ सकती है, जिससे योग्य और प्रतिभाशाली छात्रों का मनोबल टूटेगा।
बढ़ती महंगाई और मध्यम वर्ग पर बोझ
अंकित तिवारी ने यह भी कहा कि यूजीसी बिल के कारण उच्च शिक्षा महंगी होने की आशंका है। इसका सबसे ज्यादा असर मध्यम वर्गीय परिवारों पर पड़ेगा, जो पहले ही सीमित आय में बच्चों को उच्च शिक्षा दिलाने का प्रयास करते हैं।
उन्होंने चेतावनी दी कि यदि शिक्षा का खर्च बढ़ा, तो कई प्रतिभाशाली छात्र आर्थिक कारणों से अपनी पढ़ाई अधूरी छोड़ने को मजबूर हो सकते हैं, जो देश के भविष्य के लिए गंभीर चिंता का विषय है।
शिक्षा को साझा धरोहर बताया
अपने बयान में अंकित कुमार तिवारी ने स्पष्ट कहा कि शिक्षा किसी एक वर्ग, सरकार या विचारधारा की निजी संपत्ति नहीं है। यह पूरे समाज की साझा धरोहर है और इसका संरक्षण सभी की जिम्मेदारी है।
उन्होंने कहा कि यूजीसी जैसे संवैधानिक और स्वायत्त संस्थान को कमजोर करना देश के भविष्य के साथ समझौता करने जैसा है। उच्च शिक्षा ही वह आधार है, जिस पर देश का सामाजिक, आर्थिक और वैज्ञानिक विकास टिका हुआ है।
सरकार से पुनर्विचार की मांग
अंत में अंकित तिवारी ने केंद्र सरकार से मांग की कि यूजीसी बिल को तत्काल प्रभाव से वापस लिया जाए। यदि ऐसा संभव नहीं है, तो सभी वर्गों, शिक्षाविदों, छात्र संगठनों और सामाजिक प्रतिनिधियों के साथ व्यापक विमर्श के बाद ही कोई ठोस निर्णय लिया जाए।
उन्होंने कहा कि यह विरोध किसी वर्ग विशेष के खिलाफ नहीं है, बल्कि न्यायसंगत, संतुलित और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा व्यवस्था के समर्थन में है।
लोकतांत्रिक तरीके से विरोध की चेतावनी
अंकित कुमार तिवारी ने यह भी कहा कि यदि सरकार समय रहते इस मुद्दे पर पुनर्विचार नहीं करती है, तो छात्र समुदाय और सामाजिक संगठन लोकतांत्रिक तरीके से अपना विरोध दर्ज कराते रहेंगे। उनका कहना है कि संवाद और सहमति से ही शिक्षा सुधार संभव है, न कि एकतरफा फैसलों से।
न्यूज़ देखो: शिक्षा नीति पर संवाद की जरूरत
यूजीसी बिल को लेकर उठ रही आपत्तियां यह दर्शाती हैं कि उच्च शिक्षा केवल प्रशासनिक निर्णय का विषय नहीं है, बल्कि इससे करोड़ों छात्रों का भविष्य जुड़ा है। ऐसे में सरकार और समाज के बीच संवाद बेहद जरूरी है। क्या बिना व्यापक विमर्श के शिक्षा जैसे संवेदनशील क्षेत्र में बड़े बदलाव उचित हैं? हर खबर पर रहेगी हमारी नजर।
शिक्षा बचेगी तो भविष्य संवरेंगे
उच्च शिक्षा की मजबूती ही देश की असली ताकत है। जरूरी है कि हर वर्ग की आवाज सुनी जाए और संतुलित समाधान निकाला जाए।
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