#डुमरी #शिवगुरु_परिचर्चा : साप्ताहिक आयोजन में महिलाओं की सक्रिय भागीदारी, गुरु-शिष्य परंपरा को सशक्त करने पर जोर।
डुमरी में साप्ताहिक शिवगुरु परिचर्चा का आयोजन श्रद्धा और अनुशासन के साथ संपन्न हुआ। कार्यक्रम में बड़ी संख्या में महिलाओं और गुरु भाई-बहनों ने भाग लेकर गुरु-शिष्य परंपरा के महत्व पर चर्चा की। सामूहिक भजन, संवाद और गुरुवंदना के माध्यम से आध्यात्मिक वातावरण का निर्माण किया गया। परिचर्चा में शिवगुरु से जुड़ने के तीन सूत्र दया, चर्चा और नमन को जीवन में अपनाने का संदेश दिया गया।
- डुमरी में साप्ताहिक शिवगुरु परिचर्चा का आयोजन।
- कार्यक्रम की शुरुआत दीप प्रज्ज्वलन और गुरुवंदना से हुई।
- महिलाओं की बड़ी भागीदारी के साथ सामूहिक गुरु भजन।
- दया, चर्चा और नमन को जीवन का मार्गदर्शक सूत्र बताया गया।
- सामाजिक समरसता और संस्कारों के प्रसार पर विशेष जोर।
डुमरी प्रखंड में आयोजित साप्ताहिक शिवगुरु परिचर्चा ने आध्यात्मिक चेतना और सामाजिक एकता का संदेश दिया। ग्राम की महिलाओं ने बड़ी संख्या में एकत्रित होकर गुरु भजन और गुरु परिचर्चा के माध्यम से भारतीय संस्कृति में गुरु-शिष्य परंपरा की महत्ता को रेखांकित किया। कार्यक्रम का उद्देश्य न केवल आध्यात्मिक जागरूकता बढ़ाना था, बल्कि समाज में आपसी प्रेम, सहयोग और नैतिक मूल्यों को मजबूत करना भी रहा।
दीप प्रज्ज्वलन और गुरुवंदना से हुआ शुभारंभ
कार्यक्रम की शुरुआत विधिवत दीप प्रज्ज्वलित कर गुरुवंदना के साथ की गई। इसके बाद उपस्थित गुरु भाई-बहनों ने सामूहिक रूप से गुरु भजनों का गायन किया। भजनों से पूरा वातावरण शिवमय हो उठा और उपस्थित श्रद्धालुओं ने एक स्वर में शिवगुरु का स्मरण कर आध्यात्मिक ऊर्जा का अनुभव किया।
गुरु-शिष्य परंपरा पर हुई सार्थक चर्चा
परिचर्चा के दौरान वक्ताओं ने कहा कि गुरु केवल ज्ञान देने वाले नहीं होते, बल्कि वे जीवन को सही दिशा दिखाने वाले मार्गदर्शक होते हैं। गुरु-शिष्य संबंध भारतीय संस्कृति की आत्मा है, जिसे जीवित रखना प्रत्येक व्यक्ति का दायित्व है। वक्ताओं ने इस परंपरा को आधुनिक जीवन में भी उतना ही प्रासंगिक बताया।
शिवगुरु से जुड़ने के तीन प्रमुख सूत्र
परिचर्चा में शिवगुरु से जुड़ने के तीन महत्वपूर्ण सूत्रों पर विस्तार से प्रकाश डाला गया।
दया मांगना
बताया गया कि दया मांगने का अर्थ मन ही मन शिवगुरु से कृपा की याचना करना है। इससे व्यक्ति के भीतर करुणा और सकारात्मकता का भाव जागृत होता है।
शिवगुरु की चर्चा करना
चर्चा का आशय केवल बोलना नहीं, बल्कि सत्य और शिवतत्व पर विचार करना है। इससे ज्ञान का विस्तार होता है और जीवन में सही निर्णय लेने की क्षमता विकसित होती है।
नमन करना
नमन को समर्पण और विनम्रता का प्रतीक बताया गया। यह अहंकार त्याग कर शिष्यत्व के भाव को जागृत करता है। वक्ताओं ने कहा कि विनम्रता से ही ज्ञान का द्वार खुलता है और व्यक्ति आध्यात्मिक उन्नति की ओर अग्रसर होता है।
सामाजिक समरसता का माध्यम बनती परिचर्चा
शिवगुरु परिचर्चा को सामाजिक समरसता का सशक्त माध्यम बताया गया। सामूहिक भजन और संवाद से आपसी प्रेम, सहयोग और संस्कारों का प्रसार होता है। इससे समाज में सकारात्मक ऊर्जा और एकता का भाव मजबूत होता है।
अगले सप्ताह फिर आयोजन का निर्णय
कार्यक्रम का समापन पुनः दीप प्रज्ज्वलन और गुरु वंदना के साथ किया गया। अंत में यह निर्णय लिया गया कि आगामी सप्ताह में इसी प्रकार की परिचर्चा किसी अन्य गुरु भाई-बहन के घर में आयोजित की जाएगी, ताकि अधिक से अधिक लोग इस आध्यात्मिक प्रक्रिया से जुड़ सकें।
बड़ी संख्या में श्रद्धालु रहे उपस्थित
इस अवसर पर किरण देवी, ज्योति देवी, करुणा देवी, ललिता देवी, बेबी देवी, शकुंतला देवी, अंजू देवी, उमा देवी, मीना देवी, एकता देवी, मौसमी देवी, गीता देवी, प्रमिला देवी, जया देवी, उदय गुप्ता, संजय साहू सहित अन्य गुरु भाई-बहन उपस्थित थे।
न्यूज़ देखो: आध्यात्मिक संवाद से मजबूत होता सामाजिक ताना-बाना
डुमरी में आयोजित शिवगुरु परिचर्चा यह दर्शाती है कि आध्यात्मिक आयोजन केवल पूजा तक सीमित नहीं, बल्कि सामाजिक एकता और नैतिक मूल्यों को सुदृढ़ करने का माध्यम भी हैं। दया, चर्चा और नमन जैसे सूत्र व्यक्ति को आत्मचिंतन और विनम्रता की राह दिखाते हैं। ऐसे आयोजनों से समाज में सकारात्मक बदलाव की संभावना बढ़ती है। हर खबर पर रहेगी हमारी नजर।
आध्यात्मिक चेतना से सशक्त समाज
जब समाज आध्यात्मिक मूल्यों से जुड़ता है, तो आपसी समझ और सहयोग स्वतः बढ़ता है। शिवगुरु परिचर्चा जैसे आयोजन लोगों को जोड़ने और सही मार्ग पर चलने की प्रेरणा देते हैं।
अपने आसपास ऐसे सकारात्मक प्रयासों से जुड़ें और दूसरों को भी जोड़ें।
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