
#कोलेबिरा #सरहुल_पर्व : पारंपरिक रीति से प्रकृति पूजन और भव्य शोभायात्रा का आयोजन हुआ।
सिमडेगा जिले के कोलेबिरा प्रखंड में शनिवार को सरहुल पर्व पारंपरिक श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाया गया। नावाटोली बगीचा से शुरू हुए कार्यक्रम में विभिन्न जनजातीय समुदायों ने भाग लिया। पाहन द्वारा साल वृक्ष की पूजा कर खुशहाली की कामना की गई। शोभायात्रा और सांस्कृतिक प्रस्तुतियों ने आयोजन को विशेष बना दिया।
- कोलेबिरा प्रखंड में सरहुल पर्व हर्षोल्लास से मनाया गया।
- नावाटोली बगीचा से शुरू हुई पूजा और शोभायात्रा।
- पाहन द्वारा साल वृक्ष की विधि-विधान से पूजा-अर्चना।
- पारंपरिक वेशभूषा में ग्रामीणों की भव्य शोभायात्रा।
- कार्यक्रम में आश्रित इंदवार, अशोक इंदवार, जनेश्वर बिल्हौर सहित कई लोग शामिल।
सिमडेगा जिले के कोलेबिरा प्रखंड में शनिवार को प्रकृति के महापर्व सरहुल को पारंपरिक आस्था और उल्लास के साथ मनाया गया। इस अवसर पर पूरा क्षेत्र मांदर की थाप और ‘जय सरना’ के उद्घोष से गूंज उठा। विभिन्न जनजातीय समुदायों के लोगों ने एकजुट होकर इस पर्व को मनाया, जिसमें प्रकृति के प्रति आभार और सांस्कृतिक एकता की झलक साफ दिखाई दी।
नावाटोली बगीचा से शुरू हुआ पारंपरिक अनुष्ठान
सरहुल पर्व के अवसर पर कार्यक्रम की शुरुआत नावाटोली बगीचा से हुई, जहां आदिवासी लोहारा समाज, चिक बड़ाईक समाज सहित कई समुदायों के लोग एकत्रित हुए। यहां पाहन द्वारा सखुआ यानी साल वृक्ष की पूजा-अर्चना विधि-विधान से की गई।
पाहन ने नए फल-फूल अर्पित कर क्षेत्र की समृद्धि, बेहतर खेती और समाज की खुशहाली की कामना की। यह अनुष्ठान प्रकृति और मानव के गहरे संबंध को दर्शाता है, जो सरहुल पर्व का मूल संदेश भी है।
भव्य शोभायात्रा में झलकी सांस्कृतिक विरासत
पूजा-अर्चना के बाद नावाटोली से एक भव्य शोभायात्रा निकाली गई, जिसमें सैकड़ों की संख्या में महिला-पुरुष और युवा शामिल हुए। पारंपरिक वेशभूषा में सजे प्रतिभागी ढोल-नगाड़ों, मांदर और डीजे की धुन पर नाचते-गाते हुए सरना स्थल की ओर बढ़े।
रास्ते भर युवाओं का उत्साह देखने लायक था। ग्रामीणों ने गीत और नृत्य के माध्यम से अपनी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत का प्रदर्शन किया, जिससे पूरा क्षेत्र उत्सवमय हो गया।
सरना स्थल पर सामूहिक पूजा और प्रसाद वितरण
शोभायात्रा के सरना स्थल पहुंचने के बाद सामूहिक पूजा-अर्चना की गई। श्रद्धालुओं ने प्रकृति के प्रति आभार व्यक्त करते हुए आरती की और एक-दूसरे के बीच प्रसाद का वितरण किया।
यह आयोजन केवल धार्मिक परंपरा नहीं, बल्कि सामाजिक समरसता और सामूहिक सहभागिता का प्रतीक भी बना, जिसमें सभी वर्गों के लोगों ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया।
गणमान्य लोगों की रही सक्रिय भागीदारी
कार्यक्रम को सफल बनाने और ग्रामीणों का उत्साह बढ़ाने के लिए कई गणमान्य लोग उपस्थित रहे। इनमें मुख्य रूप से आश्रित इंदवार, अशोक इंदवार, जनेश्वर बिल्हौर, चिंतामणि कुमार शामिल थे।
इसके अलावा थाना प्रभारी हर्ष कुमार, मुखिया अंजना लकड़ा, अंचलाधिकारी अनूप कच्छप सहित हजारों की संख्या में ग्रामीण सरना स्थल पर मौजूद रहे। सभी ने मिलकर इस पर्व को यादगार बनाया।
संस्कृति और प्रकृति के प्रति आभार का पर्व
सरहुल केवल एक त्योहार नहीं, बल्कि प्रकृति के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का माध्यम है। इस दिन लोग प्रकृति से मिले संसाधनों के लिए धन्यवाद देते हैं और पर्यावरण के संरक्षण का संदेश भी देते हैं।
समाज के प्रबुद्ध लोगों ने इस अवसर पर अपनी सांस्कृतिक परंपराओं को अक्षुण्ण बनाए रखने और आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाने का संकल्प लिया।
न्यूज़ देखो: परंपरा, प्रकृति और समाज का मजबूत जुड़ाव
कोलेबिरा में मनाया गया सरहुल पर्व यह दिखाता है कि आधुनिकता के दौर में भी पारंपरिक संस्कृति और प्रकृति के प्रति सम्मान कायम है। यह आयोजन सामाजिक एकता और सांस्कृतिक पहचान को मजबूत करने का माध्यम बना। अब चुनौती यह है कि इन परंपराओं को नई पीढ़ी के साथ जोड़कर आगे बढ़ाया जाए। हर खबर पर रहेगी हमारी नजर।
अपनी जड़ों से जुड़ें और प्रकृति का सम्मान करें
सरहुल जैसे पर्व हमें यह याद दिलाते हैं कि हमारी असली ताकत हमारी संस्कृति और प्रकृति से जुड़ाव में है। आज के समय में जब पर्यावरण संकट बढ़ रहा है, ऐसे त्योहार हमें संतुलन बनाए रखने की सीख देते हैं।
हर व्यक्ति को चाहिए कि वह अपनी परंपराओं को समझे और उन्हें आगे बढ़ाने में योगदान दे। समाज में एकता और भाईचारा बनाए रखना भी हमारी जिम्मेदारी है।
आइए, इस पर्व से प्रेरणा लेकर हम प्रकृति की रक्षा और सांस्कृतिक धरोहर को संजोने का संकल्प लें। अपनी राय कमेंट करें, इस खबर को अधिक से अधिक लोगों तक साझा करें और जागरूकता फैलाने में अपनी भागीदारी निभाएं।






