डुमरी में सिरसी ता नाला (ककड़ोलता) परिसर में सामूहिक प्रार्थना सह पूजा को लेकर बैठक संपन्न

डुमरी में सिरसी ता नाला (ककड़ोलता) परिसर में सामूहिक प्रार्थना सह पूजा को लेकर बैठक संपन्न

author Aditya Kumar
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#डुमरी #ककड़ोलता #आदिवासीधार्मिकस्थल #सामूहिक_प्रार्थना : 5 फरवरी को होने वाले आयोजन की रूपरेखा तय

डुमरी प्रखंड अंतर्गत प्रसिद्ध आदिवासी धार्मिक स्थल सिरसी ता नाला उर्फ ककड़ोलता परिसर में रविवार को आगामी 5 फरवरी को आयोजित होने वाले सामूहिक प्रार्थना सह पूजा कार्यक्रम को लेकर एक महत्वपूर्ण बैठक आयोजित की गई। बैठक में कार्यक्रम को सफल और भव्य बनाने हेतु विभिन्न पहलुओं पर विस्तार से चर्चा की गई।

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  • 5 फरवरी को सामूहिक प्रार्थना सह पूजा कार्यक्रम का आयोजन
  • ककड़ोलता परिसर में हुई महत्वपूर्ण तैयारी बैठक
  • पूजा विधि, व्यवस्थाओं और सहभागिता पर मंथन
  • कार्यक्रम को भव्य व सुव्यवस्थित बनाने पर जोर

डुमरी प्रखंड के प्रसिद्ध आदिवासी धार्मिक स्थल सिरसी ता नाला उर्फ ककड़ोलता परिसर में आयोजित बैठक की अध्यक्षता धर्मगुरु बंधन तिग्गा ने की। बैठक के दौरान आगामी 5 फरवरी को होने वाले सामूहिक प्रार्थना सह पूजा कार्यक्रम की रूपरेखा, पूजा विधि, व्यवस्थाएं तथा श्रद्धालुओं की सहभागिता को लेकर विस्तार से विचार-विमर्श किया गया।

जिम्मेदारियों का हुआ निर्धारण

धर्मगुरु बंधन तिग्गा ने बताया कि कार्यक्रम को सुव्यवस्थित और भव्य बनाने के उद्देश्य से अलग-अलग कार्यों के लिए जिम्मेदारियां तय की गई हैं, ताकि आयोजन में किसी प्रकार की अव्यवस्था न हो और श्रद्धालुओं को सुविधा मिल सके।

अधिक से अधिक सहभागिता की अपील

बैठक में धर्मगुरु बंधन तिग्गा ने क्षेत्र के सभी श्रद्धालुओं एवं समाज के लोगों से अपील की कि वे अधिक से अधिक संख्या में उपस्थित होकर सामूहिक प्रार्थना सह पूजा कार्यक्रम को सफल बनाएं। उन्होंने कहा कि यह आयोजन आदिवासी आस्था, परंपरा और सामूहिक एकता का प्रतीक है।

गणमान्य लोगों की रही उपस्थिति

इस बैठक में राष्ट्रीय प्रचारिका कमले, शीला, संजय पहान, जून उरांव, वासुदेव भगत, श्रीराम उरांव, सुरेश भगत सहित कई गणमान्य लोग उपस्थित थे। सभी ने कार्यक्रम की सफलता के लिए सहयोग देने का आश्वासन दिया।

न्यूज़ देखो विश्लेषण

ककड़ोलता जैसे पवित्र आदिवासी धार्मिक स्थल पर आयोजित सामूहिक प्रार्थना न केवल आस्था का केंद्र है, बल्कि समाज को एकजुट करने और सांस्कृतिक परंपराओं को सहेजने का भी सशक्त माध्यम है। बैठक में की गई तैयारी आयोजन को और अधिक प्रभावशाली बनाएगी।

आस्था और एकता का संगम

सामूहिक सहभागिता से ही परंपराएं जीवित रहती हैं।
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Written by

डुमरी, गुमला

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