
#गुमला #स्वतंत्रता_संग्राम : आदिवासी क्रांतिकारी तेलंगा खड़िया के साहस और बलिदान को श्रद्धांजलि दी गई।
गुमला जिले में वीर आदिवासी क्रांतिकारी तेलंगा खड़िया की जन्मजयंती पर उनके साहस और स्वतंत्रता संग्राम में योगदान को याद किया गया। तेलंगा खड़िया ने ब्रिटिश राज के खिलाफ सशस्त्र प्रतिरोध और पंचायतों के माध्यम से संगठन किया। उनका नेतृत्व आदिवासी समाज के स्वशासन और भूमि अधिकारों की रक्षा के लिए महत्वपूर्ण था। उनके बलिदान ने आदिवासियों में स्वतंत्रता की चेतना को मजबूती दी।
- वीर आदिवासी क्रांतिकारी तेलंगा खड़िया का जन्म 1806 में गुमला के मुरगु गांव में हुआ।
- उन्होंने 13 पंचायतों का गठन कर आदिवासी स्वशासन स्थापित किया।
- युवाओं को हथियार प्रशिक्षण दिया और सशस्त्र सेना बनाई।
- 1850-1860 में उनके नेतृत्व में ब्रिटिश राज के खिलाफ विद्रोह चरम पर गया।
- उन्हें लोहरदगा और कलकत्ता जेल में 18 वर्ष की सजा दी गई।
- 23 अप्रैल 1880 को ब्रिटिश एजेंट ने उन्हें गोली मारकर सोसो नीम टोली गांव में दफनाया।
भारत के स्वतंत्रता संग्राम में आदिवासी नायकों का योगदान अक्सर हाशिये पर रहा। वीर तेलंगा खड़िया ने अपने साहस, नेतृत्व और संगठन क्षमता से आदिवासी समाज में स्वतंत्रता की चेतना जगाई।
प्रारंभिक जीवन और आदिवासी मूल
तेलंगा खड़िया का जन्म 9 फरवरी 1806 को गुमला जिले के मुरगु गांव में हुआ। उनके पिता ठुईया खड़िया और माता पेती खड़िया साधारण किसान थे। बचपन से ही उनमें साहस, ईमानदारी और सामाजिक संवेदनशीलता के गुण दिखाई देने लगे। वे शारीरिक और वैचारिक रूप से सशक्त थे।
परहा प्रणाली और ब्रिटिश हस्तक्षेप
छोटानागपुर क्षेत्र में आदिवासियों की पारंपरिक स्वशासन व्यवस्था—परहा प्रणाली—1850 तक प्रभावी रूप से कार्य कर रही थी। यह सामुदायिक न्याय, भूमि अधिकार और सामाजिक संतुलन पर आधारित थी। लेकिन ब्रिटिश प्रशासन ने भू-राजस्व कानून और ज़मींदारी व्यवस्था के माध्यम से इसे तोड़ दिया। आदिवासियों को मालगुजारी देनी पड़ने लगी और न देने पर उनकी ज़मीनें जब्त की जाती थीं। यह आर्थिक शोषण के साथ उनकी अस्मिता पर भी हमला था।
संगठित प्रतिरोध और पंचायतों का गठन
तेलंगा खड़िया ने आदिवासी समाज को संगठित किया और गांव-गांव जूरी पंचायतें स्थापित कीं। ये पंचायतें ब्रिटिश शासन के समानांतर न्याय और निर्णय करती थीं। कुल 13 पंचायतें थीं, जो सिसई, गुमला, बसिया, सिमडेगा, कुम्हारी, कोलेबिरा, चैनपुर, महाबुआंग और बानो क्षेत्रों में फैली थीं। यह ब्रिटिश सत्ता के लिए सीधी चुनौती थी।
अखाड़ा और सशस्त्र सेना
उन्होंने युवाओं को तीर-कमान, तलवार, टांगी जैसे पारंपरिक हथियारों का प्रशिक्षण देने के लिए अखाड़ा स्थापित किया। धीरे-धीरे 900-1500 आदिवासी युवाओं की सशस्त्र सेना तैयार हुई। उनके नेतृत्व में ब्रिटिश राज के प्रतिष्ठानों, दलालों और खजानों पर हमले हुए। यह विद्रोह अंग्रेज़ी प्रशासन के लिए गंभीर संकट बन गया।
गिरफ्तारी, कैद और रिहाई
ब्रिटिश शासन ने उन्हें पकड़ने के लिए देशद्रोही की सूचना का सहारा लिया। एक पंचायत बैठक के दौरान उन्हें गिरफ्तार कर लोहरदगा जेल और कलकत्ता जेल में 18 वर्ष की कैद दी गई। जेल से रिहाई के बाद भी उन्होंने आंदोलन को पुनर्जीवित करने का प्रयास किया।
शहादत और अमर स्मृति
23 अप्रैल 1880 को ब्रिटिश एजेंट ने उन्हें घात लगाकर गोली मार दी। गंभीर रूप से घायल होकर वे वहीं गिर पड़े। उनके अनुयायियों ने शव को जंगल की ओर ले जाकर सोसो नीम टोली गांव में ‘तेलंगा टोपा टांड’ में दफनाया। आज यह स्थल उनके बलिदान की याद दिलाता है।
न्यूज़ देखो: तेलंगा खड़िया की गाथा और पीढ़ी के लिए संदेश
तेलंगा खड़िया का संघर्ष यह दिखाता है कि स्वतंत्रता केवल विचारों से नहीं, बलिदान और साहस से प्राप्त होती है। उनका नेतृत्व आदिवासी स्वशासन, न्याय और भूमि अधिकारों के प्रतीक के रूप में याद किया जाना चाहिए। आज उनकी गाथा पीढ़ियों तक पहुँचाना आवश्यक है। हर खबर पर रहेगी हमारी नजर।
वीरता और जागरूकता की प्रेरणा
आइए हम तेलंगा खड़िया के साहस और बलिदान से प्रेरणा लें। अपने अधिकारों के लिए सतत जागरूक रहें, सामाजिक अन्याय के खिलाफ आवाज उठाएँ और इतिहास से सीखकर समाज में बदलाव लाएँ। इस स्मृति-आह्वान में अपनी राय साझा करें, दूसरों तक फैलाएँ और उनके योगदान को सम्मान दें।








