
#दुमका #रक्तदान : गंभीर रूप से बीमार बुजुर्ग महिला के लिए आगे आकर बचाई जान।
दुमका सदर अस्पताल में भर्ती 68 वर्षीय महिला की जान उस समय बच सकी, जब तत्काल रक्त की आवश्यकता पड़ने पर समाजसेवी अब्दुल अफरोज ने 28वीं बार रक्तदान किया। महिला का हीमोग्लोबिन अत्यंत कम होने के कारण स्थिति नाजुक बनी हुई थी। जानकारी मिलते ही बिना देरी किए अब्दुल अफरोज ब्लड बैंक पहुंचे और आवश्यक रक्त उपलब्ध कराया। यह घटना मानवता, संवेदनशीलता और सामाजिक जिम्मेदारी का प्रेरक उदाहरण बन गई है।
- दुमका सदर अस्पताल में भर्ती 68 वर्षीय पुती मरांडी की हालत गंभीर।
- हीमोग्लोबिन स्तर 4.5 ग्राम तक गिरने से तत्काल रक्त की जरूरत।
- महिला को आवश्यक था AB+ ब्लड।
- अब्दुल अफरोज ने 28वीं बार रक्तदान कर बचाई जान।
- राजेश चौरसिया की सूचना और पहल से समय पर मिली मदद।
दुमका सदर अस्पताल में इलाजरत 68 वर्षीय पुती मरांडी, निवासी पाकुड़िया, की हालत उस समय बेहद नाजुक हो गई, जब जांच में उनका हीमोग्लोबिन मात्र 4.5 ग्राम पाया गया। चिकित्सकों ने स्थिति को गंभीर बताते हुए तत्काल AB+ रक्त की आवश्यकता जताई। परिजनों के लिए यह स्थिति बेहद चिंताजनक थी, क्योंकि समय पर रक्त मिलना मुश्किल नजर आ रहा था।
सूचना मिलते ही तुरंत पहुंचे अब्दुल अफरोज
इस आपात स्थिति की जानकारी राजेश चौरसिया के माध्यम से जैसे ही समाजसेवी अब्दुल अफरोज तक पहुंची, उन्होंने बिना किसी देरी के दुमका ब्लड बैंक पहुंचकर रक्तदान करने का निर्णय लिया। यह उनका 28वां रक्तदान था। उन्होंने न सिर्फ स्वयं रक्तदान किया, बल्कि एक्सचेंज प्रक्रिया के माध्यम से महिला के लिए आवश्यक रक्त भी उपलब्ध कराया।
गंभीर हालत में मिली नई जिंदगी
डॉक्टरों के अनुसार, समय पर रक्त उपलब्ध होने से मरीज की स्थिति में सुधार की उम्मीद जगी है। परिजनों ने बताया कि यदि कुछ देर और हो जाती, तो स्थिति और बिगड़ सकती थी। ऐसे में अब्दुल अफरोज का यह कदम किसी जीवनदान से कम नहीं है।
इंसानियत ने तोड़ी सभी दीवारें
इस पूरे घटनाक्रम में सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह रहा कि मदद करते समय न कोई धर्म देखा गया, न कोई पहचान। केवल एक इंसान की जान बचाने का संकल्प सामने था। अब्दुल अफरोज वर्षों से लगातार रक्तदान करते आ रहे हैं और जरूरत पड़ने पर हमेशा आगे खड़े रहते हैं।
राजेश चौरसिया की भूमिका भी रही अहम
इस नेक कार्य में राजेश चौरसिया की भूमिका भी सराहनीय रही, जिनके माध्यम से समय पर सही व्यक्ति तक सूचना पहुंची। उनकी तत्परता और सामाजिक सक्रियता ने एक बुजुर्ग महिला की जान बचाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया।
समाज के लिए प्रेरणा बना यह उदाहरण
स्थानीय लोगों और अस्पताल प्रशासन ने इस कार्य की सराहना करते हुए कहा कि ऐसे लोग ही समाज की असली ताकत होते हैं। लगातार 28 बार रक्तदान करना न केवल साहस का परिचायक है, बल्कि सामाजिक जिम्मेदारी की गहरी समझ को भी दर्शाता है।
न्यूज़ देखो: जब इंसानियत सबसे ऊपर होती है
यह घटना साबित करती है कि संकट की घड़ी में एक सही सूचना और एक संवेदनशील निर्णय जीवन बचा सकता है। अब्दुल अफरोज का 28वीं बार रक्तदान करना समाज के लिए प्रेरणास्रोत है। साथ ही यह सवाल भी उठता है कि क्या हम सब जरूरत पड़ने पर इतना ही संवेदनशील बन सकते हैं। ऐसे उदाहरणों को बढ़ावा देना समय की मांग है।
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रक्तदान नहीं, यह जीवनदान है
रक्तदान से बड़ा कोई दान नहीं होता। एक यूनिट रक्त किसी की सांसें लौटा सकता है, किसी परिवार की उम्मीद बचा सकता है। अब्दुल अफरोज जैसे लोग हमें याद दिलाते हैं कि इंसानियत ही सबसे बड़ा धर्म है।
अगर आप भी किसी जरूरतमंद की मदद कर सकते हैं, तो पीछे न हटें। अपनी राय साझा करें, इस खबर को आगे बढ़ाएं और समाज में रक्तदान के प्रति जागरूकता फैलाने में अपना योगदान दें।



