
#राजनीतिक_विमर्श : मनरेगा से गांधी का नाम हटाना लोकतांत्रिक मूल्यों पर सीधा हमला।
मैं, हृदयानंद मिश्र, मनरेगा से महात्मा गांधी का नाम हटाने के प्रयास को केवल प्रशासनिक बदलाव नहीं मानता। मेरे लिए यह भारतीय लोकतंत्र की नैतिक, ऐतिहासिक और मानवीय आत्मा पर सीधा आघात है। यह विषय ग्रामीण भारत, श्रम के अधिकार और संवैधानिक चेतना से गहराई से जुड़ा है। गांधी के नाम को अलग करना उस विचार को कमजोर करने का प्रयास है, जिस पर यह योजना आधारित है।
- महात्मा गांधी को मनरेगा से अलग करने का प्रयास मैंने वैचारिक हमला बताया।
- मनरेगा को मैंने अधिकार आधारित और गांधीवादी सोच की उपज कहा।
- भाजपा सरकार पर योजना को कमजोर करने और बजट घटाने का आरोप लगाया।
- आधार आधारित भुगतान और एनएमएमएस को मजदूर विरोधी व्यवस्था बताया।
- कांग्रेस पार्टी की ओर से मजदूरी 400 रुपये और 150 कार्यदिवस की मांग रखी।
- इस पूरे मुद्दे को मैंने नैतिक और संवैधानिक संघर्ष बताया।
मनरेगा से महात्मा गांधी का नाम हटाने का प्रयास कोई साधारण प्रशासनिक निर्णय नहीं है। यह उस नैतिक, ऐतिहासिक और मानवीय विरासत पर सीधा हमला है, जिस पर आधुनिक भारत खड़ा है। यह कदम महात्मा गांधी की शारीरिक हत्या से भी अधिक जघन्य है, क्योंकि इसमें उनके विचारों, उनके मूल्यों और उनकी आत्मा को सार्वजनिक जीवन से मिटाने की कोशिश निहित है।
गांधी मेरे लिए व्यक्ति नहीं, विचार हैं
मैं मानता हूं कि महात्मा गांधी कोई साधारण नाम नहीं हैं। वे एक व्यक्ति नहीं, बल्कि एक विचार हैं। सत्य, अहिंसा, करुणा, त्याग और समाज के अंतिम व्यक्ति के उत्थान का विचार। दुनिया के अनेक देश गांधीवादी दर्शन से प्रेरणा लेते हैं। यह कोई संयोग नहीं है कि चीन जैसे देश की राजधानी बीजिंग के हृदय स्थल पर महात्मा गांधी की प्रतिमा स्थापित है। यह उनकी सार्वभौमिक स्वीकार्यता का प्रमाण है। ऐसे गांधी को भारत में योजनाओं से हटाने का प्रयास मुझे संकीर्ण और असहज राजनीतिक सोच का प्रतीक लगता है।
मनरेगा और गांधीवादी दर्शन का संबंध
महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम—मनरेगा—के साथ गांधी का नाम जुड़ा होना केवल प्रतीकात्मक नहीं, बल्कि वैचारिक है। यह योजना रोजगार को दया या कृपा नहीं, बल्कि अधिकार के रूप में स्थापित करती है। यही गांधी की मूल सोच थी—सम्मान के साथ काम, आत्मनिर्भरता और स्वाभिमान।
डॉ. मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार ने इस कानून को लागू कर ग्रामीण भारत के करोड़ों गरीब परिवारों को केवल काम नहीं, बल्कि आत्मसम्मान दिया। मेरे अनुभव और समझ में आज भी मनरेगा ग्रामीण भारत के लिए सबसे मजबूत सामाजिक सुरक्षा कवच है।
बजट कटौती और योजना को कमजोर करने का प्रयास
मुझे यह कहते हुए दुख होता है कि वर्तमान भाजपा सरकार ने इस ऐतिहासिक योजना को लगातार कमजोर किया है और अब उसकी आत्मा से गांधी को अलग करने पर आमादा है। चालू वित्त वर्ष में मनरेगा के लिए मात्र 86,000 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है, जबकि वास्तविक आवश्यकता इससे कहीं अधिक है। बजट में लगभग 4,000 करोड़ रुपये की कटौती की गई है और उपलब्ध राशि का करीब 20 प्रतिशत हिस्सा पुराने बकाया चुकाने में ही खर्च हो जाएगा। मेरे अनुसार ये आंकड़े साफ बताते हैं कि योजना को जानबूझकर पंगु बनाया जा रहा है।
तकनीकी प्रक्रियाएं और मजदूरों का बहिष्करण
आज मनरेगा कई गंभीर चुनौतियों से जूझ रही है। आधार आधारित भुगतान प्रणाली और नेशनल मोबाइल मॉनिटरिंग सिस्टम (NMMS) जैसी व्यवस्थाएं उन गरीब मजदूरों के लिए बहिष्करणकारी साबित हो रही हैं, जिनके पास न स्मार्टफोन है, न स्थिर इंटरनेट और न तकनीकी साक्षरता। मजदूरी भुगतान में महीनों की देरी आम बात हो गई है, जबकि महंगाई लगातार बढ़ रही है और मजदूरी दरें जमी हुई हैं। इससे योजना का मूल उद्देश्य—सम्मानजनक रोजगार—खोखला होता जा रहा है।
कांग्रेस पार्टी की स्पष्ट मांगें
इन परिस्थितियों में कांग्रेस पार्टी की ओर से मैं यह मांग स्पष्ट रूप से रखता हूं कि मनरेगा के लिए पर्याप्त वित्तीय प्रावधान किया जाए, न्यूनतम दैनिक मजदूरी 400 रुपये निर्धारित हो, मजदूरी का समयबद्ध भुगतान सुनिश्चित किया जाए, आधार आधारित भुगतान और एनएमएमएस की अनिवार्यता समाप्त की जाए तथा गारंटीकृत कार्यदिवसों की संख्या 100 से बढ़ाकर 150 की जाए। मेरे लिए ये मांगें राजनीतिक नहीं, बल्कि मानवीय और संवैधानिक हैं।
मनरेगा मेरे लिए क्या है
मैं यह भी मानता हूं कि मनरेगा केवल एक योजना नहीं है। यह आज़ाद भारत की उस संवैधानिक चेतना का विस्तार है, जो नागरिक को अधिकार के रूप में जीवन की न्यूनतम गरिमा प्रदान करती है। किसी ग्रामीण परिवार के लिए मनरेगा का एक दिन का काम केवल मजदूरी नहीं होता—वह उस घर में जलते चूल्हे की लौ है, बच्चे की स्कूल फीस है, बीमार मां की दवा है और पलायन से बचने की आखिरी उम्मीद है। ऐसे में गांधी का नाम हटाना उस उम्मीद पर सीधा प्रहार है।
नाम, प्रतीक और राष्ट्रीय स्मृति
जब सत्ता यह तर्क देती है कि नाम से क्या फर्क पड़ता है, तो मैं यह याद दिलाना चाहता हूं कि इतिहास गवाह है—नाम और प्रतीक ही राष्ट्र की स्मृति को जीवित रखते हैं। यदि नाम से फर्क नहीं पड़ता, तो फिर गांधी का नाम हटाने की ज़िद क्यों? मेरे अनुसार यह गांधी के विचारों को सार्वजनिक जीवन से बाहर धकेलने का सुनियोजित प्रयास है।
न्यूज़ देखो: गांधी का नाम नहीं, विचार हटाने की कोशिश
यह लेख यह दिखाता है कि मनरेगा से गांधी को अलग करना केवल नाम बदलने की प्रक्रिया नहीं है। यह उस विचार से असहजता का संकेत है, जो सत्ता से सवाल पूछता है। सरकार की नीतियों, बजट प्राथमिकताओं और सामाजिक दृष्टि पर गंभीर प्रश्न खड़े होते हैं। यह बहस आने वाले समय में और व्यापक होगी। हर खबर पर रहेगी हमारी नजर।
विचार बचेंगे तभी लोकतंत्र बचेगा
यह संघर्ष किसी एक योजना या नाम का नहीं, बल्कि उस विचार का है जो कहता है—अंतिम व्यक्ति का उत्थान ही सच्चा राष्ट्रनिर्माण है।
यदि आप भी श्रम की गरिमा और सामाजिक न्याय में विश्वास रखते हैं, तो इस विमर्श को आगे बढ़ाइए।
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Guest Author:
हृदयानंद मिश्र
झारखंड के वरिष्ठ कांग्रेस नेता, अधिवक्ता एवं हिंदू धार्मिक न्यास बोर्ड, झारखंड सरकार के सदस्य।






