
#स्वतंत्रता_संग्राम : युगान्तर से अंडमान की कालकोठरी तक एक अदम्य क्रांतिकारी की जयंती पर स्मृति लेख।
भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के उग्र क्रांतिकारी आंदोलन के प्रमुख सूत्रधार बारीन्द्र कुमार घोष की जयंती पर यह विशेष आलेख उनके जीवन और संघर्ष को स्मरण करता है। युगान्तर पत्रिका से लेकर अनुशीलन समिति और मणिकतल्ला कांड तक उनकी भूमिका निर्णायक रही। अंडमान की सेल्युलर जेल में वर्षों की यातना के बाद भी उनके विचार नहीं टूटे। यह लेख बताता है कि बारीन्द्र कुमार घोष केवल क्रांतिकारी ही नहीं, बल्कि विचारशील पत्रकार और राष्ट्रचिंतक भी थे।
- बारीन्द्र कुमार घोष उग्र क्रांतिकारी आंदोलन के प्रमुख रणनीतिकार रहे।
- युगान्तर पत्रिका के माध्यम से अंग्रेजी शासन को दी वैचारिक चुनौती।
- अनुशीलन समिति और मणिकतल्ला पार्टी के संगठन में अहम भूमिका।
- 1908 में गिरफ़्तारी, मृत्यु-दंड और बाद में अंडमान जेल की सज़ा।
- रिहाई के बाद पत्रकारिता को बनाया राष्ट्रीय चेतना का माध्यम।
- जयंती पर उनका जीवन आज भी युवाओं को संघर्ष और विवेक का संदेश देता है।
भारतीय स्वतंत्रता संग्राम को यदि केवल कुछ प्रसिद्ध नामों तक सीमित कर दिया जाए, तो इतिहास के साथ अन्याय होगा। यह संघर्ष उन असंख्य क्रांतिकारियों के साहस, विचार और बलिदान का परिणाम था, जिन्होंने न तो सत्ता चाही और न ही यश, बल्कि केवल स्वतंत्र भारत का स्वप्न देखा। बारीन्द्र कुमार घोष ऐसे ही क्रांतिकारियों में अग्रणी थे। मेरा मानना है कि उनका जीवन उस पीढ़ी का प्रतिनिधित्व करता है, जिसने विचार और हिंसा, दोनों को परिस्थितियों के अनुसार साधन के रूप में देखा।
क्रांतिकारी चेतना का जन्म
मेरा जन्म 5 जनवरी 1880 को लंदन के निकट क्रॉयडन में हुआ। मेरे पिता डॉ. कृष्णनाथ घोष एक प्रतिष्ठित चिकित्सक थे और माता स्वर्णलता देवी समाज-सुधारक परिवार से थीं। बड़े भाई अरविंद घोष और विद्वान भाई मनमोहन घोष के सान्निध्य ने मेरे भीतर प्रारंभ से ही राष्ट्रचिंतन का बीज बो दिया। लेकिन मैंने अपने लिए एक अलग और कहीं अधिक जोखिम भरा मार्ग चुना—क्रांति का मार्ग।
शिक्षा से शस्त्र तक का सफर
प्रारंभिक शिक्षा देवगढ़ में हुई और 1901 में पटना कॉलेज से उच्च अध्ययन किया। इसके बाद बड़ौदा में सैन्य प्रशिक्षण लिया। वहीं मेरा संपर्क उन युवाओं से हुआ, जिनके भीतर अंग्रेजी शासन के प्रति असंतोष उबल रहा था। बंगाल विभाजन ने इस असंतोष को विद्रोह में बदल दिया। मुझे लगा कि केवल भाषण और याचिकाएं स्वतंत्रता नहीं दिला सकतीं।
युगान्तर शब्दों से विद्रोह
1906 में मैंने बंगाली साप्ताहिक युगान्तर का प्रकाशन शुरू किया। यह अख़बार मेरे लिए केवल पत्रकारिता नहीं था, बल्कि क्रांति का घोषणापत्र था। मेरे साथ भूपेन्द्रनाथ दत्त जैसे साथी जुड़े। युगान्तर के माध्यम से हमने युवाओं को बताया कि दासता स्वीकार करना अपराध है और बलिदान ही मुक्ति का मार्ग है।
अनुशीलन समिति का गठन
1907 में अनुशीलन समिति के गठन में मेरी सक्रिय भूमिका रही। प्रमथनाथ मित्र, सतीश चन्द्र बोस, चितरंजन दास, अरविंद घोष, सुरेन्द्रनाथ ठाकुर और सिस्टर निवेदिता जैसे व्यक्तित्व इससे जुड़े। हमारा उद्देश्य स्पष्ट था—शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक प्रशिक्षण के माध्यम से युवाओं को स्वतंत्रता के लिए तैयार करना।
ढाका अनुशीलन समिति और भवानी मंदिर
1904 में ढाका में अनुशीलन समिति का कार्यालय खोला गया, जहां पुल्लिन बिहारी दास और पी. मित्रा ने नेतृत्व किया। मैंने 1905 में ‘भवानी मंदिर’ पुस्तक लिखी, जिसमें यह विचार रखा कि स्वतंत्रता प्राप्ति तक क्रांतिकारी को संन्यासी जैसा जीवन जीना चाहिए। यह पुस्तक युवाओं में व्यापक रूप से पढ़ी गई।
मणिकतल्ला पार्टी और सशस्त्र संघर्ष
1907 में मैंने मणिकतल्ला पार्टी का गठन किया। यह संगठन बम निर्माण और गुप्त अभियानों का केंद्र बना। मणिकतल्ला बम कांड ने ब्रिटिश शासन की नींव हिला दी। यही वह क्षण था, जब मुझे सत्ता की पूरी क्रूरता का सामना करना पड़ा।
मृत्यु-दंड से अंडमान तक
1908 में मुझे गिरफ़्तार कर मृत्यु-दंड सुनाया गया। बाद में सज़ा बदलकर आजीवन कारावास कर दी गई और मुझे अंडमान की सेल्युलर जेल भेजा गया। दस वर्षों तक अमानवीय यातनाएं सहीं, लेकिन विचार नहीं टूटे। काला पानी मेरे लिए केवल सज़ा नहीं, बल्कि आत्ममंथन का काल था।
क्रांति के बाद की कलम
रिहाई के बाद मैंने सशस्त्र संघर्ष से दूरी बनाई और पत्रकारिता को माध्यम चुना। वसुमित्र और द स्टेट्समैन से जुड़कर मैंने राष्ट्र को चेताने का कार्य किया। अब मेरे लेखों में अनुभव, विवेक और भविष्य की चिंता अधिक थी। मैं मानता हूं कि स्वतंत्रता के बाद भी चेतन समाज की आवश्यकता होती है।
न्यूज़ देखो: विचार और बलिदान का संगम
बारीन्द्र कुमार घोष का जीवन यह दर्शाता है कि क्रांति केवल हथियारों से नहीं, बल्कि विचारों से भी लड़ी जाती है। उनका संघर्ष हमें यह सिखाता है कि समय के साथ साधन बदल सकते हैं, लेकिन लक्ष्य नहीं। आज के दौर में उनके विचार युवाओं के लिए प्रेरणा हैं। हर खबर पर रहेगी हमारी नजर।
जयंती पर स्मरण साहस से विवेक तक
बारीन्द्र कुमार घोष की जयंती केवल श्रद्धांजलि नहीं, आत्ममंथन का अवसर है।
क्या हम आज भी विचारों के लिए उतने ही साहसी हैं?
इतिहास से सीखें, वर्तमान को समझें और भविष्य के लिए सजग बनें।
इस लेख पर अपनी राय साझा करें, इसे आगे बढ़ाएं और स्वतंत्रता संग्राम के गुमनाम नायकों को स्मरण करें।
अतिथि लेखक परिचय:
यह लेख एक जयंती विशेषांक के रूप में अतिथि लेखक वरुण कुमार द्वारा लिखा गया है, जो भारतीय स्वतंत्रता संग्राम, क्रांतिकारी आंदोलनों और राष्ट्रवादी विचारधारा पर निरंतर लेखन करते रहे हैं। इतिहास को जनमानस तक पहुँचाना और गुमनाम नायकों को पहचान दिलाना उनका प्रमुख उद्देश्य है।






