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राजदाह धाम में पुल निर्माण से प्राकृतिक धरोहर पर संकट, उतवानी गंगा क्षेत्र में ब्लास्टिंग से बढ़ी चिंता

#सरिया #राजदाह_धाम : पुल निर्माण के दौरान पत्थरों की तोड़फोड़ से पर्यावरण और आस्था पर असर।

गिरिडीह के सरिया स्थित राजदाह धाम में पुल निर्माण कार्य के दौरान प्राकृतिक धरोहर को नुकसान पहुंचने का मामला सामने आया है। उतवानी गंगा क्षेत्र में ड्रिलिंग और ब्लास्टिंग से पत्थरों की तोड़फोड़ और कंपन की शिकायतें मिल रही हैं। स्थानीय लोगों ने वैकल्पिक स्थान पर पुल निर्माण की मांग उठाई है। प्रशासन से जांच और संरक्षण को प्राथमिकता देने की अपील की गई है।

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  • राजदाह धाम, सरिया में पुल निर्माण को लेकर विवाद।
  • उतवानी गंगा के प्राकृतिक पत्थरों को तोड़ने का आरोप।
  • दिन में ड्रिलिंग और रात में ब्लास्टिंग से कंपन की शिकायत।
  • ग्रामीणों ने 50 फीट नीचे निर्माण का विकल्प सुझाया।
  • प्राकृतिक विरासत और आस्था को नुकसान की आशंका।

गिरिडीह जिले के सरिया स्थित राजदाह धाम, जो अपनी प्राकृतिक सुंदरता और धार्मिक महत्व के लिए प्रसिद्ध है, इन दिनों एक गंभीर विवाद के केंद्र में है। यहां बहने वाली उतवानी गंगा की कल-कल धारा और पत्थरों से टकराती जलध्वनि वर्षों से लोगों के आकर्षण और आस्था का केंद्र रही है।

लेकिन वर्तमान में चल रहे पुल निर्माण कार्य ने इस क्षेत्र की प्राकृतिक पहचान को खतरे में डाल दिया है। स्थानीय ग्रामीणों और सामाजिक कार्यकर्ताओं का आरोप है कि निर्माण के दौरान प्राकृतिक पत्थरों को तोड़ा जा रहा है, जिससे इस स्थल की मूल संरचना और सुंदरता प्रभावित हो रही है।

प्राकृतिक धरोहर पर मंडराता संकट

राजदाह धाम केवल एक धार्मिक स्थल ही नहीं, बल्कि एक महत्वपूर्ण प्राकृतिक विरासत भी है। यहां की भौगोलिक संरचना और जलधारा का स्वरूप इसे विशेष बनाता है।

ग्रामीणों का कहना है कि इस धरोहर को संरक्षित रखने के लिए वैकल्पिक योजना बनाई जा सकती थी। यदि पुल निर्माण को लगभग 50 फीट नीचे स्थानांतरित किया जाता, तो इस प्राकृतिक संरचना को सुरक्षित रखा जा सकता था।

ड्रिलिंग और ब्लास्टिंग से बढ़ी परेशानी

स्थानीय लोगों के अनुसार, निर्माण कार्य के दौरान दिन में ड्रिलिंग और रात के समय ब्लास्टिंग की जा रही है।

इससे आसपास के गांवों में कंपन महसूस किया जा रहा है। कई ग्रामीणों ने बताया कि उनके घरों के दरवाजे और खिड़कियां तक हिलने लगती हैं, जिससे भय और असुरक्षा का माहौल बना हुआ है।

यह स्थिति न केवल पर्यावरणीय दृष्टिकोण से गंभीर है, बल्कि लोगों की सुरक्षा के लिए भी खतरा बन सकती है।

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आस्था और पर्यावरण दोनों पर असर

राजदाह धाम में हर साल बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं। यह स्थल धार्मिक आस्था के साथ-साथ प्राकृतिक सौंदर्य के लिए भी जाना जाता है।

ऐसे में इस तरह के निर्माण कार्यों से लोगों की भावनाएं भी आहत हो रही हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि विकास जरूरी है, लेकिन इसके लिए प्रकृति और विरासत को नुकसान पहुंचाना उचित नहीं है।

प्रशासन से जांच और हस्तक्षेप की मांग

स्थानीय नागरिकों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने प्रशासन से इस मामले की गंभीरता से जांच करने की मांग की है।

उन्होंने कहा कि निर्माण कार्य की प्रक्रिया की समीक्षा की जाए और यदि संभव हो तो वैकल्पिक समाधान अपनाया जाए, जिससे प्राकृतिक धरोहर को बचाया जा सके।

संतुलित विकास की आवश्यकता

यह मामला एक बार फिर इस बात को उजागर करता है कि विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन बनाए रखना कितना जरूरी है।

यदि योजनाओं को सोच-समझकर लागू किया जाए, तो दोनों उद्देश्यों को साथ लेकर चला जा सकता है। इसके लिए प्रशासन, इंजीनियरों और स्थानीय लोगों के बीच संवाद और समन्वय जरूरी है।

न्यूज़ देखो: विकास बनाम विरासत, निर्णय में संतुलन ही समाधान

राजदाह धाम का यह मामला एक महत्वपूर्ण संदेश देता है कि विकास कार्यों में प्राकृतिक और सांस्कृतिक विरासत की अनदेखी नहीं की जा सकती। प्रशासन को चाहिए कि वह स्थानीय लोगों की चिंताओं को गंभीरता से सुने और ऐसा समाधान निकाले, जिससे विकास भी हो और धरोहर भी सुरक्षित रहे। यह केवल एक क्षेत्र की नहीं, बल्कि पूरे समाज की जिम्मेदारी है। हर खबर पर रहेगी हमारी नजर।

प्रकृति बचाएं, विरासत को संजोएं

हमारी प्राकृतिक धरोहरें हमारी पहचान हैं, जिन्हें बचाना हम सभी का कर्तव्य है। यदि हम आज सतर्क नहीं हुए, तो आने वाली पीढ़ियां इन अनमोल धरोहरों से वंचित रह जाएंगी।

अपने आसपास के पर्यावरण की रक्षा करें, जागरूकता फैलाएं और जिम्मेदार नागरिक बनें। अपनी राय कमेंट में जरूर साझा करें, इस खबर को अधिक से अधिक लोगों तक पहुंचाएं और प्रकृति संरक्षण की मुहिम में अपना योगदान दें।

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Saroj Verma

दुमका/देवघर

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