
#गिरिडीह #आदिम_जनजाति : माल पहाड़िया सहित कई जनजातियों के अधिकार और योजनाओं पर एक दिवसीय सम्मेलन आयोजित हुआ।
गिरिडीह जिले के गाण्डेय प्रखंड अंतर्गत पंडरी पंचायत के ग्राम नईयासिंधा में भाकपा-माले के नेतृत्व में केन्द्रीय आदिम जनजाति माल पहाड़िया का एक दिवसीय सम्मेलन आयोजित किया गया। सम्मेलन में संथाल परगना क्षेत्र के विभिन्न जिलों से आई आदिम जनजातियों के प्रतिनिधियों ने भाग लिया। इस दौरान जनजातियों को मिलने वाले संवैधानिक अधिकार, जाति प्रमाण पत्र और सरकारी योजनाओं के क्रियान्वयन पर गंभीर चर्चा हुई। वक्ताओं ने अधिकारों से वंचित किए जाने पर आंदोलन का संकेत दिया।
- पंडरी पंचायत, नईयासिंधा में भाकपा-माले के लाल झंडे तले सम्मेलन आयोजित।
- माल पहाड़िया, भोक्ता, पूजहर, गंजु सहित कई जनजातियों की भागीदारी।
- पूर्व विधायक राजकुमार यादव और पुरन महतो रहे प्रमुख वक्ता।
- जाति प्रमाण पत्र और योजनाओं के लाभ न मिलने पर उठी आवाज।
- 12 फरवरी की देशव्यापी आम हड़ताल में भागीदारी का आह्वान।
गिरिडीह जिले के गाण्डेय प्रखंड में आदिम जनजातियों के अधिकारों को लेकर एक बड़ा राजनीतिक और सामाजिक जुटान देखने को मिला। पंडरी पंचायत अंतर्गत ग्राम नईयासिंधा में भाकपा-माले के तत्वावधान में केन्द्रीय आदिम जनजाति माल पहाड़िया का सम्मेलन आयोजित किया गया। इस सम्मेलन में झारखंड के अलावा संथाल परगना क्षेत्र के देवघर, दुमका, जामताड़ा और गिरिडीह जिलों से आए आदिम जनजाति प्रतिनिधियों ने शिरकत की। महिलाओं और पुरुषों की भारी उपस्थिति ने इस आयोजन को खास बना दिया।
कई जिलों से जुटे आदिम जनजाति प्रतिनिधि
सम्मेलन में माल पहाड़िया, भोक्ता, पूजहर, गंजु सहित अन्य आदिम जनजातियों के प्रतिनिधि शामिल हुए। इन समुदायों के लोगों ने अपने पारंपरिक जीवन, सामाजिक चुनौतियों और सरकारी नीतियों के प्रभाव को लेकर अनुभव साझा किए। वक्ताओं ने कहा कि ये जनजातियां पीढ़ियों से जंगल और पहाड़ों में जीवन यापन करती आ रही हैं, बावजूद इसके आज भी बुनियादी अधिकारों के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है।
प्रमुख अतिथियों की उपस्थिति और नेतृत्व
कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में धनवार के पूर्व विधायक कामरेड राजकुमार यादव और अखिल भारतीय किसान महासभा के राष्ट्रीय कार्यकारिणी सदस्य कामरेड पुरन महतो मौजूद रहे। सम्मेलन की अध्यक्षता पुरन महतो, बहादुर भोक्ता और कैलाश भोक्ता ने संयुक्त रूप से की, जबकि संचालन गाण्डेय विधानसभा प्रभारी कामरेड शंकर पाण्डेय ने किया।
अनुसूचित जनजाति दर्जे पर उठे सवाल
सम्मेलन को संबोधित करते हुए पूर्व विधायक कामरेड राजकुमार यादव ने कहा कि झारखंड में खरवार, भोक्ता, पूजहर, गंजु जैसी जनजातियों को लंबी लड़ाई के बाद भारत सरकार द्वारा वर्ष 2022 में गजट प्रकाशित कर अनुसूचित जनजाति के रूप में अधिसूचित किया गया। इसके बाद झारखंड सरकार ने सभी जिलों में इसे लागू करने के निर्देश भी जारी किए, लेकिन जमीनी स्तर पर स्थिति अलग है।
कामरेड राजकुमार यादव ने कहा: “अंचल अधिकारी और संबंधित विभाग जाति प्रमाण पत्र जारी करने में बेवजह बखेड़ा खड़ा कर लोगों को परेशान कर रहे हैं।”
उन्होंने कहा कि वन अधिकार कानून के बावजूद इन जनजातियों को जंगल और पहाड़ों से बेदखली का खतरा बना हुआ है। प्राकृतिक संसाधनों की लूट और पूंजीपरस्त नीतियों के कारण विस्थापन की मार सबसे ज्यादा इन्हीं समुदायों पर पड़ रही है।
योजनाओं से वंचित होने का आरोप
वक्ताओं ने आरोप लगाया कि आदिम जनजाति की पात्रता होने के बावजूद इन समुदायों को पेंशन, राशन, आवास, शिक्षा, चिकित्सा और मंईया सम्मान योजना जैसी सुविधाओं से वंचित रखा जा रहा है। इसे प्रशासनिक उदासीनता और राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी बताया गया।
आंदोलन की चेतावनी और आम हड़ताल का आह्वान
कामरेड राजकुमार यादव ने कहा कि यदि होली के बाद सरकार को ज्ञापन देने के बावजूद लाभकारी योजनाओं को लागू नहीं किया गया, तो बड़ा आंदोलन किया जाएगा। उन्होंने यह भी कहा कि मोदी सरकार ने पुराने श्रम कानून खत्म कर चार लेबर कोड लागू कर मजदूरों के साथ विश्वासघात किया है।
उन्होंने 12 फरवरी को प्रस्तावित देशव्यापी आम हड़ताल में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेने का आह्वान किया।
कई नेताओं ने रखा पक्ष
सम्मेलन को झारखंड-बिहार पहाड़िया जनजाति संघ के महामंत्री गणेश पहाड़िया, संगठन सचिव आनंद पहाड़िया, महिला नेत्री मीनू पहाड़िया, किशुन पुजहर, बहादुर भोक्ता, रिखिया सोनबा, भाकपा-माले गिरिडीह प्रखंड सचिव कामरेड मसूदन कोल्ह, पाण्डेय प्रखंड सचिव कामरेड दारा सिंह, जिला कमेटी सदस्य कामरेड राजेश सिन्हा, महताब अली मिर्जा और असंगठित मजदूर मोर्चा के केंद्रीय सचिव कामरेड कन्हैया पाण्डेय ने संबोधित किया।
सामाजिक चेतना पर दिया गया जोर
अध्यक्षीय भाषण में कामरेड पुरन महतो ने कहा कि आदिम जनजातियों के सामाजिक ताने-बाने को कमजोर करने की कोशिशें हो रही हैं। उन्होंने संविधान में मिले अधिकारों को जानने, शिक्षा को प्राथमिकता देने, नशे से दूर रहने और जल, जंगल, जमीन की रक्षा के लिए संगठित होने की अपील की।
सम्मेलन का समापन
सम्मेलन के अंत में कैलाश भोक्ता ने धन्यवाद ज्ञापन प्रस्तुत किया। इसके बाद खुले सत्र के समापन की घोषणा की गई। पूरे आयोजन के दौरान जनजातीय अधिकारों और संघर्ष की स्पष्ट झलक देखने को मिली।
न्यूज़ देखो: अधिकारों की लड़ाई में बढ़ता जनजातीय एकजुटता का स्वर
गाण्डेय में आयोजित यह सम्मेलन आदिम जनजातियों के भीतर बढ़ती राजनीतिक और सामाजिक चेतना को दर्शाता है। जाति प्रमाण पत्र और योजनाओं के क्रियान्वयन जैसे मुद्दे अब खुलकर सामने आ रहे हैं। प्रशासन और सरकार के लिए यह एक स्पष्ट संकेत है कि जमीनी समस्याओं को नजरअंदाज करना आगे टकराव को जन्म दे सकता है। आने वाले दिनों में इस मुद्दे पर आंदोलन की दिशा तय होती दिख रही है।
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अधिकार, सम्मान और भविष्य की लड़ाई
आदिम जनजातियों की यह आवाज केवल मांग नहीं, बल्कि अपने अस्तित्व और सम्मान की लड़ाई है। जब तक अधिकार जमीन पर लागू नहीं होंगे, तब तक लोकतंत्र अधूरा रहेगा।
समाज और प्रशासन दोनों की जिम्मेदारी है कि इन समुदायों को उनका हक समय पर मिले।
आपका क्या मानना है, क्या सरकारी योजनाएं वास्तव में जरूरतमंदों तक पहुंच पा रही हैं? अपनी राय साझा करें, इस खबर को आगे बढ़ाएं और जागरूकता की इस लड़ाई का हिस्सा बनें।



