
#सिमडेगा #चैती_छठ : सूर्य उपासना के चार दिवसीय महापर्व का आज से शुभारंभ हुआ।
सिमडेगा जिले में लोक आस्था का महापर्व चैती छठ नहाय-खाय के साथ शुरू हो गया है। चार दिवसीय इस व्रत में व्रती कठोर नियमों का पालन करते हुए सूर्य देव की आराधना करते हैं। जिले के उपायुक्त कंचन सिंह सहित कई श्रद्धालु इस व्रत का अनुष्ठान कर रहे हैं। यह पर्व धार्मिक आस्था, शुद्धता और प्रकृति के प्रति आभार का प्रतीक माना जाता है।
- सिमडेगा में नहाय-खाय के साथ चैती छठ महापर्व की शुरुआत।
- उपायुक्त कंचन सिंह सहित कई श्रद्धालु कर रहे व्रत।
- चार दिवसीय व्रत में 36 घंटे का निर्जला उपवास शामिल।
- 23 मार्च को खरना, 24 मार्च को अस्ताचलगामी सूर्य को अर्घ्य।
- 25 मार्च को उगते सूर्य को अर्घ्य देकर होगा समापन।
सिमडेगा जिले में आस्था और श्रद्धा का महापर्व चैती छठ आज नहाय-खाय के साथ विधिवत शुरू हो गया। इस चार दिवसीय कठिन व्रत में व्रती कठोर नियमों का पालन करते हुए सूर्य देव और छठी मैया की आराधना करते हैं। इस अवसर पर जिले के उपायुक्त कंचन सिंह सहित बड़ी संख्या में श्रद्धालु व्रत का पालन कर रहे हैं। पर्व के शुभारंभ के साथ ही जिले भर में धार्मिक माहौल बन गया है और घाटों पर तैयारियां भी पूरी कर ली गई हैं।
नहाय-खाय से होती है पवित्र शुरुआत
चैती छठ का पहला दिन नहाय-खाय के रूप में मनाया जाता है। इस दिन व्रती सुबह नदी, तालाब या अन्य पवित्र जल स्रोतों में स्नान कर शुद्धता का पालन करते हैं। इसके बाद घर में सात्विक भोजन तैयार किया जाता है, जिसमें कद्दू, चना दाल और अरवा चावल का विशेष महत्व होता है।
उपायुक्त कंचन सिंह ने भी इस दिन परंपरा का पालन करते हुए स्वयं गेहूं सुखाकर सात्विक भोजन तैयार किया और व्रत का शुभारंभ किया। यह दिन शरीर और मन की शुद्धि का प्रतीक माना जाता है।
खरना से शुरू होगा कठिन निर्जला व्रत
चैती छठ के दूसरे दिन यानी 23 मार्च को खरना पूजा का आयोजन किया जाएगा। इस दिन व्रती पूरे दिन निराहार रहते हैं और शाम को पूजा के बाद गुड़ और दूध से बनी खीर का प्रसाद ग्रहण करते हैं।
धार्मिक परंपरा के अनुसार: “खरना के बाद व्रती 36 घंटे का निर्जला उपवास शुरू करते हैं, जो छठ व्रत की सबसे कठिन साधना मानी जाती है।”
यह उपवास न केवल शारीरिक बल्कि मानसिक अनुशासन का भी प्रतीक होता है, जिसमें व्रती पूरी श्रद्धा और नियमों का पालन करते हैं।
अर्घ्य देने की परंपरा और धार्मिक आयोजन
तीसरे दिन यानी 24 मार्च को व्रती अस्ताचलगामी सूर्य को अर्घ्य अर्पित करेंगे। सिमडेगा जिले में केलाघाघ सूर्य मंदिर सरोवर तट सहित विभिन्न नदी और तालाबों के किनारे व्रती पूरी विधि-विधान से पूजा करेंगे।
चौथे और अंतिम दिन 25 मार्च को उगते सूर्य यानी उदयीमान भुवन भास्कर को अर्घ्य अर्पित किया जाएगा। इसके साथ ही चार दिवसीय इस महापर्व का समापन होगा।
आस्था, अनुशासन और प्रकृति का संदेश
चैत्र माह में मनाया जाने वाला यह महापर्व सूर्य देव और छठी मैया को समर्पित होता है। यह पर्व केवल धार्मिक अनुष्ठान ही नहीं, बल्कि प्रकृति के प्रति आभार व्यक्त करने और जीवन में अनुशासन बनाए रखने का भी संदेश देता है।
व्रती इस दौरान अपने परिवार की सुख-समृद्धि, संतान की लंबी आयु और आरोग्य की कामना करते हुए 36 घंटे का कठिन निर्जला व्रत रखते हैं। यह परंपरा सदियों से चली आ रही है और आज भी उतनी ही श्रद्धा के साथ निभाई जाती है।
न्यूज़ देखो: आस्था के साथ प्रशासनिक सहभागिता का संदेश
सिमडेगा में चैती छठ का आयोजन न केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक है, बल्कि यह प्रशासन और समाज के बीच जुड़ाव को भी दर्शाता है। उपायुक्त कंचन सिंह द्वारा स्वयं व्रत का पालन करना एक सकारात्मक संदेश देता है कि परंपरा और जिम्मेदारी साथ-साथ चल सकती हैं। अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि घाटों पर व्यवस्थाएं कितनी सुचारू रहती हैं और श्रद्धालुओं को किस स्तर की सुविधाएं मिलती हैं। हर खबर पर रहेगी हमारी नजर।
आस्था के साथ निभाएं जिम्मेदारी और स्वच्छता का संकल्प
चैती छठ केवल पूजा का पर्व नहीं, बल्कि अनुशासन, स्वच्छता और सामूहिक जिम्मेदारी का भी संदेश देता है। इस पावन अवसर पर हम सभी को मिलकर अपने आसपास के घाटों और जल स्रोतों को स्वच्छ रखने का संकल्प लेना चाहिए।
धार्मिक आस्था के साथ पर्यावरण संरक्षण को भी प्राथमिकता दें।
अपने परिवार और समाज के साथ मिलकर इस पर्व को सुरक्षित और स्वच्छ बनाएं।
छोटी-छोटी जिम्मेदारियां ही बड़े बदलाव की शुरुआत होती हैं।






