पलामू किला में यज्ञ आयोजन पर चेरो आदिवासी समाज का विरोध तेज, स्थान न बदले जाने पर आयोजन समिति पर दर्ज होगी FIR

पलामू किला में यज्ञ आयोजन पर चेरो आदिवासी समाज का विरोध तेज, स्थान न बदले जाने पर आयोजन समिति पर दर्ज होगी FIR

author Akram Ansari
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#पलामू #आदिवासी_विरोध : चेरो आदिवासी संगठनों ने पलामू किला परिसर में प्रस्तावित यज्ञ को आदिवासी परंपरा के खिलाफ बताया — प्रशासन से स्थल परिवर्तन की मांग
  • मेदिनी वेलफेयर ट्राइबल सोसाइटी, राष्ट्रीय चेरो जनजाति महासंघ और चेरो आदिवासी भैयारी पंचायत ने संयुक्त रूप से किया विरोध।
  • संगठनों ने कहा — यज्ञ आदिवासी परंपरा के विपरीत और आदिवासी धरोहर पर हिंदूवादी हस्तक्षेप का प्रयास
  • यदि यज्ञ स्थल नहीं बदला गया, तो आयोजन समिति के खिलाफ FIR दर्ज करने की चेतावनी।
  • निर्मल सिंह चेरो की अध्यक्षता में हुई बैठक में कई बुद्धिजीवी और सामाजिक प्रतिनिधि शामिल हुए।
  • संगठनों ने प्रशासन से कहा — धरोहर भूमि पर वैदिक आयोजन कराना सामाजिक सौहार्द के लिए हानिकारक।

लातेहार के बरवाडीह प्रखंड के अंतर्गत आने वाले पलामू किला परिसर में प्रस्तावित यज्ञ को लेकर विवाद गहराता जा रहा है। चेरो आदिवासी समाज ने इस आयोजन का कड़ा विरोध किया है और स्पष्ट चेतावनी दी है कि यदि यज्ञ स्थल को तुरंत स्थानांतरित नहीं किया गया, तो आयोजन समिति के खिलाफ FIR दर्ज कराई जाएगी

मेदिनीनगर में हुई चेरो समाज की अहम बैठक

28 अक्टूबर 2025 को मेदिनी वेलफेयर ट्राइबल सोसाइटी, राष्ट्रीय चेरो जनजाति महासंघ, और चेरो आदिवासी भैयारी पंचायत के संयुक्त तत्वावधान में मेदिनीनगर में एक महत्वपूर्ण बैठक हुई। बैठक की अध्यक्षता निर्मल सिंह चेरो ने की, जिसमें चेरो समाज के बुद्धिजीवी, सामाजिक प्रतिनिधि और वरिष्ठ सदस्य बड़ी संख्या में मौजूद थे।

बैठक में सर्वसम्मति से यह प्रस्ताव पारित किया गया कि पलामू किला जतरा के प्रांगण में यज्ञ का आयोजन आदिवासी परंपरा और धार्मिक धरोहर के विरुद्ध है। संगठनों का कहना है कि यह एक सुनियोजित प्रयास है जिससे आदिवासी भूमि और संस्कृति को धार्मिक उन्माद के माध्यम से कमजोर किया जा सके।

निर्मल सिंह चेरो ने कहा: “हम किसी धर्म के विरोधी नहीं हैं, लेकिन अपनी परंपराओं और पूर्वजों की धरोहर पर किसी भी तरह की छेड़छाड़ बर्दाश्त नहीं की जाएगी। पलामू किला हमारी अस्मिता का प्रतीक है, और यहां वैदिक यज्ञ आयोजित करना हमारी संस्कृति का अपमान है।”

आदिवासी परंपरा और यज्ञ पर समाज की आपत्ति

बैठक में उपस्थित प्रतिनिधियों ने कहा कि चेरो आदिवासी परंपरा में चेड़ी, दरहा, दुर्जागिन, गम्हेल और बघौत की पूजा होती है, जिसमें मांस, हंडिया, दारू, तपावन और पठरू की बलि दी जाती है। जबकि यज्ञ परंपरा पूरी तरह शाकाहारी और वैदिक होती है, जो आदिवासी परंपरा से असंगत है।

संगठनों ने इस आयोजन को आदिवासी संस्कृति को मिटाने की कोशिश बताया। उनका कहना है कि धर्म के नाम पर आदिवासी पहचान को कमजोर नहीं किया जा सकता।

प्रशासन से स्थल परिवर्तन की मांग

तीनों संगठनों ने जिला प्रशासन से पलामू किला परिसर से यज्ञ आयोजन को किसी अन्य उपयुक्त स्थान पर स्थानांतरित करने की मांग की है। उनका कहना है कि यह कदम सामाजिक सौहार्द और पारस्परिक सम्मान बनाए रखने के लिए आवश्यक है।

साथ ही, यह भी निर्णय लिया गया कि यदि आयोजन समिति यज्ञ स्थल में परिवर्तन नहीं करती है, तो इसे आदिवासी अस्मिता को नुकसान पहुंचाने का प्रयास माना जाएगा, और इस स्थिति में प्रशासन को औपचारिक सूचना देकर आयोजन समिति के विरुद्ध FIR दर्ज कराई जाएगी।

पलामू किला: चेरो समाज की ऐतिहासिक और आध्यात्मिक धरोहर

बैठक में वक्ताओं ने यह भी दोहराया कि पलामू किला केवल एक पुरातात्विक स्थल नहीं बल्कि चेरो आदिवासी समाज की आध्यात्मिक धरोहर है, जहाँ उनके पूर्वजों की आत्मा का वास माना जाता है। उन्होंने कहा कि इस पवित्र स्थल पर किसी भी बाहरी धार्मिक आयोजन से आदिवासी भावनाओं को ठेस पहुंचेगी।

एक वरिष्ठ प्रतिनिधि ने कहा: “पलामू किला हमारी पहचान और गर्व का प्रतीक है। इसे किसी दूसरे धर्म के प्रचार के मंच में बदलना हमारे अस्तित्व पर हमला है।”

न्यूज़ देखो: अस्मिता की रक्षा और सौहार्द की राह

यह विवाद झारखंड की विविध सांस्कृतिक विरासत के भीतर संतुलन की आवश्यकता को दर्शाता है। प्रशासन को चाहिए कि वह सभी समुदायों की धार्मिक और सांस्कृतिक भावनाओं का सम्मान करते हुए उचित निर्णय ले। चेरो समाज की यह चिंता उनकी पहचान की रक्षा से जुड़ी है, और सरकार को इसे गंभीरता से लेना चाहिए।
हर खबर पर रहेगी हमारी नजर।

संस्कृति का सम्मान, सौहार्द की पहचान

आस्था और परंपरा तब ही सार्थक होती है जब उसमें परस्पर सम्मान और संवाद बना रहे। अब समय है कि प्रशासन और आयोजन समिति दोनों ही इस विवाद को संवेदनशीलता से संभालें।
आप क्या सोचते हैं? अपनी राय कमेंट करें, खबर को शेयर करें और इस संवाद को समाज तक पहुंचाएं ताकि आदिवासी संस्कृति और आपसी सौहार्द दोनों की रक्षा हो सके।

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Written by

बरवाडीह, लातेहार

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