#गिरिडीह #मजदूर_आंदोलन : बकरीद पर्व के सम्मान में धरना स्थगित, 5 जून को होगी बड़ी बैठक।
गिरिडीह के चतरो मोड़ स्थित बालमुकुंद फैक्ट्री के सामने 13 मई से जारी अनिश्चितकालीन धरना को बकरीद पर्व को ध्यान में रखते हुए फिलहाल स्थगित कर दिया गया है। असंगठित मजदूर मोर्चा और भाकपा माले नेताओं ने जिला प्रशासन के साथ लिखित समझौते के बाद यह निर्णय लिया। हालांकि नेताओं ने स्पष्ट कहा कि आंदोलन समाप्त नहीं हुआ है और 5 जून को बड़ी बैठक कर आगे की रणनीति तय की जाएगी।
- 13 मई से बालमुकुंद फैक्ट्री के सामने चल रहा था धरना।
- बकरीद पर्व को देखते हुए आंदोलन को कुछ दिनों के लिए किया गया स्थगित।
- जिला प्रशासन और आंदोलनकारियों के बीच हुआ लिखित समझौता।
- नेताओं ने कहा — “स्थगित मतलब बंद नहीं”।
- 27 मई को फिर 16 मजदूरों को हटाने का आरोप लगाया गया।
- 5 जून को बड़ी बैठक कर अगले आंदोलन की रणनीति बनेगी।
गिरिडीह जिले के चतरो मोड़ स्थित बालमुकुंद फैक्ट्री के खिलाफ भाकपा माले और असंगठित मजदूर मोर्चा द्वारा चलाया जा रहा अनिश्चितकालीन धरना फिलहाल कुछ दिनों के लिए स्थगित कर दिया गया है। 13 मई से लगातार जारी इस आंदोलन को बकरीद पर्व के मद्देनजर अस्थायी रूप से रोका गया है। आंदोलनकारी नेताओं ने कहा कि यह फैसला सामाजिक सौहार्द और पर्व के सम्मान को ध्यान में रखते हुए लिया गया है, लेकिन मजदूरों की लड़ाई आगे भी जारी रहेगी।
प्रशासन और आंदोलनकारियों के बीच लिखित समझौता
धरना स्थल पर देर रात अंचल अधिकारी, प्रखंड विकास पदाधिकारी और मुफ्फसिल थाना प्रभारी पहुंचे। प्रशासन की ओर से बकरीद पर्व को देखते हुए आंदोलन को कुछ दिनों के लिए स्थगित करने का प्रस्ताव रखा गया।
इसके बाद असंगठित मजदूर मोर्चा और माले नेताओं की बैठक हुई, जिसमें निर्णय लिया गया कि पर्व के सम्मान में फिलहाल धरना स्थगित किया जाए। दोनों पक्षों के बीच लिखित समझौता भी हुआ।
नेताओं ने कहा कि कुछ दिनों बाद फिर हजारों की संख्या में मजदूर और समर्थक फैक्ट्री गेट पर जुटेंगे।
नीताय महतो ने सांसद-विधायकों पर साधा निशाना
असंगठित मजदूर मोर्चा के महासचिव नीताय महतो ने आंदोलन स्थगित करने के बावजूद सरकार और जनप्रतिनिधियों पर गंभीर आरोप लगाए।
नीताय महतो ने कहा:
“गिरिडीह के विधायक, सांसद और मंत्री पूंजीपतियों के साथ खड़े हैं। मजदूरों की आवाज दबाने का प्रयास हो रहा है। हम गली-मोहल्लों में जाकर माइक से सच्चाई बताएंगे। स्थगित का मतलब आंदोलन खत्म होना नहीं है। 5 जून को बड़ी बैठक होगी और दस दिनों के भीतर हजारों लोग फिर सड़कों पर उतरेंगे।”
उन्होंने कहा कि स्थानीय लोगों और मजदूरों में फैक्ट्री प्रबंधन के खिलाफ भारी आक्रोश है।
अशोक पासवान बोले — “मांग जायज है, आंदोलन और बड़ा होगा”
भाकपा माले जिला सचिव अशोक पासवान ने कहा कि फिलहाल पर्व को प्राथमिकता देते हुए प्रशासन को राहत दी गई है, लेकिन मजदूरों की मांग पूरी तरह जायज है।
अशोक पासवान ने कहा:
“हमारी लड़ाई लोकतांत्रिक तरीके से जारी रहेगी। दस दिनों के भीतर और बड़े आंदोलन की तरफ जाएंगे। मजदूरों की आवाज को दबाने की कोशिश गैरकानूनी है। इस बार सिर्फ फैक्ट्री प्रबंधन ही नहीं बल्कि जिम्मेदार अधिकारियों की भूमिका पर भी सवाल उठेंगे।”
उन्होंने कहा कि आंदोलन को और व्यापक स्वरूप देने की तैयारी शुरू हो चुकी है।
पूरन महतो ने कहा — “संघर्ष जारी रहेगा”
किसान नेता पूरन महतो ने कहा कि प्रशासन ने पर्व को देखते हुए आंदोलन में ब्रेक लेने का आग्रह किया था, जिस पर समर्थकों की सहमति बनी।
पूरन महतो ने कहा:
“बकरीद पर्व का सम्मान करते हुए धरना स्थगित किया गया है, लेकिन संघर्ष खत्म नहीं हुआ है। जल्द ही फिर हजारों लोग बालमुकुंद फैक्ट्री के सामने जुटेंगे।”
कन्हाई पांडेय ने स्थानीय नेताओं पर लगाए आरोप
असंगठित मजदूर मोर्चा के नेता कन्हाई पांडेय ने आरोप लगाया कि कुछ स्थानीय नेता फैक्ट्री प्रबंधन का समर्थन कर रहे हैं।
कन्हाई पांडेय ने कहा:
“कुछ लोग कंपनी के पक्ष में काम कर रहे हैं। जल्द ही उनका भंडाफोड़ किया जाएगा। मजदूरों के हक की लड़ाई को कमजोर नहीं होने देंगे।”
राजेश सिन्हा ने स्थानीय रोजगार का मुद्दा उठाया
माले नेता राजेश सिन्हा ने कहा कि फैक्ट्री में स्थानीय मजदूरों को पर्याप्त रोजगार नहीं दिया जा रहा है।
राजेश सिन्हा ने कहा:
“राज्य सरकार ने उद्योगों में 75 प्रतिशत स्थानीय मजदूर रखने का नियम बनाया है, लेकिन बालमुकुंद फैक्ट्री में इसका पालन नहीं हो रहा। सांसद और विधायक सिर्फ नियम बनाने की बात करते हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर मजदूरों के पक्ष में आवाज नहीं उठाते।”
उन्होंने आरोप लगाया कि कुछ जनप्रतिनिधि और प्रशासनिक लोग कंपनी के पक्ष में दिखाई दे रहे हैं।
धरना स्थगित होते ही 16 मजदूर हटाने का आरोप
धरना स्थगित होने के बाद आंदोलनकारी नेताओं ने आरोप लगाया कि फैक्ट्री प्रबंधन ने 27 मई को फिर 16 मजदूरों को काम से निकाल दिया।
निकाले गए मजदूरों में मुकेश राय, चंद्रदेव राय, मनीष राय, मंटू राय, विकास राय, टुनटुन राय, मेघलाल राय और कर्मा राय समेत अन्य कर्मियों के नाम शामिल बताए गए हैं।
आंदोलनकारियों ने कहा कि इसकी जानकारी एसडीओ, एसडीपीओ, थाना प्रभारी और अंचल अधिकारी को व्हाट्सएप के माध्यम से भेज दी गई है।
आंदोलन की वजह और आरोप
नेताओं का कहना है कि फैक्ट्री प्रबंधन बिना नोटिस मजदूरों को काम से निकाल रहा है। इस संबंध में कई बार लिखित शिकायतें देने के बावजूद श्रम विभाग द्वारा कोई ठोस कार्रवाई नहीं की गई।
26 मई को प्रस्तावित गेट जाम आंदोलन के दौरान हजारों महिला-पुरुष धरना स्थल पर मौजूद थे। आंदोलनकारियों का आरोप है कि प्रशासन ने वार्ता के नाम पर समय लिया लेकिन फैक्ट्री प्रबंधन बातचीत से बचता रहा।
“कंपनी के एजेंट नेता सक्रिय” का आरोप
धरना स्थल पर नेताओं ने आरोप लगाया कि कुछ लोग कंपनी के एजेंट बनकर आंदोलन को कमजोर करने की कोशिश कर रहे हैं।
आंदोलनकारी नेताओं ने कहा कि कुछ स्थानीय नेताओं ने प्रशासन पर दबाव बनाकर धरना हटवाने की कोशिश की और माहौल बिगाड़ने के लिए बाहरी लोगों को भेजा गया।
आगे बड़े आंदोलन की तैयारी
भाकपा माले और असंगठित मजदूर मोर्चा ने स्पष्ट किया कि आने वाले दिनों में आंदोलन और तेज होगा।
नेताओं ने कहा कि बालमुकुंद फैक्ट्री में मजदूरों और महिलाओं के साथ कथित दमन करने वालों के खिलाफ व्यापक जनआंदोलन खड़ा किया जाएगा।
बड़ी संख्या में लोग रहे मौजूद
धरना स्थल पर मसूदन कोल, किशोर राय, सुनील ठाकुर, दिलचंद कोल, दीपक गोस्वामी, नवीन पांडेय, मोहन कोल, अरविंद टुडू, तुलसी तुरी, हुबलाल राय, बाबूलाल बास्के, भीम कोल, भिखारी राय, निमिया देवी, सरिता देवी, लालिता देवी और जसमी देवी समेत सैकड़ों महिला-पुरुष मौजूद रहे।
न्यूज़ देखो: बकरीद के सम्मान में रुका आंदोलन, लेकिन खत्म नहीं हुआ संघर्ष
बालमुकुंद फैक्ट्री के खिलाफ जारी आंदोलन अब केवल मजदूरों की छंटनी तक सीमित नहीं रहा। स्थानीय रोजगार, श्रम कानून, प्रशासनिक भूमिका और उद्योग प्रबंधन की कार्यशैली जैसे मुद्दे भी इसके केंद्र में आ चुके हैं। बकरीद पर्व को देखते हुए आंदोलन स्थगित जरूर हुआ है, लेकिन नेताओं के तेवर बताते हैं कि आने वाले दिनों में यह संघर्ष और बड़ा रूप ले सकता है। अब सबकी नजर 5 जून की बैठक और उसके बाद की रणनीति पर टिकी है। हर खबर पर रहेगी हमारी नजर।
संघर्ष रुके तो भी आवाज नहीं रुकनी चाहिए
लोकतांत्रिक समाज में मजदूरों और आम लोगों की आवाज को सुना जाना जरूरी है। पर्व और सामाजिक सौहार्द का सम्मान करना भी उतना ही महत्वपूर्ण है जितना अधिकारों के लिए संघर्ष करना।
जरूरत इस बात की है कि संवाद, न्याय और पारदर्शिता के जरिए समाधान निकाला जाए ताकि उद्योग और मजदूर दोनों सुरक्षित रह सकें।
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