
#गढ़वा #सामाजिक_सेवा : मझिआंव प्रखंड के दलको गांव में मजदूर परिवारों को सर्दी से राहत देने का प्रयास।
गढ़वा जिले में प्रशासनिक सहयोग और सामाजिक सहभागिता से संचालित “आइये खुशियाँ बाँटें” अभियान सोमवार को अपने 51वें दिन भी जारी रहा। इस क्रम में मझिआंव प्रखंड के दलको गांव में जरूरतमंद मजदूर परिवारों के बीच वस्त्र वितरण किया गया। अभियान के तहत बच्चों, महिलाओं और बुजुर्गों को सर्दी से बचाव के लिए आवश्यक कपड़े उपलब्ध कराए गए। लगातार चल रही यह पहल सामाजिक संवेदनशीलता और मानवीय सहयोग का उदाहरण बनती जा रही है।
- मझिआंव प्रखंड के दलको गांव में जरूरतमंद मजदूर परिवारों के बीच वस्त्र वितरण।
- “आइये खुशियाँ बाँटें” अभियान का 51वां दिन रहा सक्रिय।
- बच्चों, महिलाओं और बुजुर्गों को गर्म कपड़े व दैनिक उपयोग के वस्त्र प्रदान।
- प्रशासनिक समन्वय और सामाजिक सहभागिता से अभियान को मिल रहा विस्तार।
- ग्रामीणों ने पहल की सराहना करते हुए इसे सम्मान और संवेदना से जुड़ा प्रयास बताया।
गढ़वा जिले में सामाजिक सरोकारों को मजबूती देने वाली “आइये खुशियाँ बाँटें” मुहिम ने एक बार फिर मानवीय संवेदना की मिसाल पेश की। सोमवार को अभियान के 51वें दिन मझिआंव प्रखंड अंतर्गत दलको गांव में मजदूर परिवारों के बीच वस्त्र वितरण कार्यक्रम आयोजित किया गया। सर्द मौसम के बीच इस पहल ने जरूरतमंदों को न केवल राहत दी, बल्कि उन्हें यह एहसास भी कराया कि समाज और प्रशासन उनके साथ खड़ा है।
मजदूर परिवारों के बीच पहुंची राहत
दलको गांव और उसके आसपास रहने वाले अधिकांश परिवार दिहाड़ी मजदूरी पर निर्भर हैं। सीमित आय और संसाधनों के कारण सर्दी के मौसम में इनके लिए गर्म कपड़ों की व्यवस्था करना चुनौतीपूर्ण हो जाता है। ऐसे में “आइये खुशियाँ बाँटें” अभियान के तहत गांव में पहुंची टीम ने बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक सभी वर्गों के लोगों को कपड़े वितरित किए।
वस्त्र वितरण के दौरान गर्म कपड़े, जींस, शर्ट, फ्रॉक, कुर्ता, पैंट, मोज़े और टोपी जैसी रोजमर्रा की जरूरत की वस्तुएं प्रदान की गईं। अपनी पसंद और जरूरत के अनुसार कपड़े पाकर बच्चों के चेहरे खुशी से खिल उठे, वहीं बुजुर्गों की आंखों में संतोष और राहत साफ झलक रही थी।
51 दिनों से निरंतर चल रही मानवीय पहल
अधिकारियों और अभियान से जुड़े लोगों ने बताया कि “आइये खुशियाँ बाँटें” मुहिम पिछले 51 दिनों से लगातार जिले के अलग-अलग इलाकों में संचालित की जा रही है। इसका उद्देश्य केवल ठंड से बचाव तक सीमित नहीं है, बल्कि समाज के उन वर्गों तक सहायता पहुंचाना है, जो किसी न किसी कारण से उपेक्षित रह जाते हैं।
SDO संजय कुमार ने कहा:
“यह पहल सिर्फ कपड़े देने का कार्यक्रम नहीं है, बल्कि जरूरतमंद लोगों के जीवन में सम्मान और अपनापन जोड़ने का प्रयास है।”
प्रशासन और समाज का साझा प्रयास
इस अभियान की खास बात यह है कि इसमें प्रशासनिक समन्वय और सामाजिक सहभागिता दोनों की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। विभिन्न सामाजिक कार्यकर्ताओं, स्वयंसेवकों और स्थानीय लोगों के सहयोग से यह मुहिम निरंतर आगे बढ़ रही है। यही कारण है कि अभियान दिन-प्रतिदिन और व्यापक रूप लेता जा रहा है।
ग्रामीणों का कहना है कि इस तरह के कार्यक्रमों से न केवल तात्कालिक जरूरतें पूरी होती हैं, बल्कि समाज में आपसी सहयोग और भरोसे की भावना भी मजबूत होती है।
जरूरतमंदों की गरिमा का रखा गया ध्यान
अभियान के दौरान इस बात का विशेष ध्यान रखा गया कि वस्त्र वितरण पूरी गरिमा और सम्मान के साथ हो। किसी भी परिवार को अलग-थलग या असहज महसूस न हो, इसके लिए वितरण प्रक्रिया को सहज और व्यवस्थित रखा गया। लोगों को अपनी आवश्यकता के अनुसार कपड़े चुनने का अवसर दिया गया, जिससे उनमें आत्मसम्मान की भावना बनी रही।
एक बुजुर्ग लाभार्थी ने कहा:
“सर्दी में ऐसे कपड़े मिलना बहुत बड़ी राहत है। इससे हमें यह भी लगता है कि हम अकेले नहीं हैं।”
आगे भी जारी रहेगा अभियान
अभियान से जुड़े अधिकारियों ने बताया कि आने वाले दिनों में भी जिले के अन्य ग्रामीण और शहरी इलाकों में इसी तरह के कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे। खासकर उन क्षेत्रों को प्राथमिकता दी जा रही है, जहां मजदूर, असहाय और आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों की संख्या अधिक है।
उन्होंने यह भी कहा कि समाज के सक्षम वर्ग से अपील की जा रही है कि वे इस अभियान से जुड़कर सहयोग करें, ताकि जरूरतमंदों तक सहायता का दायरा और बढ़ाया जा सके।



न्यूज़ देखो: संवेदना से मजबूत होता समाज
“आइये खुशियाँ बाँटें” अभियान यह दिखाता है कि जब प्रशासन और समाज एक साथ आते हैं, तो वास्तविक बदलाव संभव होता है। दलको गांव में वस्त्र वितरण जैसे कार्यक्रम जरूरतमंदों की तात्कालिक समस्या का समाधान तो करते ही हैं, साथ ही सामाजिक एकजुटता को भी मजबूत करते हैं। ऐसे प्रयासों की निरंतरता ही समाज को अधिक संवेदनशील और समावेशी बनाती है। हर खबर पर रहेगी हमारी नजर।
सहभागिता से बदलती तस्वीर
छोटी-छोटी पहलें बड़े बदलाव की नींव रखती हैं।
जरूरतमंदों के साथ खड़ा होना ही सच्ची सामाजिक जिम्मेदारी है।
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