
#बरवाडीह #वनकर्मी_सम्मान : पद्मश्री स्व. पी.के. सेन की स्मृति में बेतला में कल्याणकारी कार्यक्रम का आयोजन।
पलामू टाइगर रिजर्व के पूर्व निदेशक और पद्मश्री से सम्मानित स्वर्गीय पी.के. सेन की पुण्यतिथि पर बेतला में वनकर्मियों के सम्मान और कल्याण हेतु विशेष कार्यक्रम आयोजित किया गया। इस अवसर पर उनके परिवार और शुन्य फाउंडेशन की ओर से कड़ाके की ठंड को देखते हुए वनकर्मियों के बीच गर्म पोशाक वितरित की गई। कार्यक्रम का उद्देश्य फील्ड में कार्यरत कर्मियों को राहत देना और उनके योगदान को सम्मानित करना रहा। यह आयोजन स्व. सेन के वन संरक्षण और मानव संसाधन के प्रति दृष्टिकोण को जीवंत करता है।
- स्व. पी.के. सेन की पुण्यतिथि पर विशेष कार्यक्रम।
- बेतला, पीटीआर में आयोजन।
- 550 जैकेट और 40 स्वेटर का वितरण।
- रिचा शर्मा ने किया वितरण का नेतृत्व।
- वनकर्मियों के सम्मान से कार्यक्रम की शुरुआत।
पलामू टाइगर रिजर्व के इतिहास में स्वर्गीय पी.के. सेन का नाम एक ऐसे अधिकारी के रूप में दर्ज है, जिन्होंने न केवल वन्यजीव संरक्षण बल्कि वनकर्मियों के हितों को भी प्राथमिकता दी। उनकी पुण्यतिथि के अवसर पर बेतला में आयोजित यह कार्यक्रम उसी परंपरा को आगे बढ़ाने का प्रयास रहा। कड़ाके की ठंड के बीच फील्ड ड्यूटी करने वाले वनकर्मियों के लिए यह पहल संबल और सम्मान दोनों का प्रतीक बनी।
शुन्य फाउंडेशन की पहल, परिवार की सहभागिता
इस कार्यक्रम का आयोजन स्व. पी.के. सेन के परिवार और शुन्य फाउंडेशन, नई दिल्ली के संयुक्त तत्वावधान में किया गया। स्वर्गीय सेन की पुत्री एवं शुन्य फाउंडेशन की संचालिका रिचा शर्मा विशेष रूप से इस अवसर पर उपस्थित रहीं। उन्होंने कहा कि उनके पिता हमेशा यह मानते थे कि वन्यजीव संरक्षण की सफलता का आधार फील्ड में कार्यरत कर्मियों की सुरक्षा, सुविधा और सम्मान है। उसी भावना के तहत यह कार्यक्रम आयोजित किया गया।
बुजुर्ग वनकर्मियों से हुई शुरुआत
कार्यक्रम की शुरुआत सबसे वरिष्ठ और बुजुर्ग वनकर्मियों को सम्मानित करते हुए की गई। सर्वप्रथम महावत इमामुद्दीन अंसारी और सरीफ मियां को मंच पर आमंत्रित कर उन्हें जैकेट पहनाई गई। इसके बाद क्रमवार सभी उपस्थित वनकर्मियों के बीच गर्म पोशाक का वितरण किया गया। इस क्रम ने यह संदेश दिया कि अनुभव और सेवा का सम्मान किसी भी संगठन की मूल शक्ति होता है।
550 जैकेट और 40 स्वेटर का वितरण
इस अवसर पर कुल 550 जैकेट और 40 स्वेटर वनकर्मियों के बीच वितरित किए गए। बेतला और आसपास के जंगल क्षेत्रों में कार्यरत वनकर्मी अत्यंत कठिन परिस्थितियों में अपनी ड्यूटी निभाते हैं। ठंड के मौसम में रात्रि गश्त, वन्यजीव निगरानी और सुरक्षा कार्यों में यह गर्म पोशाक उनके लिए बड़ी राहत साबित होगी। वनकर्मियों ने इसे अपने दैनिक कार्य में उपयोगी और समयानुकूल सहयोग बताया।
वरिष्ठ अधिकारियों और विशेषज्ञों की सहभागिता
कार्यक्रम में वन विभाग के सेवानिवृत्त रेंजर अर्जुन बड़ाइक, बेतला पर्यटन अधिकारी विवेक तिवारी एवं वन्यजीव विशेषज्ञ डॉ. डी.एस. श्रीवास्तव ने संयुक्त रूप से वनकर्मियों को जैकेट और स्वेटर प्रदान किए। सभी वक्ताओं ने स्व. पी.के. सेन के कार्यकाल को याद करते हुए कहा कि उन्होंने पीटीआर को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाने में अहम भूमिका निभाई।
डॉ. डी.एस. श्रीवास्तव ने कहा:
“स्व. पी.के. सेन का मानना था कि वन्यजीव संरक्षण तभी संभव है जब वनकर्मी सुरक्षित, सम्मानित और प्रेरित हों। यह कार्यक्रम उसी सोच की निरंतरता है।”
स्व. पी.के. सेन का योगदान स्मरणीय
वक्ताओं ने बताया कि स्व. पी.के. सेन ने अपने कार्यकाल में वन प्रबंधन, बाघ संरक्षण, पर्यटन विकास और स्थानीय समुदाय की सहभागिता पर विशेष ध्यान दिया। उन्हें इसी समर्पण के लिए पद्मश्री सम्मान से नवाजा गया था। उनका जीवन आज भी युवा अधिकारियों और वनकर्मियों के लिए प्रेरणा का स्रोत बना हुआ है।
बड़ी संख्या में वनकर्मी रहे उपस्थित
कार्यक्रम में प्रभारी वनपाल संतोष सिंह, नंदलाल साहू, गुलशन सुरीन, अभिषेक सिंह, मुकेश कुमार, रजनीश सिंह, देवपाल भगत, देवेंद्र कुमार देव, दीपक मिश्रा, निरंजन कुमार, प्रवीण सिंह, नैन्सी मधु, सुकेशी बडिंग, फैज अहमद, वंशी यादव, सहैल अख्तर, दिलीप कुमार सहित बड़ी संख्या में वनकर्मी मौजूद रहे। सभी ने इस पहल को मनोबल बढ़ाने वाला बताया।
न्यूज़ देखो: संरक्षण के साथ संवेदनशीलता का संदेश
यह आयोजन बताता है कि वन संरक्षण केवल नीतियों और योजनाओं तक सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि फील्ड में कार्यरत मानव संसाधन की चिंता भी उतनी ही जरूरी है। स्व. पी.के. सेन की स्मृति में हुआ यह कार्यक्रम प्रशासन और समाज दोनों के लिए एक सकारात्मक उदाहरण है। ऐसे प्रयास वनकर्मियों के मनोबल को मजबूत करते हैं और संरक्षण कार्यों को नई ऊर्जा देते हैं। हर खबर पर रहेगी हमारी नजर।
सेवा और सम्मान से ही मजबूत होगा संरक्षण तंत्र
वनकर्मियों की कठिन परिस्थितियों को समझना और उनके साथ खड़ा होना समाज की साझा जिम्मेदारी है। ऐसे कार्यक्रम न केवल राहत पहुंचाते हैं, बल्कि यह संदेश भी देते हैं कि उनका योगदान अनदेखा नहीं है। इस खबर पर अपनी राय साझा करें, इसे आगे बढ़ाएं और उन लोगों के सम्मान की आवाज बनें जो जंगल और वन्यजीवों की सुरक्षा में दिन-रात लगे रहते हैं।





