#बानोखूंटी #लोकसंगीतसम्मान : नागपुरी संस्कृति के संरक्षण में योगदान पर मिला प्रतिष्ठित सम्मान।
खूंटी जिले के तोरपा क्षेत्र से जुड़े नागपुरी गायक डॉ. लक्ष्मीकांत नारायण बड़ाईक को वर्ष 2026 का ‘गुरु रत्न सम्मान’ प्रदान किया गया है। यह सम्मान ‘भारत के गवैयों’ संस्था द्वारा लोक संगीत के संरक्षण और प्रचार में उनके योगदान के लिए दिया गया। समारोह में राज्यसभा सांसद महुआ माजी मुख्य अतिथि के रूप में शामिल हुईं। इस सम्मान को नागपुरी सांस्कृतिक विरासत के लिए महत्वपूर्ण उपलब्धि माना जा रहा है।
- डॉ. लक्ष्मीकांत नारायण बड़ाईक को वर्ष 2026 का ‘गुरु रत्न सम्मान’।
- सम्मान देने वाली संस्था भारत के गवैयों।
- कार्यक्रम में मुख्य अतिथि रहीं राज्यसभा सांसद महुआ माजी।
- तोरपा प्रखंड के तपकरा आनंदपुर के मूल निवासी हैं डॉ. बड़ाईक।
- नागपुरी लोक संगीत के संरक्षण और प्रचार में अहम भूमिका।
- समारोह में कलाकारों और संगीत प्रेमियों की रही उपस्थिति।
बानो-खूंटी क्षेत्र के लिए गर्व का क्षण तब बना जब नागपुरी लोक संगीत के क्षेत्र में सक्रिय गायक और रचनाकार डॉ. लक्ष्मीकांत नारायण बड़ाईक को वर्ष 2026 के ‘गुरु रत्न सम्मान’ से नवाजा गया। यह सम्मान उन्हें ‘भारत के गवैयों’ संस्था की ओर से उनके लंबे समय से किए जा रहे सांस्कृतिक योगदान के लिए दिया गया। इस सम्मान समारोह में कई गणमान्य लोग उपस्थित रहे और पूरे क्षेत्र में खुशी का माहौल देखा गया।
नागपुरी संगीत के संरक्षण में अहम भूमिका
डॉ. लक्ष्मीकांत नारायण बड़ाईक लंबे समय से नागपुरी लोक संगीत को सहेजने और आगे बढ़ाने में सक्रिय हैं। वे न केवल एक कुशल गायक हैं बल्कि एक रचनाकार के रूप में भी उन्होंने अपनी अलग पहचान बनाई है। उनके गीतों में झारखंड की परंपरा, संस्कृति और जनजीवन की झलक स्पष्ट रूप से देखने को मिलती है।
वे वर्तमान में बी के बी मेमोरियल पब्लिक स्कूल, तोरपा के प्राचार्य के रूप में भी कार्यरत हैं और साथ ही झारखंड क्षेत्रीय कलाकार सोसाइटी, खूंटी के जिला अध्यक्ष की जिम्मेदारी भी निभा रहे हैं। शिक्षा और संस्कृति दोनों क्षेत्रों में उनकी सक्रियता उन्हें विशिष्ट बनाती है।
भव्य समारोह में मिला सम्मान
रविवार को आयोजित इस सम्मान समारोह में बड़ी संख्या में कलाकार, संगीत प्रेमी और स्थानीय गणमान्य लोग उपस्थित रहे। समारोह में मुख्य अतिथि के रूप में राज्यसभा सांसद महुआ माजी शामिल हुईं, जिन्होंने डॉ. बड़ाईक के योगदान की सराहना की।
महुआ माजी ने कहा: “डॉ. लक्ष्मीकांत नारायण बड़ाईक जैसे कलाकार हमारी संस्कृति और परंपरा के सच्चे रक्षक हैं। उनके प्रयासों से लोक संगीत को नई पहचान मिल रही है।”
इस अवसर पर डॉ. बड़ाईक को पारंपरिक तरीके से सम्मानित किया गया, जिसमें उन्हें प्रशस्ति पत्र और सम्मान चिन्ह प्रदान किया गया।
युवा पीढ़ी को जोड़ने का प्रयास
डॉ. बड़ाईक केवल मंचीय कलाकार ही नहीं हैं, बल्कि वे युवा पीढ़ी को नागपुरी लोक संगीत से जोड़ने के लिए भी लगातार प्रयासरत हैं। वे विभिन्न कार्यक्रमों और मंचों पर प्रस्तुति देकर युवाओं को अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जोड़ने का काम कर रहे हैं।
उनकी रचनाएं और गीत आज भी लोगों के बीच लोकप्रिय हैं और उन्होंने नागपुरी संगीत को आधुनिक दौर में भी जीवंत बनाए रखा है।
कार्यक्रम में सांस्कृतिक प्रस्तुतियां
सम्मान समारोह के दौरान डॉ. बड़ाईक ने अपने लोकप्रिय नागपुरी गीतों की प्रस्तुति दी, जिसे दर्शकों ने खूब सराहा। उनकी प्रस्तुति ने पूरे माहौल को संगीतमय बना दिया और उपस्थित लोगों ने तालियों के साथ उनका उत्साहवर्धन किया।
इस कार्यक्रम में क्षेत्र के कई प्रमुख कलाकार, समाजसेवी और संगीत प्रेमी शामिल हुए, जिन्होंने इस अवसर को खास बना दिया।
क्षेत्र में खुशी का माहौल
डॉ. बड़ाईक को मिले इस सम्मान से पूरे नागपुरी संगीत जगत में खुशी की लहर दौड़ गई है। उनके गांव तपकरा आनंदपुर, तोरपा प्रखंड सहित पूरे खूंटी जिले में इसे गर्व के क्षण के रूप में देखा जा रहा है।
यह सम्मान न केवल उनके व्यक्तिगत योगदान को मान्यता देता है, बल्कि नागपुरी लोक संगीत की समृद्ध परंपरा को भी राष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाने का कार्य करता है।
न्यूज़ देखो: लोक कलाकारों को सम्मान से मिलती है सांस्कृतिक ऊर्जा
डॉ. लक्ष्मीकांत नारायण बड़ाईक को मिला ‘गुरु रत्न सम्मान’ यह दर्शाता है कि स्थानीय कलाकारों का योगदान अब राष्ट्रीय स्तर पर सराहा जा रहा है। यह सम्मान न केवल एक व्यक्ति की उपलब्धि है, बल्कि पूरे नागपुरी लोक संगीत समुदाय के लिए प्रेरणा है। ऐसे प्रयासों से हमारी पारंपरिक कला जीवित रहती है और नई पीढ़ी को दिशा मिलती है। हर खबर पर रहेगी हमारी नजर।
अपनी संस्कृति पर गर्व करें और कलाकारों का सम्मान बढ़ाएं
हमारी लोक संस्कृति हमारी पहचान है और इसे जीवित रखने में कलाकारों की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण होती है। डॉ. बड़ाईक जैसे कलाकार हमें यह सिखाते हैं कि अपनी जड़ों से जुड़े रहना ही असली प्रगति है।
