
#बानो #सिमडेगा #शैक्षणिक_गतिविधि : एलिस शैक्षणिक संस्थान में लोहड़ी पर्व पर सांस्कृतिक जानकारी और प्रोजेक्ट प्रस्तुति।
बानो प्रखंड स्थित एलिस शैक्षणिक संस्थान में लोहड़ी पर्व के अवसर पर विशेष शैक्षणिक एवं जागरूकता कार्यक्रम आयोजित किया गया। कार्यक्रम के दौरान विद्यार्थियों को उत्तर भारत के प्रमुख लोकपर्व लोहड़ी के सामाजिक, सांस्कृतिक और कृषि महत्व की जानकारी दी गई। संस्थान के निदेशक द्वारा पर्व की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और परंपराओं पर प्रकाश डाला गया। इस आयोजन का उद्देश्य छात्रों को भारतीय संस्कृति और लोक उत्सवों से जोड़ना रहा।
- एलिस शैक्षणिक संस्थान, बानो में लोहड़ी पर्व पर विशेष कार्यक्रम आयोजित।
- निदेशक बिमल कुमार ने छात्रों को लोहड़ी के इतिहास और महत्व की जानकारी दी।
- लोहड़ी को फसल चक्र और ऋतु परिवर्तन से जुड़ा पर्व बताया गया।
- छात्रों द्वारा प्रोजेक्ट कार्य और प्रस्तुति के माध्यम से पर्व की समझ विकसित की गई।
- शिक्षकों और विद्यार्थियों ने एक-दूसरे को लोहड़ी की शुभकामनाएं दीं।
बानो प्रखंड के चर्च रोड स्थित एलिस शैक्षणिक संस्थान में लोहड़ी पर्व के शुभ अवसर पर एक सार्थक और ज्ञानवर्धक कार्यक्रम का आयोजन किया गया। इस अवसर पर संस्थान ने केवल पर्व मनाने तक खुद को सीमित नहीं रखा, बल्कि छात्रों को भारतीय लोकपरंपराओं, कृषि संस्कृति और सामाजिक मूल्यों से जोड़ने का प्रयास किया। कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य विद्यार्थियों को यह समझाना था कि त्योहार केवल उत्सव नहीं, बल्कि समाज और प्रकृति के बीच गहरे संबंध का प्रतीक होते हैं।
लोहड़ी पर्व की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक जानकारी
कार्यक्रम के दौरान संस्थान के निदेशक बिमल कुमार ने छात्र-छात्राओं को संबोधित करते हुए लोहड़ी पर्व के महत्व पर विस्तार से जानकारी दी। उन्होंने बताया कि लोहड़ी उत्तर भारत का एक प्रमुख लोकपर्व है, जिसे विशेष रूप से पंजाब, हरियाणा और हिमाचल प्रदेश में बड़े उत्साह और उमंग के साथ मनाया जाता है। यह पर्व हर वर्ष 13 जनवरी को मनाया जाता है और सर्दियों के अंत तथा नए फसल चक्र की शुरुआत का प्रतीक माना जाता है।
निदेशक बिमल कुमार ने कहा: “लोहड़ी केवल एक त्योहार नहीं, बल्कि किसान और प्रकृति के बीच कृतज्ञता का भाव है, जिसमें सूर्य देव और अग्नि देव की पूजा कर अच्छी फसल की कामना की जाती है।”
उन्होंने यह भी बताया कि यह पर्व मुख्य रूप से रबी फसल के आगमन की खुशी में मनाया जाता है और किसान इस दिन समृद्धि, खुशहाली और अच्छी पैदावार की प्रार्थना करते हैं।
कृषि संस्कृति से जुड़ा लोकपर्व
निदेशक ने छात्रों को समझाया कि भारत एक कृषि प्रधान देश है और हमारे अधिकांश लोकपर्व खेती, मौसम और प्रकृति से जुड़े हुए हैं। लोहड़ी के अवसर पर आग जलाकर उसके चारों ओर परिक्रमा करना, तिल, गुड़, मूंगफली और मक्का जैसी फसलों को अग्नि को समर्पित करना, प्रकृति के प्रति आभार प्रकट करने का प्रतीक है। इससे बच्चों में कृषि, पर्यावरण और परंपरा के प्रति सम्मान की भावना विकसित होती है।
छात्रों द्वारा प्रोजेक्ट कार्य और प्रस्तुति
कार्यक्रम की विशेष बात यह रही कि इस अवसर पर छात्रों द्वारा प्रोजेक्ट कार्य भी प्रस्तुत किए गए। विद्यार्थियों ने लोहड़ी पर्व के इतिहास, परंपराओं, लोकगीतों और सामाजिक महत्व पर आधारित प्रोजेक्ट तैयार किए। इन प्रोजेक्ट्स के माध्यम से छात्रों ने अपनी रचनात्मकता और समझ का परिचय दिया। शिक्षकों ने छात्रों की सराहना करते हुए कहा कि इस तरह की गतिविधियों से बच्चों में शोध, प्रस्तुति और आत्मविश्वास की क्षमता बढ़ती है।
सांस्कृतिक शिक्षा की ओर एक सार्थक पहल
एलिस शैक्षणिक संस्थान द्वारा आयोजित यह कार्यक्रम इस बात का उदाहरण बना कि विद्यालय केवल पुस्तकीय ज्ञान तक सीमित नहीं हैं, बल्कि बच्चों के सर्वांगीण विकास में सांस्कृतिक शिक्षा भी अहम भूमिका निभाती है। छात्रों ने भी उत्साहपूर्वक कार्यक्रम में भाग लिया और लोहड़ी पर्व से जुड़ी नई जानकारियां प्राप्त कीं।
शुभकामनाओं के साथ कार्यक्रम का समापन
कार्यक्रम के अंत में संस्थान की ओर से सभी छात्र-छात्राओं और शिक्षकों को लोहड़ी पर्व की हार्दिक शुभकामनाएं दी गईं। इस अवसर पर संस्थान में निदेशक बिमल कुमार, सोनाली मर्की, सुनीत, डांग, अमृता कुमारी, वाणी कुमारी सहित शिक्षक-शिक्षिकाएं और बड़ी संख्या में छात्र-छात्राएं उपस्थित रहे। सभी ने मिलकर इस आयोजन को यादगार और ज्ञानवर्धक बनाया।
न्यूज़ देखो: शिक्षा के साथ संस्कृति को जोड़ने की पहल
एलिस शैक्षणिक संस्थान का यह आयोजन दर्शाता है कि विद्यालय यदि चाहें तो शिक्षा को संस्कृति से जोड़कर छात्रों को बेहतर नागरिक बना सकते हैं। लोकपर्वों की जानकारी से बच्चों में अपनी परंपराओं के प्रति सम्मान और गर्व की भावना विकसित होती है। ऐसे आयोजनों से शिक्षा अधिक जीवंत और समाजोन्मुख बनती है। हर खबर पर रहेगी हमारी नजर।
परंपरा से पहचान, शिक्षा से भविष्य
आज की पीढ़ी को अपनी जड़ों से जोड़ना समय की आवश्यकता है। जब विद्यालय लोकपर्वों और सांस्कृतिक मूल्यों को शिक्षा का हिस्सा बनाते हैं, तो समाज मजबूत होता है।
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