
#बेतला #वन_प्रशिक्षण : पीटीआर प्रबंधन के तहत वनकर्मियों को सिखाई गई बांस रोपण की आधुनिक तकनीक।
लातेहार जिले के बेतला में पलामू टाइगर रिजर्व प्रबंधन द्वारा वनकर्मियों के लिए विशेष प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किया गया। इसमें हाथी-कोरिडोर में बांस रोपण की आधुनिक तकनीक सिखाई गई। प्रशिक्षण में वन्यजीव विशेषज्ञ इस्तेयाक पटेल ने बताया कि हाथियों के पसंदीदा आहार बांस की उपलब्धता बढ़ाने से गज-मानव संघर्ष को काफी हद तक कम किया जा सकता है।
- बेतला स्थित एनआई सभागार में वनकर्मियों के लिए प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित।
- पलामू टाइगर रिजर्व (पीटीआर) प्रबंधन के तहत नॉर्थ डिविजन के वनकर्मी शामिल।
- वन्यजीव विशेषज्ञ इस्तेयाक पटेल (मुंबई) ने दी आधुनिक तकनीकों की जानकारी।
- हाथी-कोरिडोर में बांस रोपण से गज-मानव संघर्ष कम करने पर जोर।
- प्रशिक्षण में कुटकू और छिपादोहर रेंज के वनकर्मी भी रहे मौजूद।
लातेहार जिले के बेतला स्थित पलामू टाइगर रिजर्व (पीटीआर) प्रबंधन के तहत गुरुवार को वनकर्मियों के लिए एक विशेष प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किया गया। यह प्रशिक्षण बेतला स्थित एनआई सभागार में आयोजित किया गया, जिसमें पीटीआर के नॉर्थ डिविजन के वनकर्मियों ने भाग लिया।
प्रशिक्षण कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य हाथी-कोरिडोर क्षेत्रों में बांस रोपण की आधुनिक और वैज्ञानिक तकनीकों की जानकारी देना था, ताकि वन्यजीव संरक्षण और मानव-वन्यजीव संघर्ष को कम किया जा सके।
विशेषज्ञ ने बताई बांस रोपण की आधुनिक तकनीक
प्रशिक्षण कार्यक्रम में वन्यजीव विशेषज्ञ सह प्रशिक्षक इस्तेयाक पटेल (मुंबई) ने वनकर्मियों को बांस रोपण से जुड़ी आधुनिक तकनीकों की विस्तृत जानकारी दी।
उन्होंने बताया कि जंगलों पर लोगों की बढ़ती निर्भरता के कारण गज-मानव द्वंद्व की घटनाएं लगातार बढ़ रही हैं। ऐसे में हाथियों के आवागमन वाले कोरिडोर में बांस का रोपण कर इस समस्या को काफी हद तक कम किया जा सकता है।
हाथियों का पसंदीदा आहार है बांस
इस्तेयाक पटेल ने कहा कि बांस हाथियों का सबसे पसंदीदा आहार होता है। यदि हाथी-कोरिडोर में पर्याप्त मात्रा में बांस उपलब्ध रहेगा तो हाथियों का रुख जंगलों की ओर ही रहेगा और वे आबादी वाले क्षेत्रों की ओर कम जाएंगे।
इससे मानव बस्तियों में हाथियों के प्रवेश की घटनाएं कम हो सकती हैं और लोगों तथा वन्यजीवों के बीच टकराव की संभावना भी घटेगी।
वैज्ञानिक तरीके से रोपण और संरक्षण पर जोर
प्रशिक्षण के दौरान वनकर्मियों को बांस रोपण की वैज्ञानिक पद्धति, पौधों की देखभाल, संरक्षण और उनके बेहतर विकास से जुड़ी कई महत्वपूर्ण जानकारियां दी गईं।
साथ ही यह भी बताया गया कि किस प्रकार सही स्थान और सही समय पर रोपण कर बांस के पौधों को बेहतर तरीके से विकसित किया जा सकता है।
कई वनकर्मी रहे मौजूद
इस प्रशिक्षण कार्यक्रम में वनपाल संतोष सिंह, नंदलाल साहू, रामकुमार, शशांक शेखर पांडेय सहित कई वनकर्मी मौजूद रहे।
इसके अलावा वनरक्षी निरंजन कुमार, देवपाल भगत, वीर सिंह, गुलशन सुरीन तथा कुटकू और छिपादोहर पूर्वी व पश्चिमी रेंज के अधिकांश वनकर्मियों ने प्रशिक्षण में भाग लिया।

न्यूज़ देखो: बांस रोपण से कम हो सकता है गज-मानव संघर्ष
झारखंड के कई क्षेत्रों में हाथियों और इंसानों के बीच संघर्ष एक गंभीर समस्या बन चुका है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि हाथी-कोरिडोर में पर्याप्त भोजन और प्राकृतिक संसाधन उपलब्ध कराए जाएं, तो हाथियों का रुख जंगल की ओर ही बना रहेगा। बांस रोपण जैसी पहल इस दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम साबित हो सकती है। हर खबर पर रहेगी हमारी नजर।
संरक्षण से ही सुरक्षित रहेगा वन्य जीवन
वन्यजीव संरक्षण केवल जंगलों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह इंसानों और प्रकृति के बीच संतुलन बनाए रखने का प्रयास भी है। यदि वैज्ञानिक तरीके से वनों का संरक्षण किया जाए, तो मानव और वन्यजीव दोनों सुरक्षित रह सकते हैं।
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