रायडीह में दस हजार से अधिक खोड़हा दलों की सहभागिता के साथ अंतरराजीय कार्तिक जतरा का भव्य शुभारंभ

रायडीह में दस हजार से अधिक खोड़हा दलों की सहभागिता के साथ अंतरराजीय कार्तिक जतरा का भव्य शुभारंभ

author News देखो Team
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#रायडीह #जनजातीय_संस्कृति : आदिवासी परंपरा शिक्षा और स्वशासन के संकल्प के साथ कार्तिक जतरा का आयोजन।

गुमला जिले के रायडीह प्रखंड में सोमवार को दो दिवसीय अंतरराजीय जन सांस्कृतिक समागम कार्तिक जतरा का भव्य शुभारंभ हुआ। पंखराज साहेब कार्तिक उरांव आदिवासी शक्ति स्वायत शासी विश्व विद्यालय निर्माण समिति के तत्वावधान में आयोजित इस आयोजन में दस हजार से अधिक खोड़हा दलों ने पारंपरिक वेशभूषा में नृत्य गीत और ढोल नगाड़ों के साथ सहभागिता की। कार्यक्रम का उद्देश्य जनजातीय संस्कृति का संरक्षण और आदिवासी स्वायत शासी विश्व विद्यालय निर्माण के संकल्प को आगे बढ़ाना रहा। यह आयोजन जनजातीय अस्मिता शिक्षा और सांस्कृतिक चेतना का सशक्त मंच बनकर उभरा है।

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  • रायडीह प्रखंड में दो दिवसीय अंतरराजीय कार्तिक जतरा का शुभारंभ।
  • दस हजार से अधिक खोड़हा दलों की पारंपरिक वेशभूषा में सहभागिता।
  • नेशनल हाईवे 43 से कार्तिक उरांव चौक तक सांस्कृतिक जुलूस।
  • आदिवासी शक्ति स्वायत शासी विश्व विद्यालय निर्माण का संकल्प दोहराया गया।
  • पूर्व पीएमओ सुरक्षा सलाहकार डॉ रामाकांत द्वेवेदी रहे मुख्य अतिथि।

गुमला जिले के रायडीह प्रखंड में जनजातीय संस्कृति और शिक्षा के संगम का अद्भुत दृश्य सोमवार को देखने को मिला, जब दो दिवसीय अंतरराजीय जन सांस्कृतिक समागम ‘कार्तिक जतरा’ का विधिवत शुभारंभ किया गया। इस भव्य आयोजन में झारखंड सहित छत्तीसगढ़ और उड़ीसा के सीमावर्ती क्षेत्रों से आए दस हजार से अधिक खोड़हा दलों ने भाग लेकर अपनी सांस्कृतिक विरासत का जीवंत प्रदर्शन किया।

पंखराज साहेब कार्तिक उरांव आदिवासी शक्ति स्वायत शासी विश्व विद्यालय निर्माण समिति द्वारा आयोजित इस कार्यक्रम में जनजातीय समाज की एकजुटता, परंपरा और भविष्य की दिशा तीनों स्पष्ट रूप से परिलक्षित हुई।

पारंपरिक जुलूस ने बांधा समां

कार्तिक जतरा के शुभारंभ के अवसर पर खोड़हा दलों ने पारंपरिक जनजातीय वेशभूषा धारण कर कार्यक्रम स्थल से एक भव्य सांस्कृतिक जुलूस निकाला। यह जुलूस नेशनल हाईवे 43 से प्रारंभ होकर कार्तिक उरांव चौक तक पहुंचा, जहां ढोल-नगाड़ों की थाप पर नृत्य-गीत प्रस्तुत किए गए।

इसके बाद सभी दल पुनः जुलूस के रूप में मुख्य कार्यक्रम स्थल पहुंचे। पूरे मार्ग में जनजातीय नृत्य, गीत और पारंपरिक वाद्य यंत्रों की गूंज से वातावरण उत्सवमय बना रहा। ग्रामीणों और दर्शकों ने इस सांस्कृतिक यात्रा को आदिवासी अस्मिता का प्रतीक बताया।

शिक्षा से समाज उत्थान का संदेश

कार्यक्रम के मुख्य अतिथि पूर्व प्रधानमंत्री कार्यालय के सुरक्षा सलाहकार डॉ रामाकांत द्वेवेदी ने अपने संबोधन में पंखराज साहेब कार्तिक उरांव के योगदान को याद करते हुए कहा कि उन्होंने राष्ट्रीय स्तर पर विज्ञान और अध्ययन के क्षेत्र में अपनी विशेष पहचान बनाई थी।

डॉ रामाकांत द्वेवेदी ने कहा: “कार्तिक उरांव ने हमेशा शिक्षा को जनजातीय समाज के उत्थान का सबसे सशक्त माध्यम माना। शिक्षित समाज से ही बेहतर और सशक्त समाज की परिकल्पना की जा सकती है।”

उन्होंने कहा कि कार्तिक उरांव के सपनों को साकार करने के लिए समिति अध्यक्ष शिवशंकर उरांव निरंतर प्रयासरत हैं और आदिवासी शक्ति स्वायत शासी विश्व विद्यालय का निर्माण इस दिशा में एक ऐतिहासिक कदम होगा।

संस्कृति संरक्षण का आह्वान

इस अवसर पर छत्तीसगढ़ के पूर्व मंत्री सह विवि निर्माण समिति सदस्य गणेश राम भगत ने कार्तिक उरांव के विचारों को याद करते हुए कहा कि उन्होंने जनजातीय समाज को अपनी संस्कृति से जुड़े रहने का संदेश दिया था।

गणेश राम भगत ने कहा: “कार्तिक उरांव कहा करते थे ‘जे नाची से बाची’, अर्थात जो अपनी संस्कृति और परंपरा से जुड़ा रहेगा वही बचेगा।”

उन्होंने बताया कि शिवशंकर उरांव बीते 15 वर्षों से लगातार संघर्ष करते हुए आदिवासी शक्ति स्वायत शासी विश्व विद्यालय निर्माण के लक्ष्य की ओर अग्रसर हैं। उन्होंने यह भी जानकारी दी कि इस जनजातीय सांस्कृतिक समागम में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को आमंत्रित किया गया है, जो इस आंदोलन की ऐतिहासिकता को दर्शाता है।

शिवशंकर उरांव ने रखा विजन

समिति के अध्यक्ष सह पूर्व विधायक शिवशंकर उरांव ने कहा कि बाबा कार्तिक उरांव का सपना था कि झारखंड, छत्तीसगढ़ और उड़ीसा के सीमावर्ती क्षेत्र में जनजातीय समुदाय के लिए एक आदिवासी शक्ति स्वायत शासी विश्व विद्यालय की स्थापना हो।

उन्होंने बताया कि शंखमोड़ मांझाटोली बेरियर बगीचा में पिछले 15 वर्षों से लगातार जनजातीय सांस्कृतिक समागम कार्तिक जतरा का आयोजन किया जा रहा है, ताकि समाज को अपने अधिकार, शिक्षा और संस्कृति के प्रति जागरूक किया जा सके।

जनजातीय चेतना का मंच

कार्तिक जतरा केवल सांस्कृतिक आयोजन नहीं, बल्कि जनजातीय समाज की एकजुटता, आत्मसम्मान और भविष्य की दिशा तय करने वाला मंच बनता जा रहा है। यहां संस्कृति, शिक्षा और स्वशासन तीनों मुद्दों पर खुलकर चर्चा हो रही है, जिससे आने वाली पीढ़ियों को स्पष्ट संदेश मिल रहा है।

दूर-दराज से आए खोड़हा दलों की विशाल सहभागिता ने यह साबित कर दिया कि जनजातीय समाज अपनी पहचान और अधिकारों को लेकर सजग और संगठित है।

न्यूज़ देखो: संस्कृति और शिक्षा का संगम

रायडीह में आयोजित कार्तिक जतरा जनजातीय संस्कृति के संरक्षण के साथ-साथ शिक्षा आधारित समाज निर्माण का मजबूत संदेश देता है। आदिवासी शक्ति स्वायत शासी विश्व विद्यालय की मांग अब केवल सपना नहीं, बल्कि एक संगठित जनआंदोलन का रूप लेती दिख रही है। अब यह देखना अहम होगा कि सरकार और नीति-निर्माता इस आवाज़ पर क्या कदम उठाते हैं। हर खबर पर रहेगी हमारी नजर।

अपनी संस्कृति बचाएं, भविष्य गढ़ें

कार्तिक जतरा हमें याद दिलाता है कि अपनी परंपरा से जुड़े रहकर ही प्रगति संभव है। शिक्षा, संस्कृति और संगठन—इन तीनों को अपनाकर ही समाज मजबूत बन सकता है। इस खबर को साझा करें, अपनी राय कमेंट में लिखें और जनजातीय संस्कृति व शिक्षा के इस संकल्प को आगे बढ़ाने में भागीदार बनें।

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