
#चंदवा #लातेहार #आदिवासी_अधिकार : ग्रामीणों ने भूमि हक लागू करने की सशक्त मांग उठाई।
लातेहार जिले के चंदवा प्रखंड के ग्राम दूधीमाटी में वन अधिकारों की अनदेखी के खिलाफ सैकड़ों ग्रामीण एकजुट हुए। इस सामूहिक आयोजन में जंगल संरक्षण और भूमिहीन आदिवासी परिवारों को कानूनी भूमि अधिकार दिलाने की प्रमुख मांग रखी गई। मौके पर वन अधिकार समिति के केंद्रीय प्रभारी राजेश कुमार महतो द्वारा ग्राम सभा भवन का उद्घाटन किया गया। ग्रामीणों ने पेसा कानून और वन पट्टा प्रक्रिया को प्रभावी ढंग से लागू करने की चेतावनी सरकार को दी, जिसे क्षेत्र के लिए महत्वपूर्ण पहल माना जा रहा है।
- चंदवा के लाधूप पंचायत स्थित दूधीमाटी गांव में विशाल ग्राम सभा आयोजित।।
- वन अधिकार समिति के केंद्रीय प्रभारी राजेश कुमार महतो ने किया भवन उद्घाटन।।
- ग्राम प्रधान भिखु मुंडा के नेतृत्व में गाड़ा गया अधिसूचना बोर्ड।।
- भूमिहीन आदिवासी परिवारों को वन पट्टा देने की मांग तेज हुई।।
- पेसा कानून के सही क्रियान्वयन पर ग्रामीणों ने जताई नाराजगी।।
- कॉरपोरेट कब्जों और वन विभाग की विफलता पर उठे सवाल।।
लातेहार जिले के चंदवा प्रखंड के सुदूरवर्ती क्षेत्र दूधीमाटी में आयोजित यह ग्राम सभा कार्यक्रम आदिवासी समाज की बढ़ती जागरूकता और एकता का मजबूत उदाहरण बनकर उभरा है। बुधवार को हुए इस आयोजन में आसपास के कई गांवों के लोग बड़ी संख्या में शामिल हुए। ग्रामीणों का कहना था कि वन अधिकार कानून को कमजोर करने और उनकी पारंपरिक जमीनों से उन्हें दूर करने की कोशिश लगातार की जा रही है, जिसके खिलाफ अब संगठित आवाज उठाना जरूरी हो गया है।
उद्घाटन समारोह से शुरू हुई अधिकारिक पहल
ग्राम सभा भवन का विधिवत शुभारंभ
कार्यक्रम का आरंभ ग्राम सभा के नवनिर्मित भवन के उद्घाटन से हुआ। वन अधिकार समिति के केंद्रीय प्रभारी राजेश कुमार महतो ने फीता काटकर भवन का उद्घाटन किया। इस अवसर पर ग्रामीणों ने पारंपरिक तरीके से उनका स्वागत किया। भवन उद्घाटन के बाद गांव के लोगों ने कहा कि यह भवन भविष्य में उनके संवैधानिक अधिकारों के संरक्षण और ग्राम स्तरीय निर्णय प्रक्रिया का प्रमुख केंद्र बनेगा।
उद्घाटन के तुरंत बाद ग्राम प्रधान भिखु मुंडा के मार्गदर्शन में पूरे रीति-रिवाज के साथ पूजा-अर्चना की गई। पूजा के उपरांत अधिसूचना बोर्ड गाड़ा गया, जिसके माध्यम से ग्राम सभा की अधिकारिक भूमिका, जिम्मेदारियों और क्षेत्रीय हकों को सार्वजनिक रूप से स्थापित किया गया। यह प्रक्रिया इस बात का संकेत थी कि ग्रामीण अपने अधिकारों को विधि सम्मत तरीके से दर्ज कराने के लिए पूरी तरह तैयार हैं।
वन अधिकार कानून पर ग्रामीणों का आक्रोश
अधिकारों को कमजोर करने का आरोप
ग्राम सभा में सबसे प्रमुख विषय वन अधिकार अधिनियम और पेसा कानून का क्रियान्वयन रहा। केंद्रीय प्रभारी राजेश कुमार महतो ने अपने संबोधन में कहा कि सरकार द्वारा बनाए गए कानून का लाभ वास्तविक हकदारों तक नहीं पहुंच रहा है।
उन्होंने कहा:
“वन अधिकार कानून आदिवासी और वन आश्रित समुदायों के लिए बनाया गया था, लेकिन आज यह कानून धरातल पर सही ढंग से लागू नहीं हो पा रहा है।”
राजेश महतो ने आरोप लगाया कि कॉरपोरेट घराने वन नियमों को दरकिनार कर आदिवासी क्षेत्रों की जमीनों पर अवैध कब्जा कर रहे हैं। उन्होंने यह भी कहा कि वन विभाग अपने मूल दायित्व यानी जंगलों की रक्षा करने में असफल साबित हो रहा है। विभागीय स्तर पर लापरवाही के कारण जंगलों का दोहन बढ़ रहा है और आदिवासी समाज के सामने रोजी-रोटी का संकट खड़ा हो रहा है।
भूमिहीनों की समस्या पर जोर
सभा के दौरान ग्रामीणों ने कहा कि बड़ी संख्या में आदिवासी परिवार ऐसे हैं, जो पीढ़ियों से जंगल भूमि पर निर्भर हैं, लेकिन सरकारी व्यवस्था उन्हें भूमिहीन मानती है। ऐसे परिवारों को व्यक्तिगत और सामुदायिक वन पट्टा मिलना चाहिए, ताकि वे सम्मानजनक जीवन जी सकें।
ग्रामीण वक्ताओं ने यह भी कहा कि जब तक भूमि अधिकार नहीं मिलेगा, तब तक वन संरक्षण का संकल्प अधूरा रहेगा। लोगों ने मांग की कि वन पट्टा दावों का निपटारा ग्राम सभा की अनुशंसा के आधार पर तेजी से किया जाए।
पेसा कानून लागू न होने से बढ़ रही समस्याएं
जमीन लूट की घटनाएं बढ़ने का दावा
ग्रामीणों ने बताया कि पेसा कानून को सही रूप में लागू नहीं किया जा रहा है, जिसके कारण स्थानीय स्तर पर निर्णय लेने की ग्राम सभाओं की शक्ति कमजोर पड़ गई है। इसके परिणामस्वरूप आदिवासी इलाकों में जमीन लूट और अवैध खनन जैसी घटनाएं बढ़ रही हैं।
सभा में मौजूद कई बुजुर्ग ग्रामीणों ने कहा कि बिना ग्राम सभा की सहमति के परियोजनाएं लागू की जाती हैं, जिससे उनके जल, जंगल और जमीन से जुड़े अधिकार प्रभावित होते हैं। इस पर तत्काल रोक लगनी चाहिए।
समाजसेवी फूलचंद गंझू ने भी रखी बात
अधिकार और आत्मसम्मान का विषय
स्थानीय समाजसेवी एवं वार्ड सदस्य फूलचंद गंझू ने सभा को संबोधित करते हुए कहा कि यह कार्यक्रम केवल विरोध प्रदर्शन नहीं, बल्कि आदिवासी समाज के अस्तित्व की रक्षा से जुड़ा कदम है।
फूलचंद गंझू ने कहा कि सरकार को चाहिए कि वह भूमिहीन आदिवासी परिवारों को जमीन उपलब्ध कराए और ग्राम सभाओं को वास्तविक शक्ति प्रदान करे। उन्होंने ग्रामीणों से एकजुट रहने और शांतिपूर्ण लोकतांत्रिक तरीके से संघर्ष जारी रखने का आह्वान किया।
पारंपरिक आयोजन में दिखी आदिवासी एकता
कई गांवों की सहभागिता
कार्यक्रम में इंदिरा आशीष, विजय भगत, दिलीप उरांव, सुधीर मुंडा, रवि गंझू, रामवचन देव गंझू, रामधन गंझू, सुनील भगत, बीफई भगत सहित बड़ी संख्या में ग्रामीण उपस्थित रहे। इसके अलावा दर्जनों गांवों से आए सैकड़ों आदिवासी महिला-पुरुषों ने सक्रिय भागीदारी निभाई।
सभी ग्रामीणों ने एक स्वर में जंगल और जमीन बचाने का संकल्प लिया। उन्होंने कहा कि वे अपनी पारंपरिक संस्कृति, पर्यावरण और कानूनी हकों की रक्षा के लिए संगठित रूप से प्रयास करेंगे।
सरकार और प्रशासन से ये प्रमुख मांगें
दूधीमाटी में आयोजित इस सभा के माध्यम से ग्रामीणों द्वारा निम्न प्रमुख मांगें रखी गईं:
- वन अधिकार अधिनियम का पारदर्शी और तेज क्रियान्वयन
- भूमिहीन परिवारों को शीघ्र वन पट्टा प्रदान करना
- पेसा कानून को वास्तविक रूप में लागू करना
- वन भूमि पर कॉरपोरेट कब्जों पर सख्त रोक
- किसी भी परियोजना से पहले ग्राम सभा की अनिवार्य सहमति
ग्रामीणों ने चेतावनी भरे लहजे में कहा कि यदि उनकी मांगों पर ध्यान नहीं दिया गया, तो वे बड़े स्तर पर आंदोलन करने के लिए मजबूर होंगे।
पर्यावरण संरक्षण पर भी हुआ मंथन
सभा में केवल भूमि अधिकार ही नहीं, बल्कि जंगल संरक्षण के महत्व पर भी चर्चा की गई। ग्रामीणों ने कहा कि जंगल केवल प्राकृतिक संपदा नहीं, बल्कि उनकी परंपरा और जीवन का आधार है। उन्होंने वादा किया कि वे अवैध कटाई, खनन और अतिक्रमण के खिलाफ निगरानी रखेंगे।
कार्यक्रम के अंत में पारंपरिक वाद्य यंत्रों के साथ सांस्कृतिक प्रस्तुति भी की गई, जिससे पूरे आयोजन का वातावरण और अधिक प्रभावशाली बन गया।
न्यूज़ देखो: हकों की हकीकत
दूधीमाटी गांव में हुआ यह विशाल जुटान स्पष्ट करता है कि आदिवासी समाज अब अपने अधिकारों के प्रति चुप नहीं रहेगा। ग्राम सभा भवन का उद्घाटन ग्रामीण लोकतंत्र को मजबूत करने का प्रतीक है, लेकिन असली जरूरत वन अधिकार कानून के सही क्रियान्वयन की है। न्यूज़ देखो मानता है कि भूमिहीन परिवारों को जमीन मिलना प्रशासन की प्राथमिक जिम्मेदारी होनी चाहिए। क्या सरकार इन मांगों को गंभीरता से लेकर आगे ठोस कदम उठाएगी, यह बड़ा सवाल है। हर खबर पर रहेगी हमारी नजर।
अधिकारों के लिए सजगता ही सबसे बड़ी ताकत
इस तरह के आयोजन हमें याद दिलाते हैं कि लोकतंत्र में अधिकार मांगने के लिए एकजुट होना जरूरी है। आप भी अपने गांव की ग्राम सभाओं में सक्रिय भाग लें। वन अधिकार अधिनियम की जानकारी अधिक से अधिक लोगों तक पहुंचाएं। सामाजिक कुरीतियों और अवैध कब्जों के खिलाफ प्रशासन को सूचित करें।
जंगल और जमीन की रक्षा हम सभी की साझा जिम्मेदारी है। इस खबर पर अपनी राय कमेंट में जरूर दें। लेख को ज्यादा से ज्यादा शेयर कर जागरूकता अभियान को मजबूत बनाएं। आपकी सहभागिता से ही आदिवासी समाज को न्याय और सम्मान मिल सकेगा।





