#महुआडांड़ #एआई_संगोष्ठी : शिक्षा में ईमानदारी और आलोचनात्मक सोच पर विशेषज्ञों ने रखे विचार।
लातेहार जिले के महुआडांड़ स्थित संत जेवियर कॉलेज में जनरेटिव एआई विषय पर अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी आयोजित हुई। कार्यक्रम में देश-विदेश के शिक्षाविदों, प्राध्यापकों और विद्यार्थियों ने भाग लिया। इसमें एआई के शैक्षणिक प्रभाव, नैतिक उपयोग और आलोचनात्मक सोच पर गहन चर्चा की गई। विशेषज्ञों ने तकनीक के साथ मानवीय मूल्यों को बनाए रखने पर जोर दिया।
- संत जेवियर कॉलेज, महुआडांड़ में अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन।
- मुख्य वक्ता डॉ. फादर एम. के. जॉर्ज (रोम) ने एआई पर रखा दृष्टिकोण।
- शैक्षणिक ईमानदारी और आलोचनात्मक सोच पर विशेष जोर।
- प्रो. रोजी सुष्मिता ने जनरेटिव एआई पर शोध-पत्र प्रस्तुत किया।
- ‘फ्लोरल डायवर्सिटी’ और ‘जेवियर क्विंटेसेंस’ पुस्तकों का विमोचन।
लातेहार जिले के महुआडांड़ स्थित संत जेवियर कॉलेज के सभागार में “जनरेटिव आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का शैक्षणिक ईमानदारी एवं आलोचनात्मक सोच पर प्रभाव” विषय पर एक भव्य अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया गया। इस कार्यक्रम में देश-विदेश के शिक्षाविदों, प्राध्यापकों और विद्यार्थियों की सक्रिय भागीदारी देखने को मिली, जिससे यह आयोजन ज्ञान-विमर्श का एक महत्वपूर्ण मंच बन गया।
मुख्य वक्ता ने तकनीक और नैतिकता का संतुलन बताया जरूरी
संगोष्ठी के मुख्य वक्ता डॉ. फादर एम. के. जॉर्ज (जनरल असिस्टेंट, येसु समाज, रोम) ने अपने विचार रखते हुए कहा कि जनरेटिव एआई आधुनिक शिक्षा के लिए एक शक्तिशाली उपकरण है, लेकिन इसकी उपयोगिता तभी सार्थक है जब इसे नैतिकता और ईमानदारी के साथ अपनाया जाए।
डॉ. फादर एम. के. जॉर्ज ने कहा: “जनरेटिव एआई एक अत्यंत शक्तिशाली साधन है, लेकिन शिक्षा की जड़ें हमेशा ईमानदारी और मानवीय चिंतन में ही निहित रहनी चाहिए।”
उन्होंने स्पष्ट किया कि तकनीक सीखने की प्रक्रिया को बेहतर बना सकती है, लेकिन यह कभी भी आलोचनात्मक सोच और नैतिक जिम्मेदारी का स्थान नहीं ले सकती।
प्राचार्य ने जिम्मेदार डिजिटल उपयोग पर दिया बल
महाविद्यालय के प्राचार्य डॉ. फादर एम. के. जोस ने डिजिटल युग में तकनीक के बढ़ते प्रभाव पर चिंता और उम्मीद दोनों व्यक्त की।
डॉ. फादर एम. के. जोस ने कहा: “डिजिटल युग में जहां ज्ञान तक पहुंच आसान हुई है, वहीं जिम्मेदारी भी बढ़ी है। तकनीक हमें सशक्त बनाए, न कि निर्भर और निष्क्रिय।”
उन्होंने विद्यार्थियों को प्रेरित किया कि वे तकनीक का उपयोग सीखने और नवाचार के लिए करें, न कि केवल सुविधा के लिए।
शोध-पत्र और पुस्तकों का हुआ विमोचन
इस अवसर पर प्राध्यापिका प्रो. रोजी सुष्मिता ने जनरेटिव एआई के शैक्षणिक उपयोग, उसकी संभावनाओं और चुनौतियों पर आधारित अपना शोध-पत्र प्रस्तुत किया, जिसे उपस्थित लोगों ने काफी सराहा।
साथ ही दो महत्वपूर्ण पुस्तकों—‘फ्लोरल डायवर्सिटी’ और ‘जेवियर क्विंटेसेंस’ का विधिवत विमोचन किया गया। ‘फ्लोरल डायवर्सिटी’ में प्रकृति की विविधता को दर्शाया गया है, जबकि ‘जेवियर क्विंटेसेंस’ में महाविद्यालय की शैक्षणिक और सांस्कृतिक उपलब्धियों का संकलन प्रस्तुत किया गया है।
संगोष्ठी में उठे अहम मुद्दे
कार्यक्रम के दौरान एआई के विभिन्न पहलुओं पर विस्तार से चर्चा की गई। प्रमुख बिंदु इस प्रकार रहे:
- एआई के संतुलित और नैतिक उपयोग पर जोर
- शैक्षणिक ईमानदारी और मौलिकता बनाए रखने की आवश्यकता
- तकनीक के दुरुपयोग से संभावित खतरों पर विचार
- विद्यार्थियों में आलोचनात्मक सोच विकसित करने की जरूरत
इन चर्चाओं ने यह स्पष्ट किया कि भविष्य की शिक्षा में तकनीक और मानवीय मूल्यों का संतुलन बेहद जरूरी होगा।
प्रश्नोत्तर सत्र में विद्यार्थियों की सक्रिय भागीदारी
संगोष्ठी के दौरान आयोजित प्रश्नोत्तर सत्र में विद्यार्थियों ने उत्साहपूर्वक भाग लिया। उन्होंने एआई के उपयोग, सीमाओं और भविष्य से जुड़े कई महत्वपूर्ण सवाल पूछे।
विशेषज्ञों ने इन सवालों के विस्तार से उत्तर दिए, जिससे विद्यार्थियों को विषय की गहराई से समझ प्राप्त हुई और उनके मन में उठ रही शंकाओं का समाधान हुआ।
गणमान्य अतिथियों की गरिमामयी उपस्थिति
इस महत्वपूर्ण आयोजन में कई गणमान्य व्यक्तियों और प्राध्यापकों की उपस्थिति रही। इनमें उपप्राचार्य फादर समीर टोप्पो, फादर लियो, सिस्टर चन्द्रोदया, फादर राजीप सहित अनेक प्राध्यापक—प्रो. सुबोध, प्रो. बंसति, प्रो. अंकिता, प्रो. आदिति, प्रो. रेचेल, प्रो. शेफाली, प्रो. सुकुट, प्रो. रोनित, प्रो. शशि, प्रो. मन्नू, प्रो. जामेश, प्रो. मोनिका आदि शामिल रहे।
सभी ने इस संगोष्ठी को ज्ञान और संवाद का एक सशक्त मंच बताया और इसके आयोजन की सराहना की।
न्यूज़ देखो: तकनीक के दौर में मूल्यों की परीक्षा
महुआडांड़ में आयोजित यह संगोष्ठी स्पष्ट संकेत देती है कि एआई के बढ़ते प्रभाव के बीच शिक्षा के मूल मूल्य चुनौती के दौर से गुजर रहे हैं। यह पहल न केवल तकनीक के उपयोग को समझने का मंच है, बल्कि यह भी याद दिलाती है कि ईमानदारी और सोच ही असली शिक्षा की पहचान है। अब सवाल यह है कि क्या शैक्षणिक संस्थान इस संतुलन को बनाए रख पाएंगे? हर खबर पर रहेगी हमारी नजर।
ज्ञान और तकनीक का संतुलन बनाएं, जिम्मेदार बनें
आज का दौर तेजी से बदल रही तकनीक का है, जहां हर दिन नई चुनौतियां सामने आ रही हैं।
जरूरी है कि हम तकनीक को अपनाएं, लेकिन अपने मूल्यों को न भूलें।
विद्यार्थियों को चाहिए कि वे केवल जानकारी नहीं, बल्कि सही सोच और दृष्टिकोण विकसित करें।
यही संतुलन उन्हें भविष्य में सफल और जिम्मेदार नागरिक बनाएगा।
अगर आप भी मानते हैं कि शिक्षा में नैतिकता और सोच सबसे जरूरी है,
तो इस खबर को शेयर करें और अपनी राय कमेंट में जरूर दें।
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