
#बानो #सिमडेगा #कोयलनदी : झारखंड की प्रमुख नदी अपने प्रवाह में प्रकृति, इतिहास और पर्यटन को समेटे हुए है।
झारखंड की प्रसिद्ध कोयल नदी लोहरदगा से उद्गम लेकर सिमडेगा तक बहते हुए प्राकृतिक सौंदर्य, पौराणिक मान्यताओं और पर्यटन संभावनाओं का अनूठा संगम प्रस्तुत करती है। यह नदी ऊँचे पहाड़ों, घने जंगलों और भव्य जलप्रपातों से गुजरती है। कोयल नदी न केवल जीवनदायिनी जलधारा है, बल्कि आदिवासी संस्कृति और लोककथाओं से भी गहराई से जुड़ी हुई है। इसके बावजूद पर्यटन विकास के अभाव में इसकी क्षमता अब तक पूरी तरह सामने नहीं आ सकी है।
- कोयल नदी का उद्गम लोहरदगा जिला से।
- बूढ़ा जलप्रपात झारखंड का सबसे ऊँचा जलप्रपात।
- दूधमुख और बाघमुड़ा जलप्रपात प्रमुख आकर्षण।
- बानो क्षेत्र में पौराणिक कथा से जुड़ा प्रवाह।
- पर्यटन विकास की अपार संभावनाएं, पर पहल सीमित।
झारखंड की प्रमुख नदियों में शामिल कोयल नदी अपने उद्गम से लेकर अंतिम संगम तक प्राकृतिक छटाओं को संजोए हुए बहती है। यह नदी लोहरदगा जिले से निकलकर घने जंगलों और ऊँचे पहाड़ों को चीरती हुई आगे बढ़ती है, जहां इसका जलप्रवाह बूढ़ा जलप्रपात का भव्य रूप ले लेता है। लगभग 450 मीटर ऊँचाई वाला यह जलप्रपात झारखंड का सबसे ऊँचा जलप्रपात माना जाता है और दूर-दूर से पर्यटकों को आकर्षित करता है।
जलप्रपातों से सजी कोयल की यात्रा
आगे बढ़ते हुए कोयल नदी गुमला जिले में प्रवेश करती है, जहां यह दूधमुख जलप्रपात का स्वरूप धारण करती है। यह स्थान स्थानीय लोगों के साथ-साथ सैलानियों के लिए एक लोकप्रिय पिकनिक स्थल बन चुका है। इसके बाद बसिया क्षेत्र में स्थित बाघमुड़ा जलप्रपात भी कोयल नदी की सुंदरता में चार चांद लगाता है। वर्ष भर यहां प्राकृतिक शांति और सुकून की तलाश में लोग पहुंचते हैं।
बानो क्षेत्र में प्राकृतिक अद्भुत दृश्य
गुमला से आगे बहते हुए कोयल नदी सिमडेगा जिले के बानो प्रखंड में प्रवेश करती है। यहां नदी का एक किनारा बानो में जबकि दूसरा किनारा खूंटी जिले में स्थित है। दोनों ओर ऊँचे पहाड़ों के बीच कल-कल करती बहती नदी का दृश्य अत्यंत मनोहारी प्रतीत होता है। यह क्षेत्र प्राकृतिक फोटोग्राफी और प्रकृति प्रेमियों के लिए किसी स्वर्ग से कम नहीं है।
पौराणिक मान्यताओं से जुड़ी कथा
कोयल नदी से जुड़ी एक रोचक लोककथा भी प्रचलित है। मान्यता के अनुसार बानो प्रखंड के ओल्हान गांव और रनिया प्रखंड के कोटांगेर के समीप, नदी के उद्गम के समय एक विशाल सांप ने जलप्रवाह को रोकने का प्रयास किया था। तेज धार के कारण वह सांप दो भागों में बंट गया। आज भी स्थानीय लोग चट्टानों के रूप में उस सांप के अवशेष देखे जाने की बात कहते हैं। बानो की ओर सांप का सिर और दूसरी ओर उसका शरीर बताया जाता है। यह कथा आज भी आदिवासी समाज की सांस्कृतिक विरासत का हिस्सा बनी हुई है।
पेरवां घाघ और डाडिंग दह
चट्टानों के बीच घुमावदार बहती कोयल नदी आगे चलकर पेरवां घाघ के नाम से जानी जाती है। इसी क्षेत्र में स्थित डाडिंग दह वर्तमान समय में एक प्रमुख पर्यटन स्थल के रूप में उभर रहा है। जिले के अधिकारी हों या आम नागरिक, यहां की प्राकृतिक खूबसूरती सभी को आकर्षित करती है।
विकास की अनदेखी, संभावनाएं अपार
इतनी विशाल प्राकृतिक और पर्यटन संभावनाओं के बावजूद अब तक पर्यटन विभाग की ओर से इस क्षेत्र के विकास के लिए ठोस पहल नहीं की गई है। यदि सड़क, सुरक्षा, सूचना केंद्र और मूलभूत सुविधाओं का योजनाबद्ध विकास किया जाए, तो कोयल नदी क्षेत्र झारखंड के प्रमुख पर्यटन मानचित्र पर मजबूती से उभर सकता है। इससे स्थानीय लोगों को रोजगार के अवसर भी प्राप्त हो सकते हैं।
संगम के साथ आगे की यात्रा
आगे चलकर कोयल नदी आनंदपुर समीज आश्रम के पास कारो नदी से मिलती है। इसके बाद ओडिशा में यह देव नदी और राउरकेला के वेदव्यास क्षेत्र में शंख नदी से संगम कर अपनी आगे की यात्रा तय करती है।
न्यूज़ देखो: प्रकृति की धरोहर, विकास की प्रतीक्षा
कोयल नदी झारखंड की प्राकृतिक और सांस्कृतिक पहचान है। यह क्षेत्र पर्यटन के माध्यम से स्थानीय विकास का बड़ा आधार बन सकता है, बशर्ते इसे नीति और इच्छाशक्ति का सहारा मिले। हर खबर पर रहेगी हमारी नजर।
प्रकृति को सहेजें, भविष्य को संवारें
कोयल नदी जैसे प्राकृतिक धरोहरों का संरक्षण और संवर्धन हम सभी की जिम्मेदारी है।
पर्यटन विकास के साथ पर्यावरण संतुलन बनाए रखना जरूरी है।
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प्रकृति बचेगी तभी भविष्य सुरक्षित रहेगा।





