
#जयंती_विशेषांक #संगीत_विरासत : एक ऐसा गीत जिसे रफ़ी और हेमंत दा ने छोड़ा और यसुदास ने अमर बना दिया।
महान पार्श्वगायक के. जे. यसुदास के जन्मदिन पर उनके संगीत जीवन से जुड़ा एक दुर्लभ और ऐतिहासिक प्रसंग सामने आता है। यह वह गीत है जिसे मोहम्मद रफ़ी और हेमंत कुमार जैसे दिग्गज गायक भी गाने में असमर्थ रहे। अंततः यसुदास ने इस चुनौतीपूर्ण रचना को अपनी साधना और परिपूर्णता से अमर बना दिया। यह प्रसंग भारतीय संगीत की उस परंपरा को रेखांकित करता है जहाँ साधना, श्रम और आत्मा का संगम होता था।
- यसुदास का जन्म 10 जनवरी 1940 को हुआ।
- गीत ‘षड्जने पाया ये वरदान’ को रविंद्र जैन ने कंपोज़ किया।
- यह गीत फ़िल्म तानसेन के लिए रचा गया था।
- 59 टेक और तीन दिन में पूरी हुई रिकॉर्डिंग।
- लता मंगेशकर ने यसुदास को दुर्लभ स्तर का गायक बताया।
बहुत लोग शायद इस बात पर यकीन नहीं कर पाएंगे कि एक गाना ऐसा भी था जिसे गायकी के लैजेंड, मोहम्मद रफ़ी साहब ने भी गाने में असमर्था जता दी थी। और आखिरकार वो गाना यसुदास जी ने गाया था। हालांकि यसुदास के लिए भी वो गाना रिकॉर्ड करना बहुत बड़ी चुनौती साबित हुआ था। उस गाने के बोल थे ‘षड्जने पाया ये वरदान’। ये गाना संगीतकार रविंद्र जैन ने कंपोज़ किया था। जिस फ़िल्म के लिए ये गाना कंपोज़ किया गया था उसका नाम था तानसेन।
जब रफ़ी साहब ने हाथ जोड़ लिए
वो फ़िल्म कभी रिलीज़ नहीं हो सकी। लेकिन जब इस गाने के बारे में बात करने रविंद्र जैन मोहम्मद रफ़ी के पास गए तो गाना सुनने के बाद रफ़ी साहब ने उनसे कहा,
“मैं पूरी ज़िंदगी में इस गाने को नहीं गा सकूंगा। मुझे माफ़ कीजिएगा।”
रफ़ी साहब के मना करने के बाद रविंद्र जैन साहब पहुंचे हेमंत कुमार जी के पास। हेमंत दा ने भी वो गाना सुना और रविंद्र जैन से थोड़ा समय मांगा। एक-दो दिन बाद हेमंत दा ने कहा कि इस गाने के बारे में सोचने भर से ही उन्हें टेंशन होने लगी है।
13 मिनट की साधना और 59 टेक
आख़िरकार यसुदास जी वो गाना गाने को तैयार हुए। रविंद्र जैन और यसुदास को 13 मिनट का वो गाना रिकॉर्ड करने में तीन दिनों का समय लगा। और ये रिकॉर्डिंग बिना ब्रेक लिए हुई थी।
कुल 59 टेक्स इस गाने की रिकॉर्डिंग के दौरान हुए थे। रिकॉर्डिंग पूरी होने के बाद रविंद्र जैन और यसुदास दोनों बीमार हो गए थे।
लता मंगेशकर की ऐतिहासिक टिप्पणी
नामी फ़िल्मकार सुभाष के. झा ने अपने एक लेख में बताया था कि जब उन्होंने इस गीत और इसकी रिकॉर्डिंग से जुड़ा प्रसंग लता मंगेशकर के सामने रखा, तो लता जी ने कहा:
“इससे पता चलता है कि यसुदास किस स्तर के गायक हैं। वे उन दुर्लभ गायकों में से हैं जो तब तक सांस भी नहीं लेते जब तक गाने को परफ़ेक्शन के साथ रिकॉर्ड न कर लें।”
लता जी के अनुसार, यसुदास की आवाज़ किसी पैगम्बर या संत की आवाज़ जैसी है। उन्होंने यह भी कहा कि उन्हें यसुदास के साथ बहुत अधिक गीत गाने का अवसर नहीं मिला। उन्होंने त्रिशूल, जीना यहाँ, मेरे रक्षक सहित कुछ फिल्मों में ही साथ गायन किया।
अनरिलीज़्ड गीत और संगीत की ऊँचाई
लता जी और यसुदास जी ने कमाल अमरोही की एक अनरिलीज़्ड फ़िल्म मजनून के लिए भी एक गीत रिकॉर्ड किया था—‘ये हसीन रात’, जिसे ख़य्याम ने कंपोज़ किया था।
आज यसुदास जी का जन्मदिन है। 10 जनवरी 1940 को जन्मे यसुदास आज 86 वर्ष के हो गए हैं। उपरोक्त लेख में जिस गीत का ज़िक्र है, वह यूट्यूब पर उपलब्ध है।
रागों का महासंगम और दिग्गज कलाकार
उस गीत से जुड़ी एक रोचक बात यह भी है कि रविंद्र जैन ने कई रागों का प्रयोग कर यह रचना तैयार की थी—
राग बिलावल, काफी, भैरव, यमन, कल्याण, खमाज, असावरी, बहार और दरबारी।
रिकॉर्डिंग के दौरान ऑर्केस्ट्रा में हरिप्रसाद चौरसिया, पंडित शिवकुमार शर्मा और पार्थसारथी जैसे दिग्गज शामिल थे।
तब और अब का संगीत
यही होता था उस दौर में संगीतकारों का काम करने का तरीका। आज क्या है? कंप्यूटर से धुनें तैयार करके, किसी से भी रिकॉर्ड करा लिया और फिर ऑटोट्यून कर दिया। यह नहीं कहा जा सकता कि आज प्रतिभाशाली गायक नहीं हैं—हैं, और एक से बढ़कर एक हैं।
मगर संगीत खत्म हो चुका है। बुरी तरह खत्म हो चुका है।
सालों से कोई ऐसा फ़िल्मी गीत नहीं आया जिसे क्लासिक कहा जा सके। अफ़सोस।

न्यूज़ देखो: साधना से जन्मा संगीत इतिहास
यसुदास का यह प्रसंग भारतीय संगीत की उस परंपरा को दर्शाता है जहाँ परफ़ेक्शन के लिए स्वास्थ्य, समय और सुविधा तक दांव पर लगाई जाती थी। यह कहानी बताती है कि महानता शॉर्टकट से नहीं, साधना से आती है। हर खबर पर रहेगी हमारी नजर।
जब आवाज़ साधना बन जाए
यसुदास की गायकी हमें याद दिलाती है कि संगीत केवल मनोरंजन नहीं, तपस्या है।
ऐसी विरासत को समझना और अगली पीढ़ी तक पहुँचाना हमारी जिम्मेदारी है।
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