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Garhwa

आइये खुशियाँ बाँटें अभियान ने बढ़ाया मानवीय सरोकार, दो वंचित बस्तियों में पहुँची राहत

#गढ़वा #सामाजिक_पहल : सदर एसडीओ की देखरेख में संचालित अभियान के 28वें दिन 300 से अधिक जरूरतमंदों को मिली राहत सामग्री।
  • आइये खुशियाँ बाँटें अभियान 28वें दिन भी निरंतर जारी।
  • सदर अनुमंडल पदाधिकारी संजय कुमार की देखरेख में हुआ आयोजन।
  • घासी समुदाय की बस्ती और प्रवासी मजदूर परिवारों तक पहुँची सहायता।
  • स्वेटर, जैकेट, टोपी, मोज़े और शॉल का वितरण।
  • ठंड के मौसम में 300 से अधिक जरूरतमंद लाभान्वित।

गढ़वा जिले में ठंड के मौसम के बीच मानवीय संवेदना और प्रशासनिक प्रतिबद्धता का एक सराहनीय उदाहरण “आइये खुशियाँ बाँटें” अभियान के रूप में सामने आ रहा है। सदर अनुमंडल पदाधिकारी संजय कुमार की देखरेख में सामाजिक और प्रशासनिक समन्वय से संचालित यह अभियान अपने 28वें दिन भी निरंतर जारी रहा। शुक्रवार को अभियान के तहत दो वंचित और जरूरतमंद बस्तियों में पहुँचकर करीब 300 से अधिक लोगों के बीच गर्म कपड़े और आवश्यक सामग्री का वितरण किया गया।

यह पहल न केवल ठंड से बचाव का साधन बनी, बल्कि समाज के हाशिये पर खड़े लोगों के लिए यह संदेश भी लेकर आई कि प्रशासन और समाज उनके साथ खड़ा है।

दो बस्तियों में पहुँची राहत

आज का कार्यक्रम गढ़वा सदर क्षेत्र के ओखरगाड़ा मोड़ के पास स्थित घासी समुदाय की बस्ती तथा पिंडरा गांव के समीप रह रहे प्रवासी मजदूर परिवारों के बीच आयोजित किया गया। दोनों ही स्थानों पर लंबे समय से सीमित संसाधनों में जीवन यापन कर रहे परिवारों को ठंड से राहत देने के उद्देश्य से गर्म वस्त्र वितरित किए गए।

घासी समुदाय की बस्ती में बड़ी संख्या में ऐसे परिवार रहते हैं, जिनकी आजीविका अस्थायी श्रम पर निर्भर है। वहीं, पिंडरा गांव के पास रह रहे प्रवासी मजदूरों के परिवार आर्थिक अस्थिरता और सीमित सुविधाओं के बीच जीवन गुजार रहे हैं। ऐसे में यह सहायता उनके लिए बेहद महत्वपूर्ण साबित हुई।

बच्चों से बुजुर्गों तक को मिली मदद

अभियान के दौरान बच्चों, महिलाओं, पुरुषों और बुजुर्गों सभी को उनकी आवश्यकता के अनुसार स्वेटर, जैकेट, टोपी, मोज़े, शॉल एवं अन्य गर्म वस्त्र उपलब्ध कराए गए। वितरण के समय यह विशेष ध्यान रखा गया कि कोई भी जरूरतमंद सहायता से वंचित न रह जाए।

ठंड के इस मौसम में जब न्यूनतम तापमान लगातार गिर रहा है, ऐसे में यह सामग्री जरूरतमंद परिवारों के लिए किसी सुरक्षा कवच से कम नहीं रही। लाभान्वित लोगों के चेहरों पर राहत और संतोष साफ झलक रहा था।

प्रवासी मजदूरों के लिए बना संबल

विशेष रूप से प्रवासी मजदूर परिवारों के लिए यह सहायता किसी संबल से कम नहीं रही। सीमित आय और अस्थायी आवास में रहने वाले इन परिवारों के लिए ठंड से बचाव के साधन जुटाना कठिन होता है। अभियान के तहत मिली राहत ने न केवल उनकी तात्कालिक जरूरत पूरी की, बल्कि उन्हें यह भरोसा भी दिलाया कि संकट की घड़ी में प्रशासन और समाज उनके साथ है।

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स्थानीय लोगों ने बताया कि इस तरह की पहल से समाज में आपसी सहयोग और संवेदनशीलता की भावना मजबूत होती है।

28 दिनों से निरंतर जारी अभियान

प्रशासनिक सूत्रों के अनुसार, “आइये खुशियाँ बाँटें” अभियान पिछले 28 दिनों से लगातार प्रतिदिन चलाया जा रहा है। इस दौरान जिले के विभिन्न क्षेत्रों में पहुँचकर हजारों जरूरतमंदों को गर्म कपड़े और अन्य आवश्यक सामग्री उपलब्ध कराई जा चुकी है।

इस अभियान की खास बात यह है कि इसमें प्रशासन के साथ-साथ समाज के विभिन्न वर्गों की सहभागिता भी देखने को मिल रही है। सामाजिक-प्रशासनिक समन्वय से संचालित यह पहल जरूरतमंदों तक सहायता पहुँचाने का एक प्रभावी मॉडल बनकर उभर रही है।

मानवीय दृष्टिकोण की मिसाल

इस अभियान ने यह स्पष्ट कर दिया है कि यदि इच्छाशक्ति और संवेदनशीलता हो, तो प्रशासनिक प्रयास जनजीवन में सकारात्मक बदलाव ला सकते हैं। ठंड जैसे मौसम में जब सबसे अधिक असर गरीब और वंचित वर्ग पर पड़ता है, ऐसे समय में इस तरह की पहल न केवल राहत देती है, बल्कि भरोसा भी जगाती है।

स्थानीय नागरिकों ने इस अभियान की सराहना करते हुए कहा कि इससे समाज में एक सकारात्मक संदेश जाता है और दूसरों को भी मदद के लिए आगे आने की प्रेरणा मिलती है।

न्यूज़ देखो: प्रशासन और समाज का सफल समन्वय

“आइये खुशियाँ बाँटें” अभियान यह दिखाता है कि प्रशासनिक नेतृत्व और सामाजिक सहयोग के जरिए किस तरह जरूरतमंदों तक प्रभावी ढंग से सहायता पहुँचाई जा सकती है। गढ़वा में यह पहल ठंड के मौसम में राहत का माध्यम बनी है और आने वाले दिनों में इसके और विस्तार की उम्मीद जताई जा रही है। हर खबर पर रहेगी हमारी नजर।

सेवा से ही बनता है सशक्त समाज

जरूरतमंदों की मदद केवल दायित्व नहीं, बल्कि मानवीय कर्तव्य है। इस खबर को साझा करें, समाज में सहयोग की भावना को आगे बढ़ाएं और बताएं कि आप ऐसे अभियानों के बारे में क्या सोचते हैं।

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Shamsher Ansari

मेराल, गढ़वा

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