
#झारखंडविधानसभा #मजदूरपलायन : बजट चर्चा के दौरान मनोहरपुर विधायक ने प्रवासी मजदूरों की समस्याओं को प्रमुखता से उठाया।
झारखंड विधानसभा में मंगलवार को बजट चर्चा के दौरान मनोहरपुर विधायक जगत मांझी ने राज्य में बढ़ते मजदूर पलायन और रोजगार की समस्या को गंभीर मुद्दा बताया। उन्होंने श्रम नियोजन, प्रशिक्षण एवं कौशल विकास विभाग तथा उद्योग विभाग की मांगों के पक्ष में बोलते हुए सरकार से सख्त कानून बनाने की मांग की। विधायक ने प्रवासी मजदूरों की सुरक्षा और उनके शव को घर लाने का खर्च सरकार द्वारा उठाने का भी प्रस्ताव रखा। इस मुद्दे को उन्होंने राज्य के सामाजिक और आर्थिक भविष्य से जुड़ा बताया।
- मनोहरपुर विधायक जगत मांझी ने झारखंड विधानसभा में उठाया मजदूर पलायन का मुद्दा।
- राज्य में स्थानीय मजदूरों की अनदेखी और बाहर से मजदूर लाने पर जताई चिंता।
- प्रवासी मजदूरों की मृत्यु होने पर शव लाने का खर्च सरकार उठाए – सदन में रखी मांग।
- कंपनियों द्वारा कम खर्च और संगठन से बचने के लिए बाहरी मजदूरों को प्राथमिकता देने का आरोप।
- केंद्र सरकार के हर साल दो करोड़ रोजगार देने के वादे पर भी उठाए सवाल।
झारखंड विधानसभा में बजट सत्र के दौरान मंगलवार को मजदूर पलायन और रोजगार का मुद्दा प्रमुख रूप से उठाया गया। पश्चिम सिंहभूम जिले के मनोहरपुर विधानसभा क्षेत्र के विधायक जगत मांझी ने श्रम नियोजन, प्रशिक्षण एवं कौशल विकास विभाग और उद्योग विभाग की प्रस्तावित मांगों के पक्ष में बोलते हुए राज्य में पलायन की बढ़ती समस्या पर गंभीर चिंता व्यक्त की। उन्होंने कहा कि झारखंड जैसे संसाधन संपन्न राज्य में भी मजदूरों का बड़े पैमाने पर पलायन होना सरकार और व्यवस्था के लिए चिंताजनक संकेत है।
पलायन राज्य के लिए बनता जा रहा गंभीर मुद्दा
विधानसभा में अपने संबोधन के दौरान विधायक जगत मांझी ने कहा कि झारखंड के हजारों मजदूर रोजगार की तलाश में दूसरे राज्यों में जाने को मजबूर हैं। उन्होंने कहा कि यह स्थिति केवल आर्थिक नहीं बल्कि सामाजिक दृष्टि से भी चिंता का विषय है।
जगत मांझी ने कहा: “पलायन झारखंड राज्य के लिए एक गंभीर चिंता का विषय बन चुका है। सरकार को इस पर सख्त नीति और प्रभावी कानून बनाने की आवश्यकता है।”
उन्होंने कहा कि जब तक राज्य में स्थानीय स्तर पर पर्याप्त रोजगार के अवसर नहीं बढ़ाए जाएंगे, तब तक पलायन की समस्या का समाधान संभव नहीं है।
स्थानीय मजदूरों को नहीं मिल रहा काम
सदन में बोलते हुए विधायक जगत मांझी ने एक महत्वपूर्ण मुद्दा उठाया। उन्होंने कहा कि एक ओर झारखंड के मजदूर रोजगार के लिए दूसरे राज्यों में पलायन कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर राज्य के कई निर्माण कार्यों में बाहरी मजदूरों को काम दिया जा रहा है।
जगत मांझी ने कहा: “जब झारखंड में ही मजदूर उपलब्ध हैं, तो फिर बंगाल और बिहार जैसे राज्यों से मजदूर लाकर काम क्यों कराया जा रहा है?”
उन्होंने कहा कि यह स्थिति स्थानीय मजदूरों के लिए अन्यायपूर्ण है और इससे राज्य के श्रमिकों के अधिकार प्रभावित हो रहे हैं।
कंपनियों के बिजनेस मॉडल पर उठाया सवाल
विधायक ने यह भी आरोप लगाया कि कई कंपनियां जानबूझकर बाहरी मजदूरों को प्राथमिकता देती हैं। उनका कहना था कि कंपनियां मजदूरों को संगठित होने से रोकने और कम खर्च में काम कराने के लिए इस तरीके को अपनाती हैं।
जगत मांझी ने कहा: “कई कंपनियां खर्च कम करने और मजदूरों को संगठित होने से रोकने के लिए बाहरी मजदूरों को प्राथमिकता देती हैं। यह एक तरह का बिजनेस मॉडल बन गया है, जिससे स्थानीय मजदूरों को नुकसान हो रहा है।”
उन्होंने सरकार से इस व्यवस्था की समीक्षा करने और स्थानीय मजदूरों को प्राथमिकता देने की नीति बनाने की मांग की।
रोजगार के मुद्दे पर केंद्र सरकार की नीतियों पर सवाल
विधानसभा में बोलते हुए जगत मांझी ने रोजगार के मुद्दे पर केंद्र सरकार की नीतियों पर भी सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि वर्ष 2014 में हर साल दो करोड़ रोजगार देने का वादा किया गया था, लेकिन वास्तविक स्थिति इसके विपरीत दिखाई दे रही है।
उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि रेलवे जैसे बड़े संस्थानों में ग्रुप डी की नौकरियों को भी आउटसोर्सिंग के माध्यम से भरा जा रहा है, जिससे युवाओं के लिए स्थायी रोजगार के अवसर कम हो गए हैं।
जगत मांझी ने कहा: “रेलवे जैसे बड़े संस्थानों में भी ग्रुप डी की नौकरियां आउटसोर्सिंग के जरिए भरी जा रही हैं, जिससे युवाओं को सीधे रोजगार के अवसर कम मिल रहे हैं।”
कोरोना काल का जिक्र करते हुए जताई चिंता
विधायक जगत मांझी ने कोरोना महामारी के दौरान प्रवासी मजदूरों की स्थिति का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि उस समय लाखों मजदूरों को भारी कठिनाइयों का सामना करना पड़ा था।
उन्होंने कहा कि आज भी स्थिति में बहुत अधिक सुधार नहीं हुआ है और मजदूरों को दूसरे राज्यों में बेहद कठिन परिस्थितियों में काम करना पड़ता है।
जगत मांझी ने कहा: “कई जगहों पर मजदूरों को बेहद खराब परिस्थितियों में रहना पड़ता है, जहां एक छोटे कमरे में 40 से 50 लोग रहने को मजबूर होते हैं।”
उन्होंने कहा कि यह स्थिति मजदूरों की गरिमा और उनके मानवाधिकारों के खिलाफ है।
प्रवासी मजदूरों के शव लाने का खर्च सरकार उठाए
विधानसभा में विधायक जगत मांझी ने प्रवासी मजदूरों से जुड़ी एक महत्वपूर्ण मांग भी रखी। उन्होंने कहा कि यदि बाहर काम करने के दौरान किसी मजदूर की मृत्यु हो जाती है, तो उसके पार्थिव शरीर को घर लाने में काफी खर्च आता है।
उन्होंने बताया कि कई बार यह खर्च करीब एक लाख रुपये तक पहुंच जाता है, जिसे गरीब परिवार वहन नहीं कर पाते।
जगत मांझी ने कहा: “यदि बाहर काम करने वाले किसी मजदूर की मृत्यु हो जाती है, तो उसके पार्थिव शरीर को घर लाने का पूरा खर्च सरकार को उठाना चाहिए, ताकि गरीब परिवारों को इस दुख की घड़ी में आर्थिक बोझ न उठाना पड़े।”
उन्होंने सरकार से इस दिशा में एक स्पष्ट नीति बनाने की मांग की, जिससे प्रवासी मजदूरों और उनके परिवारों को सुरक्षा और सम्मान मिल सके।
न्यूज़ देखो: पलायन की सच्चाई और नीति की जरूरत
झारखंड विधानसभा में उठाया गया यह मुद्दा राज्य की एक बड़ी वास्तविकता को सामने लाता है। प्राकृतिक संसाधनों से समृद्ध राज्य होने के बावजूद यदि मजदूरों को रोजगार के लिए दूसरे राज्यों में जाना पड़ रहा है, तो यह नीति और रोजगार व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े करता है। स्थानीय मजदूरों को प्राथमिकता देने और सुरक्षित रोजगार व्यवस्था बनाने की जरूरत स्पष्ट दिखाई देती है। अब देखना होगा कि सरकार इस मुद्दे पर ठोस कदम उठाती है या नहीं।
हर खबर पर रहेगी हमारी नजर।
पलायन रोकना है तो रोजगार देना होगा
जब किसी राज्य का मजदूर अपने घर-परिवार को छोड़कर दूर प्रदेशों में काम करने के लिए मजबूर होता है, तो यह केवल आर्थिक समस्या नहीं बल्कि सामाजिक चुनौती भी बन जाती है। झारखंड जैसे राज्य में यदि स्थानीय स्तर पर पर्याप्त रोजगार के अवसर विकसित किए जाएं, तो पलायन को काफी हद तक रोका जा सकता है।
समाज और सरकार दोनों को मिलकर ऐसी नीतियां बनानी होंगी जो मजदूरों को सम्मानजनक जीवन और सुरक्षित रोजगार प्रदान करें। जागरूक नागरिक के रूप में हमें भी इस मुद्दे पर चर्चा और संवाद को आगे बढ़ाना चाहिए।


