
#गढ़वा #कृषि_विकास : सरसों अनुसंधान निदेशालय के सहयोग से आदिवासी किसानों को मिला उन्नत खेती का प्रशिक्षण।
गढ़वा जिले के रंका प्रखंड अंतर्गत जोलांगा गांव में सरसों अनुसंधान निदेशालय भरतपुर राजस्थान द्वारा संपोषित कार्यक्रम के तहत आदिवासी किसानों के बीच सरसों प्रत्यक्षण एवं प्रक्षेत्र दिवस का आयोजन किया गया। इस कार्यक्रम का उद्देश्य आदिवासी उपविकास योजना के अंतर्गत उन्नत बीज और पोषक तत्व प्रबंधन की जानकारी देना था। कृषि विज्ञान केंद्र गढ़वा के वैज्ञानिकों की मौजूदगी में किसानों को वैज्ञानिक खेती के व्यावहारिक तरीके बताए गए। यह पहल क्षेत्र में सरसों उत्पादन और किसानों की आय बढ़ाने की दिशा में महत्वपूर्ण मानी जा रही है।
- जोलांगा गांव में सरसों प्रत्यक्षण सह प्रक्षेत्र दिवस का आयोजन।
- सरसों अनुसंधान निदेशालय भरतपुर द्वारा संपोषित कार्यक्रम।
- कृषि विज्ञान केंद्र गढ़वा के वरीय वैज्ञानिकों ने दी तकनीकी जानकारी।
- बिरसा भाभा सरसों बीज और पोषक तत्व प्रबंधन पर विशेष फोकस।
- 103 किसानों की सक्रिय भागीदारी से सफल आयोजन।
गढ़वा जिले के रंका प्रखंड अंतर्गत तमगेकलां पंचायत के ग्राम जोलांगा में आज दिनांक 30 जनवरी 2026 को कृषि विकास से जुड़ा एक महत्वपूर्ण कार्यक्रम आयोजित किया गया। सरसों अनुसंधान निदेशालय, भरतपुर (राजस्थान) द्वारा संपोषित इस कार्यक्रम के अंतर्गत आदिवासी किसानों के बीच सरसों का प्रत्यक्षण एवं प्रक्षेत्र दिवस का आयोजन किया गया। कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य किसानों को वैज्ञानिक खेती की पद्धतियों से जोड़ना और सरसों उत्पादन को अधिक लाभकारी बनाना रहा।
इस आयोजन में कृषि विज्ञान केंद्र, गढ़वा की महत्वपूर्ण भूमिका रही। केंद्र के वरीय वैज्ञानिकों ने किसानों को योजना की बारीकियों, उन्नत बीज चयन और पोषक तत्व प्रबंधन के बारे में विस्तार से जानकारी दी।
आदिवासी उपविकास योजना के तहत वैज्ञानिक खेती का प्रयास
कार्यक्रम के दौरान कृषि विज्ञान केंद्र गढ़वा के वरीय वैज्ञानिक महेश चन्द्र जराई ने आदिवासी उपविकास योजना के उद्देश्यों पर प्रकाश डालते हुए बताया कि इस योजना का मकसद आदिवासी किसानों को आधुनिक कृषि तकनीकों से जोड़ना है। उन्होंने बताया कि सरसों की उन्नत खेती से कम लागत में अधिक उत्पादन संभव है।
महेश चन्द्र जराई ने किसानों को बिरसा भाभा सरसों जैसे उत्तम बीज प्रभेद के बारे में जानकारी देते हुए कहा कि सही बीज चयन और संतुलित पोषक तत्व प्रबंधन से फसल की गुणवत्ता और पैदावार दोनों में सुधार होता है।
महेश चन्द्र जराई ने कहा: “यदि किसान वैज्ञानिक सलाह के अनुसार बीज और पोषक तत्वों का प्रयोग करें, तो सरसों की खेती उनके लिए आय का मजबूत स्रोत बन सकती है।”
पोषक तत्व प्रबंधन और सल्फर के उपयोग पर जोर
प्रशिक्षण के दौरान किसानों को यह भी बताया गया कि सरसों की खेती में सूक्ष्म पोषक तत्वों, विशेषकर सल्फर का प्रयोग कितना महत्वपूर्ण है। वैज्ञानिकों ने समझाया कि सल्फर के उचित उपयोग से सरसों की तेल मात्रा और उत्पादन क्षमता में वृद्धि होती है।
किसानों ने प्रत्यक्षण के माध्यम से यह देखा कि उन्नत बीज और वैज्ञानिक पोषण प्रबंधन अपनाने से फसल की स्थिति पारंपरिक खेती की तुलना में बेहतर रही।
जनप्रतिनिधियों ने बढ़ाया किसानों का उत्साह
कार्यक्रम में रंका प्रखंड प्रमुख बिलबती देवी ने किसानों को संबोधित करते हुए कहा कि कृषि क्षेत्र में उन्नत तकनीकों को अपनाकर किसान अपनी आमदनी बढ़ा सकते हैं। उन्होंने किसानों से अपील की कि वे पारंपरिक तरीकों के साथ-साथ वैज्ञानिक विधियों को भी अपनाएं।
प्रगतिशील किसानों की सक्रिय भागीदारी
कार्यक्रम का संचालन कर रहे प्रगतिशील किसान ब्रजकिशोर महतो ने कहा कि अच्छे और उत्तम बीजों का प्रचार-प्रसार अन्य गांवों तक भी किया जाना चाहिए, ताकि अधिक से अधिक किसान इसका लाभ उठा सकें। उन्होंने किसानों को आपसी सहयोग और अनुभव साझा करने पर भी जोर दिया।
बड़ी संख्या में किसानों की उपस्थिति
इस कार्यक्रम में ग्राम स्तर के जनप्रतिनिधियों और किसानों की उल्लेखनीय भागीदारी रही। कार्यक्रम में मुखिया, पंचायत समिति सदस्य, पंचायत समिति के प्रतिनिधियों सहित मूर्ति कुँवर, सोहरिता देवी, तेतरी देवी समेत कुल 103 किसान उपस्थित थे। किसानों ने कार्यक्रम को उपयोगी बताते हुए भविष्य में भी इस तरह के प्रशिक्षण आयोजित करने की मांग की।
सरसों खेती से आत्मनिर्भरता की ओर कदम
जोलांगा गांव में आयोजित यह प्रक्षेत्र दिवस न केवल किसानों के लिए सीखने का अवसर बना, बल्कि इससे यह भी स्पष्ट हुआ कि वैज्ञानिक खेती अपनाकर आदिवासी क्षेत्रों में कृषि को मजबूत किया जा सकता है। उन्नत बीज, संतुलित पोषण और सही तकनीक के माध्यम से सरसों जैसी फसलों से किसानों की आर्थिक स्थिति में सुधार संभव है।

न्यूज़ देखो: आदिवासी खेती के लिए सही दिशा में पहल
जोलांगा में आयोजित यह कार्यक्रम दिखाता है कि यदि अनुसंधान संस्थान, कृषि विज्ञान केंद्र और स्थानीय किसान मिलकर काम करें, तो आदिवासी क्षेत्रों में भी कृषि क्रांति लाई जा सकती है। अब जरूरत है कि ऐसी योजनाओं की निरंतरता बनी रहे और किसानों को बाजार से भी जोड़ा जाए। हर खबर पर रहेगी हमारी नजर।
वैज्ञानिक खेती से मजबूत होगा किसान
खेती केवल परंपरा नहीं, अब विज्ञान का विषय भी है।
उन्नत बीज और सही जानकारी अपनाकर किसान अपनी आय बढ़ा सकते हैं।
यदि आपके गांव में भी ऐसे कार्यक्रम हों, तो सक्रिय भागीदारी निभाएं।
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