Gumla

मकर संक्रांति पर हीरादाह में उमड़ा आस्था और परंपरा का जनसैलाब, पारंपरिक मेले से गूंजा रायडीह क्षेत्र

#गुमला #मकर_संक्रांति : हीरादाह में आयोजित पारंपरिक मेला और सांस्कृतिक कार्यक्रम ने ग्रामीण जीवन की लोकधारा को जीवंत किया।

गुमला जिले के रायडीह प्रखंड अंतर्गत हीरादाह गांव में मकर संक्रांति के अवसर पर पारंपरिक मेले का आयोजन किया गया, जिसमें दिनभर हजारों ग्रामीणों की भागीदारी देखने को मिली। बच्चों, युवाओं और बुजुर्गों ने मेले में लगे झूले, दुकानों और पारंपरिक गतिविधियों का आनंद लिया। रात्रि में आयोजित होने वाले सांस्कृतिक कार्यक्रमों को लेकर भी लोगों में खासा उत्साह रहा। सुरक्षा व्यवस्था के मद्देनज़र पुलिस प्रशासन द्वारा नदी तट पर बैरिकेडिंग सहित आवश्यक इंतजाम किए गए।

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  • हीरादाह, रायडीह प्रखंड में मकर संक्रांति पर पारंपरिक मेले का आयोजन।
  • दिनभर हजारों श्रद्धालुओं और ग्रामीणों की उमड़ी भीड़।
  • रात्रि में लोकगीत, नृत्य और सांस्कृतिक कार्यक्रम का आयोजन।
  • ढोल-नगाड़ों और पारंपरिक गीतों से गूंजा पूरा क्षेत्र।
  • सुरसांग पुलिस द्वारा सुरक्षा व्यवस्था और नदी किनारे बैरिकेडिंग।

गुमला जिले के रायडीह प्रखंड क्षेत्र में स्थित हीरादाह गांव मकर संक्रांति के पावन अवसर पर पूरी तरह उत्सव के रंग में रंगा नजर आया। यहां आयोजित पारंपरिक मेले ने न केवल ग्रामीणों को मनोरंजन का अवसर दिया, बल्कि स्थानीय संस्कृति, परंपरा और सामाजिक एकता को भी मजबूती प्रदान की। सुबह से ही गांव और आसपास के क्षेत्रों से लोगों का आना-जाना शुरू हो गया, जो देर शाम तक लगातार जारी रहा।

बच्चों के लिए जहां रंग-बिरंगे झूले, खिलौनों की दुकानें और मिठाइयों के स्टॉल आकर्षण का केंद्र बने रहे, वहीं युवाओं और बुजुर्गों ने पारंपरिक मेले की रौनक का आनंद लिया। मकर संक्रांति के अवसर पर लगने वाला यह मेला वर्षों पुरानी परंपरा का हिस्सा माना जाता है, जिसमें ग्रामीण जीवन की झलक साफ तौर पर देखने को मिलती है।

मेले में दिखी ग्रामीण जीवन की जीवंत झलक

हीरादाह में आयोजित इस मेले में स्थानीय कारीगरों और दुकानदारों द्वारा पारंपरिक वस्तुएं, घरेलू उपयोग के सामान, पूजा सामग्री और खान-पान की चीजें उपलब्ध कराई गई थीं। ग्रामीणों ने तिलकुट, गुड़, चूड़ा और अन्य पारंपरिक खाद्य पदार्थों की खरीदारी की। बच्चों की खिलखिलाहट और लोगों की चहल-पहल ने पूरे क्षेत्र को जीवंत बना दिया।

मेले में शामिल लोगों का कहना था कि इस तरह के आयोजन ग्रामीण समाज में आपसी मेल-जोल को बढ़ाते हैं और त्योहार की खुशियों को साझा करने का अवसर देते हैं। खासकर मकर संक्रांति जैसे पर्व पर इस तरह के आयोजन सामाजिक समरसता को और मजबूत करते हैं।

रात्रि में सांस्कृतिक कार्यक्रम का भव्य आयोजन

मेले के साथ-साथ रात्रि में आयोजित होने वाले सांस्कृतिक कार्यक्रम को लेकर ग्रामीणों में विशेष उत्साह देखने को मिला। कार्यक्रम में स्थानीय कलाकारों द्वारा लोकगीत, पारंपरिक नृत्य और सांस्कृतिक प्रस्तुतियां दी जाएंगी। ढोल-नगाड़ों की थाप और पारंपरिक गीतों की गूंज से पूरा क्षेत्र पहले से ही उत्सवमय माहौल में डूबा हुआ नजर आया।

स्थानीय कलाकारों को मंच मिलने से क्षेत्रीय लोकसंस्कृति को बढ़ावा मिलता है। ग्रामीणों का मानना है कि ऐसे कार्यक्रम नई पीढ़ी को अपनी परंपराओं से जोड़ने का काम करते हैं और लोककला को जीवित रखते हैं।

सुरक्षा व्यवस्था को लेकर प्रशासन रहा सतर्क

मेले में हजारों लोगों की मौजूदगी को देखते हुए सुरक्षा व्यवस्था को लेकर पुलिस प्रशासन पूरी तरह मुस्तैद नजर आया। सुरसांग पुलिस द्वारा मेला परिसर में निगरानी रखी गई, ताकि किसी भी तरह की अव्यवस्था या दुर्घटना से बचा जा सके। विशेष रूप से नदी के किनारे बैरिकेडिंग की गई थी, जिससे श्रद्धालुओं और बच्चों की सुरक्षा सुनिश्चित हो सके।

पुलिस की मौजूदगी से ग्रामीणों ने भी राहत महसूस की और पूरे कार्यक्रम को शांतिपूर्ण ढंग से संपन्न कराने में सहयोग किया। प्रशासन की ओर से लगातार यह अपील की जाती रही कि लोग सुरक्षा नियमों का पालन करें और किसी भी आपात स्थिति में पुलिस को तुरंत सूचना दें।

परंपरा और भाईचारे का संदेश

मकर संक्रांति के अवसर पर आयोजित यह मेला केवल मनोरंजन तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इसने सामाजिक भाईचारे और सामूहिक सहभागिता का भी संदेश दिया। अलग-अलग गांवों से आए लोग एक-दूसरे से मिले, पर्व की शुभकामनाएं दीं और साथ मिलकर उत्सव का आनंद लिया।

ग्रामीणों का कहना है कि बदलते समय में जब आधुनिकता का प्रभाव बढ़ रहा है, तब ऐसे पारंपरिक मेलों का आयोजन संस्कृति और परंपराओं को जीवित रखने के लिए बेहद जरूरी है। इससे न केवल सामाजिक संबंध मजबूत होते हैं, बल्कि गांवों की पहचान भी बनी रहती है।

न्यूज़ देखो: परंपरा से जुड़ाव की मिसाल बना हीरादाह मेला

हीरादाह में आयोजित मकर संक्रांति का यह पारंपरिक मेला बताता है कि ग्रामीण भारत आज भी अपनी सांस्कृतिक जड़ों से गहराई से जुड़ा हुआ है। प्रशासन की सतर्कता और ग्रामीणों की सहभागिता ने आयोजन को सफल बनाया। ऐसे आयोजन सामाजिक एकता और सांस्कृतिक संरक्षण की दिशा में अहम भूमिका निभाते हैं। हर खबर पर रहेगी हमारी नजर।

संस्कृति से जुड़ें, परंपरा को आगे बढ़ाएं

पर्व और मेले हमारी सामाजिक विरासत का आधार हैं।
इनसे जुड़कर हम अपनी पहचान को मजबूत करते हैं।
स्थानीय संस्कृति और लोककलाओं को समर्थन देना हम सभी की जिम्मेदारी है।
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MD. Waris

रायडीह, गुमला

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