
#पलामू #इस्लामी_शिक्षा : मरकज़ी दारुल उलूम के हेड मुअल्लिम का लंबी बीमारी के बाद निधन।
करी जसीमुद्दीन शमीमी, पलामू के चर्चित इस्लामी विद्वान और मरकज़ी दारुल उलूम के हेड मुअल्लिम, 15 दिनों तक रांची के रिम्स में इलाज के बाद शुक्रवार शाम निधन हो गए। उनके निधन की खबर से शाहपुर व आसपास के क्षेत्रों में शोक की लहर दौड़ गई। उनके अंतिम दर्शन और जनाजा में बड़ी संख्या में लोग और प्रशासनिक प्रतिनिधि शामिल हुए। शमीमी जी ने तीन दशकों तक बच्चों को उर्दू और इस्लामी तालीम दी और समाज सुधार में भी सक्रिय योगदान दिया।
- कारी जसीमुद्दीन शमीमी का निधन 6 जनवरी 2026 को शाम 7:45 बजे रांची के रिम्स में हुआ।
- वे पिछले करीब 15 दिनों से इलाजरत थे और लंबी बीमारी से जूझ रहे थे।
- शमीमी जी ने लगभग 30 वर्षों तक तैबा नगर, शाहपुर में बच्चों को उर्दू और इस्लामी शिक्षा दी।
- उनके अंतिम दर्शन और नमाज-ए-जनाजा में सुरेन्द्र सिंह, गोपाल त्रिपाठी सहित बड़ी संख्या में लोग शामिल हुए।
- उनके पीछे चार पुत्र और तीन पुत्रियां का परिवार छोड़ा गया है।
- शोक सभा में मदरसा गौसिया में कुरानखानी और मिलाद शरीफ का आयोजन किया गया।
पलामू के तैबा नगर शाहपुर में मरकज़ी दारुल उलूम के हेड मुअल्लिम कारी जसीमुद्दीन शमीमी का निधन क्षेत्रीय शिक्षा और समाज सेवा के लिए एक अपूरणीय क्षति के रूप में देखा जा रहा है। उनके निधन की खबर मिलते ही स्थानीय लोगों, छात्र-शिक्षकों और समाज सुधारकों में शोक की लहर दौड़ गई।
जीवन और शिक्षा में योगदान
कारी जसीमुद्दीन शमीमी मूल रूप से गढ़वा थाना क्षेत्र के टेढ़ी हरिया गांव के निवासी थे। बीते तीन दशकों से उन्होंने शाहपुर के तैबा नगर में रहकर बच्चों को उर्दू और इस्लामी तालीम दी। उनकी शिक्षा प्रणाली में न केवल धार्मिक ज्ञान बल्कि सामाजिक मूल्यों और सुधार का पाठ भी शामिल था।
मुफ्ती मुजीबुल्लाह ने कहा: “कारी शमीमी का जीवन एकता, भाईचारे और सुधार के लिए समर्पित था। वे गरीब और निर्धन मुस्लिम बच्चों की निःशुल्क शिक्षा के लिए सदैव तत्पर रहते थे। उनका जाना शिक्षा जगत और समाज के लिए अपूरणीय क्षति है।”
वे केवल शिक्षक नहीं, बल्कि समाज सुधारक के रूप में भी मान्यता प्राप्त थे। उन्होंने समुदाय में सद्भावना, एकता और सामाजिक चेतना को बढ़ावा देने में विशेष योगदान दिया।
स्वास्थ्य और अंतिम दिनों का विवरण
करी जसीमुद्दीन शमीमी 25 नवंबर 2025 को मक्का और मदीना की पवित्र यात्रा पर गए थे और 15 दिसंबर 2025 को लौटे। इसके बाद उनकी तबीयत बिगड़ गई और उन्हें रांची के रिम्स में भर्ती कराया गया। इलाज के बावजूद उनकी स्थिति नाजुक बनी रही और 6 जनवरी 2026 को शाम 7:45 बजे उनका इंतकाल हो गया।
अंतिम संस्कार और श्रद्धांजलि
उनके पार्थिव शरीर का अंतिम दर्शन तैबा नगर, शाहपुर में बड़ी संख्या में लोग करने पहुंचे। इसमें मेदिनीनगर के पूर्व चेयरमैन सुरेन्द्र सिंह और झारखंड सरकार के पूर्व मंत्री के प्रतिनिधि गोपाल त्रिपाठी भी शामिल हुए।
करी जसीमुद्दीन शमीमी के सम्मान में मदरसा गौसिया में कुरानखानी और मिलाद शरीफ का आयोजन किया गया।
शनिवार को नमाज असर के बाद शाहपुर मजार में जनाजा अदा किया गया और उसके पश्चात उन्हें कब्रिस्तान में सुपुर्द-ए-खाक किया गया। समाज के विभिन्न वर्गों ने उनके परिवार के प्रति संवेदना व्यक्त करते हुए अल्लाह से मगफिरत की दुआ की।
न्यूज़ देखो: शिक्षा और समाज सेवा के अग्रणी कारी जसीमुद्दीन शमीमी का योगदान
करी जसीमुद्दीन शमीमी का निधन न केवल इस्लामी शिक्षा जगत बल्कि समाज सेवा के क्षेत्र में एक बड़ा नुकसान है। उनकी शिक्षा और समाज सुधार के कार्यों ने बच्चों और गरीब वर्ग के लिए अनमोल योगदान दिया। यह घटना यह दिखाती है कि क्षेत्रीय शिक्षकों और समाजसेवकों की भूमिका कितनी महत्वपूर्ण है। अब सवाल यह उठता है कि उनके द्वारा शुरू किए गए शैक्षणिक और सामाजिक कार्यों को कौन आगे बढ़ाएगा। हर खबर पर रहेगी हमारी नजर।
प्रेरक समापन और कार्रवाई की अपील
करी जसीमुद्दीन शमीमी का जीवन यह सिखाता है कि शिक्षा और सेवा सबसे बड़ा धर्म है। उनके आदर्शों को अपनाकर समाज में भाईचारा, समर्पण और निःस्वार्थ सेवा की भावना को फैलाना आवश्यक है। आज हम उनके योगदान को याद करते हुए यह तय करें कि बच्चों की शिक्षा और समाज सुधार के क्षेत्र में सक्रिय योगदान देंगे। अपने क्षेत्र के शिक्षकों और समाजसेवकों का सम्मान करें, उनके कार्यों को आगे बढ़ाएं और अपने विचार कमेंट में साझा करें। खबर को दोस्तों तक पहुंचाएं और समाज में सकारात्मक बदलाव की दिशा में कदम बढ़ाएं।





