
#गढ़वा #सरहुल_पर्व : नगदरवा गांव में परंपरा और उत्साह के साथ मनाया गया प्रकृति महापर्व।
गढ़वा जिले में सरहुल पर्व पारंपरिक श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाया गया, जिसमें पूर्व मंत्री मिथिलेश कुमार ठाकुर नगदरवा गांव पहुंचे। उन्होंने आदिवासी परिवारों के साथ मांदर बजाकर पर्व की खुशियां साझा की और प्रकृति के प्रति आभार व्यक्त करने का संदेश दिया। इस अवसर पर उन्होंने सरहुल के सांस्कृतिक और वैज्ञानिक महत्व को भी रेखांकित किया।
- गढ़वा के नगदरवा गांव में धूमधाम से मनाया गया सरहुल पर्व।
- पूर्व मंत्री मिथिलेश कुमार ठाकुर ने मांदर बजाकर मनाया उत्सव।
- आदिवासी समुदाय के साथ पारंपरिक नृत्य और संगीत का आयोजन।
- सरहुल को बताया प्रकृति और जीवन के संतुलन का प्रतीक।
- लोगों को दी सुख, शांति और समृद्धि की शुभकामनाएं।
गढ़वा, प्रतिनिधि।
प्रकृति का महापर्व सरहुल गढ़वा जिले में पारंपरिक श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाया गया। इस अवसर पर झारखंड सरकार के पूर्व मंत्री एवं झामुमो के केंद्रीय महासचिव मिथिलेश कुमार ठाकुर नगदरवा गांव पहुंचे, जहां उन्होंने आदिवासी परिवारों के साथ मिलकर इस पर्व को उत्साहपूर्वक मनाया।
पूर्व मंत्री ने मांदर बजाकर लोगों के साथ नृत्य किया और सरहुल की खुशियां साझा कीं। इस दौरान पूरे गांव में उत्सव का माहौल देखने को मिला और लोग पारंपरिक वेशभूषा में नृत्य-संगीत का आनंद लेते नजर आए।
मांदर की थाप पर झूमे लोग
कार्यक्रम के दौरान मिथिलेश कुमार ठाकुर ने मांदर बजाकर लोगों के साथ नृत्य किया, जिससे माहौल और भी जीवंत हो गया। उनकी सहभागिता से स्थानीय लोगों में खासा उत्साह देखने को मिला।
मिथिलेश कुमार ठाकुर ने कहा:
“सरहुल का पर्व प्रकृति और जीवन के बीच सामंजस्य का प्रतीक है, जो हमें प्रकृति के प्रति आभार व्यक्त करना सिखाता है।”
उन्होंने सभी लोगों को सरहुल की बधाई देते हुए उनके जीवन में सुख, शांति, समृद्धि और नई ऊर्जा के संचार की कामना की।
सरहुल पर्व का सांस्कृतिक महत्व
मिथिलेश ठाकुर ने सरहुल के महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि यह आदिवासी समुदाय का प्रमुख प्रकृति पर्व है, जो वसंत ऋतु में चैत्र माह के शुक्ल पक्ष की तृतीया को मनाया जाता है।
उन्होंने बताया कि इस पर्व में साल वृक्ष की पूजा की जाती है और इसे प्रकृति के प्रति आभार व्यक्त करने के रूप में मनाया जाता है। सरहुल नई फसल के स्वागत और नए वर्ष की शुरुआत का प्रतीक भी है।
परंपरा और आस्था का संगम
सरहुल पर्व के दौरान सखुआ (साल) के पेड़ को विशेष महत्व दिया जाता है। आदिवासी संस्कृति में इसे पवित्र माना जाता है और इसमें सरना मां का वास माना जाता है।
इस दिन साल के नए फूल (सारजोम बाहा) की पूजा की जाती है। पूजा के बाद पाहन (पुजारी) मिट्टी के बर्तनों में जल भरकर रखते हैं, जिससे आने वाली बारिश और फसल का अनुमान लगाया जाता है।
नृत्य, संगीत और पारंपरिक व्यंजन का उत्सव
सरहुल के अवसर पर पारंपरिक नृत्य, संगीत और शोभायात्रा का आयोजन किया जाता है। लोग गुड़ पिठ्ठा जैसे पारंपरिक व्यंजनों का आनंद लेते हैं और सामूहिक रूप से खुशियां साझा करते हैं।
यह पर्व केवल धार्मिक नहीं बल्कि सामाजिक एकता और सांस्कृतिक पहचान का भी प्रतीक है, जहां पूरा समुदाय एक साथ मिलकर उत्सव मनाता है।
प्रकृति के साथ संतुलन का संदेश
पूर्व मंत्री ने कहा कि सरहुल पर्व वैज्ञानिक दृष्टिकोण से भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह प्रकृति के साथ संतुलन बनाए रखने का संदेश देता है। आदिवासी समाज प्रकृति को अपना जीवन आधार मानकर उसका सम्मान करता है।
उन्होंने कहा कि इस परंपरा को आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाना जरूरी है, ताकि हमारी सांस्कृतिक विरासत सुरक्षित रह सके।
न्यूज़ देखो: परंपरा से जुड़ाव ही हमारी पहचान
गढ़वा में मनाया गया सरहुल पर्व यह दिखाता है कि आज भी समाज अपनी जड़ों और परंपराओं से गहराई से जुड़ा हुआ है। ऐसे आयोजन न केवल संस्कृति को जीवित रखते हैं, बल्कि समाज को एकजुट भी करते हैं।
पूर्व मंत्री मिथिलेश ठाकुर की भागीदारी से यह संदेश भी गया कि जनप्रतिनिधियों को भी स्थानीय संस्कृति और परंपराओं से जुड़कर समाज के साथ खड़ा रहना चाहिए। हर खबर पर रहेगी हमारी नजर।
प्रकृति का सम्मान करें, संस्कृति को अपनाएं
सरहुल हमें सिखाता है कि प्रकृति के बिना जीवन संभव नहीं है। हमें अपनी परंपराओं और प्रकृति दोनों का सम्मान करना चाहिए।
आइए, हम सभी इस पर्व के संदेश को अपने जीवन में अपनाएं और पर्यावरण संरक्षण के लिए आगे आएं।
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