
#खलारी #सरहुल_पर्व : सरना समिति की बैठक में निर्णय — कमाती धौड़ा सरना स्थल से केडी बाजार होते चढ़रा धौड़ा तक निकलेगी शोभायात्रा।
रांची जिले के खलारी क्षेत्र में सरहुल महापर्व के आयोजन को लेकर सरना समिति की बैठक आयोजित की गई। बैठक में 21 मार्च को पारंपरिक पूजा और भव्य शोभायात्रा निकालने का निर्णय लिया गया। पूजा सुबह 8:30 बजे कमाती धौड़ा सरना स्थल में संपन्न होगी। आयोजन को सफल बनाने के लिए विभिन्न पदाधिकारियों और जनप्रतिनिधियों को शामिल करते हुए एक समिति का गठन भी किया गया।
- सरना समिति खलारी की बैठक में 21 मार्च को सरहुल महापर्व मनाने का निर्णय।
- कमाती धौड़ा सरना स्थल अखड़ा से शोभायात्रा की शुरुआत होगी।
- शोभायात्रा खलारी थाना, ओवरब्रिज, केडी बाजार होते हुए चढ़रा धौड़ा तक जाएगी।
- आयोजन की सफलता के लिए कई जनप्रतिनिधियों को शामिल कर समिति का गठन।
- स्थानीय लोगों से पूजा और शोभायात्रा में बढ़-चढ़कर भाग लेने की अपील।
रांची जिले के खलारी क्षेत्र में आदिवासी समाज के प्रमुख पर्व सरहुल को लेकर तैयारियां शुरू हो गई हैं। इसी क्रम में बुधवार को सरना समिति खलारी की एक महत्वपूर्ण बैठक आयोजित की गई, जिसमें इस वर्ष सरहुल महापर्व को पारंपरिक रीति-रिवाज और उत्साह के साथ मनाने का निर्णय लिया गया।
बैठक की अध्यक्षता रंथू उरांव ने की। बैठक में उपस्थित सदस्यों ने सर्वसम्मति से तय किया कि हर वर्ष की तरह इस वर्ष भी सरहुल पर्व के अवसर पर भव्य शोभायात्रा निकाली जाएगी।
21 मार्च को होगी सरहुल पूजा
बैठक में यह भी निर्णय लिया गया कि 21 मार्च (शनिवार) को सुबह 8:30 बजे सरहुल पूजा का आयोजन किया जाएगा। पूजा का आयोजन कमाती धौड़ा स्थित सरना स्थल अखड़ा में पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ किया जाएगा।
सरहुल पर्व आदिवासी समाज का अत्यंत महत्वपूर्ण त्योहार माना जाता है, जिसमें प्रकृति, विशेष रूप से साल वृक्ष की पूजा की जाती है। इस अवसर पर समाज के लोग पारंपरिक वेशभूषा में एकत्र होकर प्रकृति के प्रति आभार व्यक्त करते हैं।
इस मार्ग से निकलेगी शोभायात्रा
सरना समिति की बैठक में शोभायात्रा के मार्ग को भी तय किया गया। निर्णय के अनुसार शोभायात्रा कमाती धौड़ा सरना स्थल अखड़ा से शुरू होगी।
इसके बाद यह शोभायात्रा खलारी थाना, ओवरब्रिज, केडी बाजार होते हुए चढ़रा धौड़ा पहुंचकर संपन्न होगी। इस दौरान बड़ी संख्या में लोग पारंपरिक नृत्य, गीत और सांस्कृतिक झांकी के साथ शामिल होंगे।
आयोजकों का कहना है कि शोभायात्रा के दौरान आदिवासी संस्कृति और परंपराओं की झलक देखने को मिलेगी।
आयोजन के लिए समिति का गठन
सरहुल महापर्व के सफल आयोजन के लिए बैठक में एक विस्तृत समिति का गठन भी किया गया। समिति में कई जनप्रतिनिधियों और समाज के प्रमुख लोगों को जिम्मेदारी सौंपी गई।
समिति के संरक्षक के रूप में श्रीमती सोनी तिग्गा (प्रमुख, खलारी), तेजी किस्पोटा (मुखिया), पारसनाथ उरांव (मुखिया), सुनीता देवी (मुखिया), दीपमाला कुमारी (मुखिया), पुतुल देवी (मुखिया), शीला कुमारी (मुखिया), शिवरथ मुंडा (मुखिया), शांति देवी (मुखिया), सेवा उरांव (मुखिया), शिवनाथ मुंडा (मुखिया), संतोष महली (मुखिया), पुष्पा खलको (मुखिया), मालका मुंडा (मुखिया), ललिता देवी (मुखिया), बहुरा मुंडा, रामलखन गंझू, देवपाल मुंडा, अमृत भोगता, किरण तुर्की, कुलदीप लोहरा और बिनोद मुंडा को शामिल किया गया।
वहीं उपाध्यक्ष के रूप में निमा एक्का, पंकज मुंडा, वीरेंद्र मुंडा, योगेंद्र मुंडा, विजय मुंडा, सुकरा उरांव और छोटन भोक्ता को जिम्मेदारी दी गई।
इसके अलावा सहसचिव के रूप में किशुन मुंडा और राहुल गंझू को मनोनीत किया गया।
पारंपरिक रीति-रिवाज के साथ मनाया जाएगा पर्व
बैठक में उपस्थित सभी लोगों ने यह संकल्प लिया कि इस वर्ष भी सरहुल पर्व को पारंपरिक रीति-रिवाजों और सांस्कृतिक गरिमा के साथ मनाया जाएगा।
आयोजकों ने कहा कि सरहुल केवल एक त्योहार नहीं, बल्कि आदिवासी समाज की संस्कृति, प्रकृति प्रेम और सामुदायिक एकता का प्रतीक है।
इस अवसर पर लोगों से अपील की गई कि वे बड़ी संख्या में शोभायात्रा और पूजा कार्यक्रम में शामिल होकर इस पर्व को सफल बनाएं।
न्यूज़ देखो: प्रकृति और संस्कृति का अनूठा पर्व
सरहुल केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि प्रकृति के प्रति आदिवासी समाज की गहरी आस्था और सम्मान का प्रतीक है। ऐसे पर्व समाज को अपनी जड़ों और परंपराओं से जोड़ने का काम करते हैं। खलारी में सरहुल महापर्व को लेकर जिस तरह से सामूहिक तैयारी की जा रही है, वह सामाजिक एकता और सांस्कृतिक पहचान को मजबूत करने का उदाहरण भी है। हर खबर पर रहेगी हमारी नजर।
परंपरा से जुड़कर ही मजबूत होती है पहचान
हर समाज की असली ताकत उसकी संस्कृति और परंपराओं में छिपी होती है। जब लोग मिलकर अपने त्योहारों और सांस्कृतिक आयोजनों को मनाते हैं, तो इससे सामाजिक एकता और भाईचारा मजबूत होता है।
सरहुल जैसे पर्व हमें प्रकृति के प्रति सम्मान और सामूहिक जीवन के महत्व का संदेश देते हैं। ऐसे अवसर हमें अपनी संस्कृति को नई पीढ़ी तक पहुंचाने का भी मौका देते हैं।
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