
#गिरिडीह #मधुबन #आम_सभा : हटिया मैदान से बाजार तक मार्च, नेताओं ने रखी अपनी बात।
मधुबन हटिया मैदान में असंगठित मजदूर मोर्चा, ट्रेड यूनियन और भाकपा माले के बैनर तले आम सभा का आयोजन किया गया। हटिया मैदान से मधुबन बाजार तक प्रतिवाद मार्च निकालते हुए केंद्र सरकार की श्रम और ग्रामीण रोजगार नीतियों के खिलाफ नारेबाजी की गई। कार्यक्रम में पूरन महतो, अजीत राय, राजेश सिन्हा और कन्हाई पांडेय समेत कई नेता शामिल हुए। जाम के दौरान एंबुलेंस सहित इमरजेंसी सेवाओं को विशेष छूट दी गई।
- मधुबन हटिया मैदान में आम सभा आयोजित।
- हटिया मैदान से मधुबन बाजार तक प्रतिवाद मार्च।
- पूरन महतो, अजीत राय, राजेश सिन्हा, कन्हाई पांडेय ने की अगुवाई।
- चार लेबर कोड और मनरेगा मुद्दे पर नारेबाजी।
- सैकड़ों ग्रामीणों, मजदूरों और महिला प्रतिभागियों की उपस्थिति।
मधुबन में अखिल भारतीय आम हड़ताल के समर्थन में असंगठित मजदूर मोर्चा, ट्रेड यूनियन और भाकपा माले के संयुक्त तत्वावधान में आम सभा और प्रतिवाद मार्च का आयोजन किया गया। कार्यक्रम की शुरुआत हटिया मैदान से हुई, जहां से मार्च मधुबन बाजार होते हुए पुनः हटिया मैदान पहुंचा और सभा में तब्दील हुआ। प्रदर्शन के दौरान सड़क पर जाम की स्थिति बनी, हालांकि एंबुलेंस और अन्य इमरजेंसी सेवाओं को साइड से निकाला जाता रहा।
हटिया मैदान से बाजार तक गूंजे नारे
आयोजकों ने हटिया मैदान से मधुबन बाजार तक मार्च निकालते हुए “चार लेबर कोड वापस लो”, “मनरेगा खत्म करने की साजिश बंद करो” और “मजदूरों के अधिकारों पर हमला नहीं चलेगा” जैसे नारे लगाए। प्रदर्शनकारियों का कहना था कि श्रम कानूनों में बदलाव से मजदूरों की सुरक्षा और अधिकार प्रभावित होंगे।
सभा में किसान, मजदूर, महिलाएं, छात्र और युवा बड़ी संख्या में मौजूद रहे। ट्रेड यूनियनों ने अखिल भारतीय आम हड़ताल को समर्थन देते हुए इसे व्यापक जनभागीदारी वाला आंदोलन बताया।
नेताओं के संबोधन
कार्यक्रम में पहुंचे माले नेता पूरन महतो, राजेश सिन्हा और कन्हाई पांडेय ने सभा को संबोधित किया।
राजेश सिन्हा ने कहा: “सरकार की नीतियों के खिलाफ गरीब, मजदूर, किसान, छात्र, महिला, दलित, आदिवासी और अल्पसंख्यक समाज को एकजुट होकर आंदोलन करना होगा।”
अखिल भारतीय किसान महासभा के नेता पूरन महतो ने कहा:
“आम हड़ताल को व्यापक समर्थन मिला है। किसानों और मजदूरों के मुद्दों पर गंभीर चर्चा और बदलाव की जरूरत है।”
माले नेता हराधन तुरी, द्वारिका राय और बसंती देवी ने भी श्रम और कृषि नीतियों को लेकर आपत्ति जताई।
हराधन तुरी ने कहा: “चार लेबर कोड मजदूर वर्ग के अधिकारों को कमजोर करते हैं और ठेका व्यवस्था को बढ़ावा देते हैं।”
नेता अजीत राय, ठाकुर सिंह और सोहन महतो ने कहा कि वे नीतिगत बदलाव की मांग को लेकर आंदोलन जारी रखेंगे।
मनरेगा और वीबीग्रामजी योजना पर उठे सवाल
सभा में अजीत राय, द्वारिका राय, सोहन महतो, जोगेश्वर महतो, परसुराम महतो, बसंत कर्मकार समेत अन्य नेताओं ने मनरेगा और वीबीग्रामजी योजना को लेकर चिंता जताई। उनका कहना था कि मनरेगा ग्रामीण गरीबों के लिए महत्वपूर्ण योजना है और इसमें किसी भी प्रकार का बदलाव गांवों की आजीविका पर असर डाल सकता है।
नेताओं ने आरोप लगाया कि चार लेबर कोड और नई योजनाएं मजदूरों के संगठन, एकजुटता और संघर्ष के अधिकार को कमजोर करती हैं।
इमरजेंसी सेवाओं को दी गई छूट
प्रदर्शन के दौरान कुछ समय के लिए जाम की स्थिति बनी रही, लेकिन आयोजकों ने एंबुलेंस और अन्य आपातकालीन सेवाओं को विशेष छूट देते हुए रास्ता दिया। इससे आवश्यक सेवाओं पर कोई गंभीर असर नहीं पड़ा।
बड़ी संख्या में लोगों की भागीदारी
चक्का जाम और सभा को सफल बनाने में झारखंड मजदूर किसान सभा सहित सैकड़ों ग्रामीण मजदूर और किसान शामिल हुए।
मौजूद लोगों में द्वारिका राय, मनोज महतो, जागेश्वर महतो, चिरंजीवी लाल महतो, वसंत कर्मकार, उदेश्वर सिंह, ठाकुर सिंह, सोहन महतो, धर्मी देवी, कलावती देवी, खेमलाल महतो, उगन महतो, गांदोरी सिंह, कामदेव सिंह, मदन मंडल, लीलो कर्मकार, हराधन तुरी, निलेश सिंह, अशोक भुइया, जितेंद्र महतो, शंकर तुरी, कोकिल महतो, ठेकलाल सिंह, नागेश्वर महतो सहित अनेक ग्रामीण शामिल रहे।
न्यूज़ देखो: सड़क से सभा तक पहुंची आवाज
मधुबन में आयोजित आम सभा और प्रतिवाद मार्च यह संकेत देता है कि श्रम और ग्रामीण रोजगार से जुड़े मुद्दों पर स्थानीय स्तर पर असंतोष मौजूद है। लोकतंत्र में जनसभा और शांतिपूर्ण विरोध अभिव्यक्ति का माध्यम है, लेकिन समाधान के लिए संवाद भी उतना ही जरूरी है। इमरजेंसी सेवाओं को छूट देना संतुलन का संकेत है। अब यह देखना होगा कि इन मांगों पर नीति स्तर पर कोई पहल होती है या नहीं।
हर खबर पर रहेगी हमारी नजर।
लोकतांत्रिक भागीदारी से ही मजबूत होगा समाज
जनसभा और प्रतिवाद लोकतंत्र की बुनियादी प्रक्रिया का हिस्सा हैं। जब नागरिक अपने मुद्दों को लेकर एकजुट होते हैं, तो वह लोकतांत्रिक जागरूकता का संकेत होता है।
साथ ही यह जरूरी है कि हर पक्ष संवाद और समाधान की दिशा में आगे बढ़े।
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