
#केरसई #आदिवासी_संस्कृति : बाघडेगा पंचायत के कोनसकेली गांव में गोंड समाज ने पुष पुनी परब श्रद्धा, परंपरा और सामाजिक एकता के साथ मनाया।
सिमडेगा जिले के केरसई प्रखंड अंतर्गत बाघडेगा पंचायत के कोनसकेली गांव में गोंड आदिवासी समाज द्वारा पुष पुनी पर्व पारंपरिक श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाया गया। इस अवसर पर छः कुली पूजा के तहत सगा बंधुओं की उपस्थिति में सप्तरंगी झंडा की विधिवत पूजा-अर्चना की गई। पूजा के बाद गांव के प्रत्येक घर और आंगन में सप्तरंगी झंडा फहराया गया, जिससे पूरा गांव उत्सवमय वातावरण में डूब गया। आयोजन ने गोंड समाज की सांस्कृतिक चेतना, एकता और परंपरागत विरासत को सशक्त रूप से उजागर किया।
- कोनसकेली गांव में गोंड समाज द्वारा पारंपरिक पुष पुनी पर्व का आयोजन।
- छः कुली पूजा के साथ सप्तरंगी झंडा की विधिवत पूजा-अर्चना।
- गोटूल केंद्र की बच्चियों द्वारा पारंपरिक स्वागत से कार्यक्रम की शुरुआत।
- श्याम किशोर प्रधान ने गोंड समाज के गढ़-किला के ऐतिहासिक महत्व पर डाला प्रकाश।
- रामचंद्र मांझी ने पुष पुनी परब को गोंड समाज की पहचान बताया।
केरसई प्रखंड के बाघडेगा पंचायत अंतर्गत कोनसकेली गांव में आयोजित पुष पुनी परब इस वर्ष विशेष उत्साह और सामूहिक सहभागिता के साथ मनाया गया। गांव के हर वर्ग की भागीदारी ने इस आयोजन को केवल एक पर्व नहीं, बल्कि सामाजिक एकता और सांस्कृतिक चेतना का जीवंत उदाहरण बना दिया। सुबह से ही गांव में पारंपरिक तैयारियों का माहौल देखने को मिला और हर आंगन में सप्तरंगी झंडा लहराता नजर आया।
पारंपरिक स्वागत और गोटूल केंद्र की भूमिका
कार्यक्रम की शुरुआत गोटूल केंद्र की बच्चियों द्वारा पारंपरिक स्वागत से हुई। आगंतुकों का स्वागत हल्दी पानी से पैर धोकर, हल्दी-चावल का चंदन लगाकर किया गया। इस अवसर पर मातृशक्ति, पितृशक्ति और गोटूल केंद्र के बच्चों को सम्मानपूर्वक आमंत्रित किया गया। यह दृश्य गोंड समाज की उस परंपरा को दर्शाता है, जहां नई पीढ़ी को सांस्कृतिक गतिविधियों में सक्रिय भूमिका दी जाती है।
कार्यक्रम का मंच संचालन भी गोटूल केंद्र के बच्चों द्वारा किया गया, जिसने यह संदेश दिया कि गोंड समाज अपनी सांस्कृतिक विरासत को भावी पीढ़ी तक सहेजने के लिए सजग और सक्रिय है।
छः कुली पूजा और सप्तरंगी झंडा का महत्व
इसके पश्चात गांव के छः कुल के बंधुओं द्वारा विधिवत पूजा-अर्चना संपन्न कराई गई। पूजा के मुख्य केंद्र में सप्तरंगी झंडा रहा, जिसे गोंड समाज की पहचान और एकता का प्रतीक माना जाता है। पूजा उपरांत सगा बंधुओं द्वारा गांव के हर घर और हर आंगन में सप्तरंगी झंडा फहराया गया, जिससे पूरा गांव रंग-बिरंगे उत्सव में बदल गया।
गोंड समाज के इतिहास पर प्रकाश
इस अवसर पर झारखंड प्रदेश गोंड आदिवासी महासभा के उपाध्यक्ष श्याम किशोर प्रधान ने गोंड समाज के ऐतिहासिक गढ़ और किलों के महत्व पर विस्तार से जानकारी दी।
श्याम किशोर प्रधान ने कहा: “गोंड समाज का अपना गौरवशाली गढ़ और किला रहा है। इसे जानना और समझना आज की पीढ़ी के लिए अत्यंत आवश्यक है। यह ज्ञान आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाना हम सभी की जिम्मेदारी है।”
उनके वक्तव्य ने युवाओं को अपने इतिहास और पहचान के प्रति जागरूक होने का संदेश दिया।
पुष पुनी परब गोंड समाज की पहचान
गोंडवाना आदिवासी कल्याण एवं विकास मंच के अध्यक्ष रामचंद्र मांझी ने कहा:
रामचंद्र मांझी ने कहा: “पुष पुनी परब गोंड समाज की पहचान है। इसे हर घर और हर गांव में उत्साहपूर्वक मनाना चाहिए, ताकि हमारी संस्कृति और परंपराएं जीवित रह सकें।”
उन्होंने मातृशक्ति, पितृशक्ति और बच्चों से सामाजिक और सांस्कृतिक मूल्यों को आगे बढ़ाने का आह्वान किया।
सप्तरंगी झंडा और बड़ा देव का प्रतीकात्मक अर्थ
वहीं रविंद्र मांझी ने सप्तरंगी झंडा के महत्व पर प्रकाश डालते हुए बताया कि यह झंडा सात कुलों का प्रतीक है। इसके विभिन्न रंग जीवन, प्रकृति और मानवीय मूल्यों का प्रतिनिधित्व करते हैं। उन्होंने बड़ा देव के लोगो के महत्व की जानकारी भी साझा की और इसे समझने की आवश्यकता पर बल दिया।
सांस्कृतिक प्रस्तुतियों ने बांधा समां
इसके बाद गांव की मातृशक्तियों द्वारा पारंपरिक गीत-नृत्य की प्रस्तुति दी गई। इन सांस्कृतिक कार्यक्रमों ने गोंड संस्कृति की जीवंत झलक प्रस्तुत की और उपस्थित लोगों का मन मोह लिया। ढोल, मांदर और पारंपरिक गीतों के साथ पूरा गांव उत्सव के रंग में रंगा नजर आया।
समापन और वार्षिक संकल्प
कार्यक्रम का समापन भूतपूर्व मुखिया राजेश्वर प्रधान द्वारा धन्यवाद ज्ञापन के साथ किया गया।
राजेश्वर प्रधान ने कहा: “हम सभी मिलकर पुष पुनी परब को हर वर्ष पूरे उत्साह के साथ मनाने का संकल्प लेते हैं।”
कार्यक्रम का समापन जय से जय गोंडवाना के नारे के साथ हुआ।
आयोजन को सफल बनाने वाले लोग
इस आयोजन को सफल बनाने में शिक्षक प्रदुमन प्रधान, जयराम प्रधान, शंभू मांझी, अर्जुन मांझी, बासुदेव मांझी, हरीश प्रधान, कृष्णा मांझी, जयनाथ प्रधान, संजय मांझी, लीलावती प्रधान, सुनीता देवी, रितामणि प्रधान, सुनीता प्रधान, पार्वती देवी, गीता देवी, सनमैत देवी, फुलमनी देवी, वीरेंद्र मांझी, सीताराम मांझी, संजय बेसरा, अशोक प्रधान, दर्शन प्रधान सहित बड़ी संख्या में ग्रामीण, महिलाएं और बच्चे उपस्थित रहे।
न्यूज़ देखो: परंपरा और एकता से सशक्त होता समाज
कोनसकेली गांव का यह आयोजन बताता है कि आदिवासी समाज आज भी अपनी जड़ों से मजबूती से जुड़ा हुआ है। पुष पुनी जैसे पर्व सामाजिक एकता, सांस्कृतिक चेतना और सामूहिक जिम्मेदारी को मजबूत करते हैं। नई पीढ़ी की भागीदारी यह संकेत देती है कि परंपराएं सुरक्षित हाथों में हैं। ऐसे आयोजन सांस्कृतिक संरक्षण के साथ सामाजिक संवाद का भी सशक्त माध्यम बनते हैं। हर खबर पर रहेगी हमारी नजर।
संस्कृति से जुड़ाव ही भविष्य की मजबूती
पुष पुनी परब जैसे पर्व हमें अपनी पहचान और विरासत से जोड़ते हैं। जब गांव, समाज और नई पीढ़ी एक साथ खड़ी होती है, तभी संस्कृति जीवित रहती है। ऐसे आयोजनों में भाग लेकर सामाजिक एकता को मजबूत करें और अपनी परंपराओं पर गर्व करें।






