
#जयंती_विशेषांक #हिंदी_साहित्य : प्रगतिशील चेतना के लेखक रांगेय राघव की जयंती पर साहित्यिक अवदान का स्मरण।
हिंदी साहित्य के प्रगतिशील आंदोलन के प्रमुख स्तंभ रांगेय राघव की जयंती पर उनके रचनात्मक योगदान को याद किया जा रहा है। सामाजिक अन्याय, शोषण और हाशिए के समाज की आवाज़ को साहित्य का विषय बनाने वाले रांगेय राघव ने अल्पायु में ही असाधारण सृजन किया। उनका लेखन आज भी सामाजिक प्रतिबद्धता का उदाहरण है।
- रांगेय राघव का जन्म 17 जनवरी 1923 को आगरा में हुआ।
- मूल नाम त्र्यंबक वीरराघवाचार्य, मात्र 39 वर्ष की आयु में निधन।
- साहित्य को सामाजिक परिवर्तन का माध्यम बनाने वाले प्रगतिशील लेखक।
- उपन्यास, कहानी, नाटक, आलोचना सहित लगभग सभी विधाओं में योगदान।
- आदिवासी, मजदूर, दलित और हाशिए के समाज की सशक्त आवाज़।
रांगेय राघव हिन्दी साहित्य के उन विरल रचनाकारों में हैं, जिनके लिए लेखन केवल सौंदर्य-बोध की साधना नहीं, बल्कि सामाजिक परिवर्तन का औज़ार था। उनकी जयंती पर उन्हें स्मरण करना दरअसल उस साहित्यिक परंपरा को नमन करना है, जिसने शोषित, वंचित और हाशिए पर खड़े समाज को शब्द, स्वर और साहस दिया। रांगेय राघव हिन्दी के प्रगतिशील विचारों के ऐसे लेखक थे, जिनकी कलम सत्ता, अन्याय और सामाजिक असमानताओं के विरुद्ध लगातार संघर्षरत रही।
जीवन परिचय और साहित्यिक यात्रा
रांगेय राघव का जन्म 17 जनवरी 1923 को आगरा में हुआ। उनका मूल नाम त्र्यंबक वीरराघवाचार्य था। अत्यंत अल्प आयु में उन्होंने साहित्य के क्षेत्र में जो गहन और व्यापक कार्य किया, वह आज भी चकित करता है। मात्र 39 वर्ष की आयु में उनका निधन हो गया, किंतु इस छोटे से जीवनकाल में उन्होंने उपन्यास, कहानी, नाटक, आलोचना, निबंध और इतिहास—लगभग सभी विधाओं में अमिट छाप छोड़ी।
सामाजिक यथार्थ से जुड़ा साहित्य
प्रगतिशील आंदोलन से गहराई से जुड़े रांगेय राघव का साहित्य सामाजिक यथार्थ की ठोस जमीन पर खड़ा है। उन्होंने साहित्य को कल्पना की उड़ान तक सीमित नहीं रखा, बल्कि उसे खेतों, खदानों, आदिवासी अंचलों, मजदूर बस्तियों और दलित जीवन की कठोर सच्चाइयों से जोड़ा। उनके पात्र आदर्श नहीं, बल्कि संघर्षरत मनुष्य हैं—जो भूख, अपमान, शोषण और अन्याय के बीच भी अपनी मनुष्यता बचाए रखने की कोशिश करते हैं।
उपन्यासों में संघर्ष की अभिव्यक्ति
रांगेय राघव के उपन्यास हिन्दी साहित्य की अमूल्य धरोहर हैं। ‘कब तक पुकारूँ’ में आदिवासी जीवन और उसके शोषण का जो मार्मिक चित्रण मिलता है, वह आज भी पाठक को विचलित करता है। यह उपन्यास बताता है कि विकास और सभ्यता के नाम पर सबसे अधिक चोट हमेशा कमजोर वर्गों पर ही पड़ती है। ‘मुर्दों का टीला’ इतिहास और यथार्थ का ऐसा संयोजन है, जिसमें अतीत वर्तमान से संवाद करता है। ‘सीधा-साधा रास्ता’ और ‘प्रतिदिन’ जैसे उपन्यास आम आदमी की टूटती उम्मीदों और रोज़मर्रा के संघर्षों का दस्तावेज़ हैं।
कहानी और नाटक में सामाजिक हस्तक्षेप
कहानी विधा में भी रांगेय राघव का योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण है। ‘गदल’, ‘देवदासी’, ‘पाँच गधे’ जैसी कहानियाँ सामाजिक ढांचे की क्रूर सच्चाइयों को बेनकाब करती हैं। उनकी कहानियों में ग्रामीण जीवन, जातिगत भेदभाव, स्त्री-शोषण और आर्थिक विषमता का सशक्त चित्रण मिलता है। वे कहानी को मनोरंजन का साधन नहीं, बल्कि सामाजिक हस्तक्षेप का माध्यम मानते थे।
नाटक के क्षेत्र में ‘रामानुज’ जैसे नाटकों के माध्यम से उन्होंने भक्ति आंदोलन के भीतर मौजूद सामाजिक चेतना को उजागर किया और इतिहास को वर्तमान के सवालों से जोड़ा।
आलोचक और विचारक के रूप में योगदान
एक आलोचक और विचारक के रूप में भी रांगेय राघव का स्थान अत्यंत महत्वपूर्ण है। ‘प्रगतिशील साहित्य के मानदंड’ और ‘भारतीय पुनर्जागरण की भूमिका’ जैसी कृतियों में उन्होंने साहित्य और समाज के संबंधों पर गंभीर विमर्श किया। वे मानते थे कि जो साहित्य शोषण और अन्याय पर मौन रहता है, वह अपने सामाजिक दायित्व से पलायन करता है।
भाषा, दृष्टि और प्रासंगिकता
रांगेय राघव की भाषा सरल, सशक्त और प्रभावशाली है। उसमें न अनावश्यक क्लिष्टता है और न कृत्रिम सौंदर्य। उनका लेखन यह सिखाता है कि प्रगतिशीलता कोई नारा नहीं, बल्कि मनुष्य को केंद्र में रखकर सोचने की दृष्टि है। मार्क्सवादी विचारधारा से प्रभावित होने के बावजूद उन्होंने भारतीय समाज की विशिष्ट परिस्थितियों को समझते हुए अपने विचार विकसित किए।
अल्पायु, विराट सृजन
रांगेय राघव का निधन 12 सितंबर 1962 को मुंबई में हुआ। मात्र 39 वर्ष की आयु में डेढ़ सौ से अधिक कृतियां देकर उन्होंने साहित्य जगत को आश्चर्यचकित कर दिया। उपन्यास, कहानी, कविता, आलोचना, नाटक, रिपोर्ताज, इतिहास, संस्कृति, समाजशास्त्र और अनुवाद—लगभग हर विधा में उनकी लेखनी सक्रिय रही।
न्यूज़ देखो: रांगेय राघव की साहित्यिक प्रासंगिकता
रांगेय राघव का साहित्य आज के समय में भी सामाजिक जिम्मेदारी की याद दिलाता है। बाजार और सतही लोकप्रियता के दबाव में उनकी रचनाएँ यह प्रश्न उठाती हैं कि साहित्य का असली मूल्य क्या है। उनकी विरासत बताती है कि लेखन का उद्देश्य केवल अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि समाज से संवाद और हस्तक्षेप भी है। हर खबर पर रहेगी हमारी नजर।
साहित्य जब समाज से सवाल करता है
रांगेय राघव की जयंती केवल स्मरण का अवसर नहीं, बल्कि आत्ममंथन का भी समय है। उनके उठाए सवाल आज भी हमारे सामने खड़े हैं। ऐसे लेखकों को पढ़ना, समझना और साझा करना सामाजिक जिम्मेदारी का हिस्सा है। इस लेख को साझा करें, अपने विचार रखें और साहित्य को समाज से जोड़ने की इस परंपरा को आगे बढ़ाएं।






