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गिरिडीह में आम हड़ताल के दौरान चक्का जाम, भाकपा माले नेताओं ने केंद्र की नीतियों के खिलाफ उठाई आवाज

#गिरिडीह #आम_हड़ताल : चतरो मोड़ से महुआटांड़ तक मार्च, पुलिस वार्ता से बहाल हुई व्यवस्था।

गिरिडीह के मुफ्फसिल थाना क्षेत्र में अखिल भारतीय आम हड़ताल के समर्थन में भाकपा माले और विभिन्न जनसंगठनों ने चतरो मोड़ और टुंडी रोड के पास सड़क जाम कर प्रदर्शन किया। चतरो मोड़ से महुआटांड़ ऑफिस तक प्रतिवाद मार्च निकाला गया और श्रम व ग्रामीण रोजगार नीतियों के विरोध में नारे लगाए गए। एंबुलेंस सहित इमरजेंसी सेवाओं को विशेष छूट दी गई। थाना प्रभारी श्याम किशोर महतो की सकारात्मक वार्ता के बाद यातायात सामान्य हुआ।

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  • चतरो मोड़, टुंडी रोड पर घंटों जाम।
  • भाकपा माले के आह्वान पर प्रतिवाद मार्च।
  • चार लेबर कोड और मनरेगा मुद्दे पर विरोध।
  • श्याम किशोर महतो, थाना प्रभारी की पहल से बहाल व्यवस्था।
  • सैकड़ों ग्रामीणों और महिला प्रतिभागियों की मौजूदगी।

गिरिडीह जिले के मुफ्फसिल क्षेत्र में आम हड़ताल के समर्थन में विभिन्न संगठनों और ग्रामीणों ने सड़क पर उतरकर विरोध प्रदर्शन किया। चतरो मोड़ और टुंडी रोड के समीप मुख्य सड़क को जाम कर केंद्र सरकार की श्रम और ग्रामीण रोजगार से जुड़ी नीतियों पर सवाल उठाए गए। प्रदर्शन में किसान, मजदूर, महिलाएं, छात्र और युवा बड़ी संख्या में शामिल हुए। हालांकि आंदोलन के दौरान आपातकालीन सेवाओं को बाधित नहीं किया गया और एंबुलेंस को साइड से निकाला जाता रहा।

चतरो मोड़ से महुआटांड़ तक निकला प्रतिवाद मार्च

भाकपा माले के आह्वान पर चतरो मोड़ से महुआटांड़ ऑफिस तक प्रतिवाद मार्च निकाला गया। इसके बाद बेंगाबाद-चतरो मुख्य सड़क को घंटों जाम रखा गया। प्रदर्शनकारियों ने “चार लेबर कोड वापस लो”, “मनरेगा खत्म करने की साजिश बंद करो” और “मजदूरों के अधिकारों पर हमला नहीं चलेगा” जैसे नारे लगाए।

प्रदर्शनकारियों का कहना था कि चार नए श्रम कानून मजदूर वर्ग के अधिकारों को कमजोर करते हैं और रोजगार सुरक्षा पर असर डालते हैं। ग्रामीणों ने मनरेगा में संभावित बदलाव और वीबीग्रामजी योजना को लेकर भी आपत्ति जताई।

नेताओं ने रखी अपनी बात

अखिल भारतीय किसान महासभा के नेता पूरन महतो प्रदर्शन स्थल पर पहुंचे और हड़ताल को सफल बताया।

पूरन महतो ने कहा: “आज की आम हड़ताल को व्यापक समर्थन मिला है। किसान और मजदूर अपने अधिकारों को लेकर जागरूक हैं और नीतिगत बदलाव की मांग कर रहे हैं।”

माले नेता राजेश सिन्हा और असंगठित मजदूर मोर्चा के नेता कन्हाई पांडेय ने श्रम कानूनों और कृषि नीति को लेकर विरोध जताया।

राजेश सिन्हा ने कहा: “चार लेबर कोड मजदूरों के संगठन और संघर्ष के अधिकार को प्रभावित करते हैं।”

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कन्हाई पांडेय ने कहा: “किसानों और मजदूरों के मुद्दों पर सरकार को पुनर्विचार करना चाहिए।”

माले नेता मेहताब अली मिर्जा और शेखर सिंह ने कहा कि वे नीतिगत बदलाव के लिए आंदोलन जारी रखेंगे।

मनरेगा और वीबीग्रामजी योजना पर सवाल

प्रखंड सचिव कामरेड मसूदन कोल ने ग्रामीण रोजगार को लेकर चिंता जताई।

मसूदन कोल ने कहा: “मनरेगा ग्रामीण गरीबों के लिए महत्वपूर्ण योजना है। इसमें बदलाव से गांवों की आजीविका प्रभावित हो सकती है।”

उन्होंने कहा कि ग्रामीण रोजगार से जुड़े अधिकारों पर किसी भी प्रकार के प्रभाव को लेकर आंदोलन जारी रहेगा।

पुलिस प्रशासन की पहल

सड़क जाम के कारण कुछ समय के लिए यातायात बाधित हुआ, लेकिन एंबुलेंस और अन्य इमरजेंसी सेवाओं को विशेष छूट दी गई। मुफ्फसिल थाना प्रभारी श्याम किशोर महतो मौके पर पहुंचे और आंदोलनकारियों से सकारात्मक वार्ता की। बातचीत के बाद जाम समाप्त किया गया और आवागमन सामान्य हो गया।

बड़ी संख्या में ग्रामीणों की भागीदारी

चक्का जाम आंदोलन में झारखंड मजदूर किसान सभा सहित सैकड़ों ग्रामीण मजदूर और किसान शामिल हुए।

मौजूद लोगों में हेमंती देवी, ललिता देवी, सरिता देवी, शांति देवी, सुनीता देवी, सुमंति देवी, कौशल्या देवी, बुधनी देवी, सनातन साहु, कन्हाय पाण्डेय, किशोर राय, गुलाब कोल्ह, भीम कोल्ह, मसूदन कोल, चंदन टुडू, नवीन पाण्डेय, राजेश कुमार दास, मोनू दास, किरचू कोल्ह सहित कई अन्य लोग शामिल रहे।

न्यूज़ देखो: विरोध की आवाज और संवाद की जरूरत

गिरिडीह में हुआ यह प्रदर्शन दर्शाता है कि श्रम और ग्रामीण रोजगार के मुद्दों पर जमीनी स्तर पर असंतोष मौजूद है। लोकतंत्र में विरोध दर्ज कराना नागरिकों का अधिकार है, वहीं प्रशासनिक संवाद भी उतना ही आवश्यक है। इमरजेंसी सेवाओं को जारी रखना और वार्ता के बाद स्थिति सामान्य होना संतुलन की दिशा में कदम माना जा सकता है। अब यह देखना होगा कि क्या इन मुद्दों पर व्यापक स्तर पर संवाद और समाधान की प्रक्रिया आगे बढ़ती है।
हर खबर पर रहेगी हमारी नजर।

जागरूक नागरिक बनें, जिम्मेदार लोकतंत्र गढ़ें

लोकतंत्र में हर आवाज की अहमियत होती है। जब किसान, मजदूर और युवा सड़कों पर उतरते हैं, तो यह संकेत होता है कि नीतियों पर चर्चा की जरूरत है।

साथ ही यह भी जरूरी है कि विरोध और व्यवस्था के बीच संतुलन बना रहे, ताकि आम जनजीवन प्रभावित न हो।

आप इस विषय पर क्या सोचते हैं? अपनी राय कमेंट में जरूर लिखें। खबर को साझा करें ताकि अधिक से अधिक लोग तथ्यों से अवगत हों और सकारात्मक संवाद को बढ़ावा मिले।

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Saroj Verma

दुमका/देवघर

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