#आनंदपुर #सामूहिकअस्थिविसर्जन : शिवरात्रि पूर्व तुपोनी घाट पर विधि-विधान से सम्पन्न हुआ पारंपरिक अनुष्ठान।
पश्चिम सिंहभूम जिले के आनंदपुर प्रखंड अंतर्गत समीज गांव स्थित कोयल–कारो संगम के तुपोनी घाट पर संथाल समुदाय द्वारा सामूहिक अस्थि विसर्जन किया गया। 52 मौजा के ग्रामीणों की उपस्थिति में पूर्वजों की अस्थियां विधिपूर्वक संगम जलधारा में प्रवाहित की गईं। यह परंपरा वर्ष 1955 से निरंतर निभाई जा रही है।
- समीज गांव के तुपोनी घाट पर संथाल समुदाय का सामूहिक आयोजन।
- आनंदपुर व मनोहरपुर क्षेत्र के 52 मौजा के ग्रामीणों की सहभागिता।
- नायके (पुजारी) सोनाराम किस्कू ने सम्पन्न कराई विधि-विधान से पूजा।
- पीड़ पारगना अनिल सोरेन ने 1955 से चली आ रही परंपरा की दी जानकारी।
- अग्नि संस्कार व दफन, दोनों परंपराओं के अनुसार अस्थि विसर्जन की प्रक्रिया।
पश्चिम सिंहभूम जिले के आनंदपुर प्रखंड में समीज गांव स्थित कोयल–कारो संगम के तुपोनी घाट पर शुक्रवार की शाम संथाल समुदाय द्वारा सामूहिक अस्थि विसर्जन कार्यक्रम आयोजित किया गया। इस दौरान आनंदपुर और मनोहरपुर क्षेत्र के 52 मौजा के ग्रामीण, मांझी तथा समाज के अन्य पदाधिकारी बड़ी संख्या में उपस्थित हुए। सभी ने विधिपूर्वक पूजा-अर्चना कर पूर्वजों की अस्थियों को संगम की पवित्र जलधारा में प्रवाहित किया।
कार्यक्रम से पूर्व समीज के मुक्ति टोला से ग्रामीण गाजे-बाजे के साथ जुलूस की शक्ल में तुपोनी घाट पहुंचे। पारंपरिक वेशभूषा और धार्मिक आस्था के साथ यह आयोजन पूरी श्रद्धा और अनुशासन के साथ सम्पन्न हुआ। नायके (पुजारी) सोनाराम किस्कू ने विधिवत पूजा प्रक्रिया संपन्न कराई और पूर्वजों को सामूहिक श्रद्धांजलि अर्पित की गई।
शिवरात्रि पूर्व निर्धारित तिथि पर निभाई जाती है परंपरा
पीड़ पारगना अनिल सोरेन ने बताया कि संथाल समुदाय में सामूहिक अस्थि विसर्जन की यह परंपरा वर्ष 1955 से चली आ रही है। उन्होंने कहा कि शिवरात्रि से पूर्व एक निश्चित तिथि तय कर समाज के सभी लोगों को इसकी सूचना दी जाती है, ताकि अधिक से अधिक परिवार इस अनुष्ठान में भाग ले सकें।
उन्होंने बताया कि समाज के कुछ परिवार निजी रूप से भी श्राद्धकर्म के दौरान अस्थि विसर्जन करते हैं, लेकिन आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों को सुविधा देने के उद्देश्य से सामूहिक आयोजन की परंपरा शुरू की गई थी। इससे सामाजिक एकता भी मजबूत होती है और सभी परिवार समान रूप से इस धार्मिक कर्तव्य का निर्वहन कर पाते हैं।
अग्नि संस्कार और दफन दोनों की परंपरा
अनिल सोरेन ने जानकारी दी कि संथाल समुदाय में अग्नि संस्कार (शवदाह) और दफनाने, दोनों परंपराएं प्रचलित हैं। अग्नि संस्कार के बाद अस्थियों को सुरक्षित रखा जाता है और सामूहिक कार्यक्रम में उनका विसर्जन किया जाता है।
वहीं जिनका दफन संस्कार किया जाता है, उनके शरीर में सिक्के को स्पर्श कर सुरक्षित रख लिया जाता है। बाद में उसी सिक्के को अस्थि के रूप में मानकर संगम में विसर्जित किया जाता है। यह परंपरा पूर्वजों के प्रति सम्मान और स्मरण का प्रतीक मानी जाती है।
बड़ी संख्या में गणमान्य रहे उपस्थित
इस अवसर पर पीड़ परगना अनिल सोरेन, सुधीर मरांडी, किशुन मांझी, राजेश हेम्ब्रोम, छप्पन हांसदा, सुरेश मांझी सहित मुक्ति टोला, जोरोबाड़ी, पहाड़डीहा, डुमिरता, सिमेरता, सलाई आदि गांवों के पाहन, पुजारी और ग्रामीण उपस्थित थे। आयोजन शांतिपूर्ण वातावरण में सम्पन्न हुआ और पूरे क्षेत्र में धार्मिक आस्था का माहौल बना रहा।
संगम स्थल पर उपस्थित ग्रामीणों ने पूर्वजों की स्मृति में सामूहिक प्रार्थना की और समाज की सुख-समृद्धि की कामना की।
न्यूज़ देखो: परंपरा से जुड़ी सामाजिक एकजुटता
सामूहिक अस्थि विसर्जन केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि सामाजिक समरसता का प्रतीक भी है। आर्थिक समानता और सामूहिक सहभागिता की भावना इस परंपरा को विशेष बनाती है। आधुनिक समय में भी ऐसी परंपराएं समुदाय की पहचान और एकता को मजबूत करती हैं।
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