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प्रकृति, नवजीवन और संस्कृति का प्रतीक सरहुल पर्व, समाज को जोड़ने का देता संदेश

#खलारी #सरहुलपर्व : आदिवासी नववर्ष के रूप में प्रकृति और आस्था का महोत्सव मनाया जाता है।

खलारी प्रखंड में आदिवासी समाज के लेखक लहसन भोगता ने सरहुल पर्व के महत्व को विस्तार से बताया। उन्होंने इसे प्रकृति, नवजीवन और सामाजिक एकता का प्रतीक पर्व बताया। इस दौरान सरहुल की परंपराओं, पूजा-विधि और सांस्कृतिक महत्व की जानकारी साझा की गई। यह पर्व आदिवासी समाज की आस्था और पर्यावरण से जुड़ाव को दर्शाता है।

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  • खलारी प्रखंड में लहसन भोगता ने सरहुल पर्व का महत्व बताया।
  • सरहुल को आदिवासी नववर्ष और प्रकृति का महापर्व बताया गया।
  • सखुआ वृक्ष और सरना स्थल में पूजा की विशेष परंपरा।
  • पाहन द्वारा पूजा, बलि और अच्छी फसल की कामना की जाती है।
  • नृत्य, गीत और सामूहिक भोज से सामाजिक एकता मजबूत होती है।

खलारी प्रखंड में सरहुल पर्व को लेकर आदिवासी समाज के बीच गहरी आस्था और उत्साह देखने को मिल रहा है। इस अवसर पर समाज के लेखक एवं चिंतक लहसन भोगता ने सरहुल पर्व के धार्मिक, सांस्कृतिक और सामाजिक महत्व को विस्तार से बताया। उन्होंने कहा कि यह पर्व केवल एक उत्सव नहीं, बल्कि प्रकृति के साथ मनुष्य के गहरे संबंध को दर्शाने वाला अवसर है।

सरहुल पर्व को आदिवासी समाज का नववर्ष माना जाता है, जो चैत्र माह में मनाया जाता है। इस दौरान लोग प्रकृति के प्रति अपनी कृतज्ञता व्यक्त करते हैं और नए जीवन की शुरुआत का स्वागत करते हैं। यह पर्व समाज को एकजुट करने के साथ-साथ पर्यावरण संरक्षण का भी संदेश देता है।

सरहुल पर्व का अर्थ और सांस्कृतिक महत्व

लहसन भोगता ने बताया कि ‘सरहुल’ शब्द ‘सर’ और ‘हुल’ से मिलकर बना है। ‘सर’ का अर्थ सरई या सखुआ वृक्ष होता है, जबकि ‘हुल’ का अर्थ क्रांति या परिवर्तन होता है। इस प्रकार सरहुल प्रकृति में नए जीवन और बदलाव का प्रतीक है।

लहसन भोगता ने कहा: “सरहुल पर्व प्रकृति का महापर्व है, जो नवजीवन, एकता और सांस्कृतिक विरासत को मजबूत करता है।”

उन्होंने कहा कि इस पर्व में धरती माता, आकाश पिता, सूर्य देव (सिंगबोंगा) और पेड़-पौधों की पूजा की जाती है। यह परंपरा आदिवासी समाज की प्रकृति के प्रति गहरी आस्था और सम्मान को दर्शाती है।

सरना स्थल और पूजा-विधि की परंपरा

सरहुल पर्व का मुख्य केंद्र सरना स्थल होता है, जो सखुआ वृक्षों का पवित्र उपवन होता है। यही स्थान आदिवासी आस्था का केंद्र माना जाता है, जहां ग्राम देवता, पूर्वजों और प्रकृति शक्तियों की पूजा की जाती है।

गांव के पुजारी, जिन्हें ‘पाहन’ कहा जाता है, विधि-विधान से पूजा-अर्चना करते हैं। इस दौरान मुर्गा या बकरे की बलि दी जाती है और गांव की सुख-शांति, अच्छी फसल तथा समय पर वर्षा की कामना की जाती है।

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फूलखोसी और परंपरागत रस्मों का महत्व

सरहुल पर्व में सखुआ फूल का विशेष महत्व होता है। इस फूल को प्रसाद के रूप में बांटा जाता है और ‘फूलखोसी’ की परंपरा निभाई जाती है, जिसमें घर-घर जाकर लोगों को यह प्रसाद दिया जाता है।

इसके साथ ही सामूहिक उपवास, जल स्रोतों की सफाई और धार्मिक अनुष्ठानों का आयोजन किया जाता है। यह परंपराएं समाज में स्वच्छता, अनुशासन और एकता को बढ़ावा देती हैं।

नृत्य, गीत और सामूहिक उत्सव

सरहुल पर्व का एक महत्वपूर्ण हिस्सा पारंपरिक नृत्य और गीत होते हैं। मांदर, ढोल और नगाड़ों की थाप पर जदुर और झूमर नृत्य प्रस्तुत किया जाता है, जिससे पूरा वातावरण उत्सवमय हो उठता है।

इस दौरान लोग पारंपरिक परिधान पहनकर एक साथ नृत्य करते हैं और हड़िया-दारू के साथ सामूहिक भोज का आनंद लेते हैं। यह आयोजन सामाजिक एकता और भाईचारे को मजबूत करता है।

सामाजिक जीवन में सरहुल का महत्व

लहसन भोगता ने बताया कि सरहुल पर्व के बाद ही गांवों में विवाह जैसे मांगलिक कार्यों की शुरुआत होती है। यह पर्व न केवल धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि सामाजिक जीवन में भी इसकी खास भूमिका है।

यह पर्व लोगों को अपनी संस्कृति और परंपराओं से जोड़ता है और नई पीढ़ी को अपनी विरासत के प्रति जागरूक करता है। साथ ही यह प्रकृति संरक्षण और सामूहिक जीवन के महत्व को भी रेखांकित करता है।

न्यूज़ देखो: प्रकृति से जुड़ाव और संस्कृति संरक्षण का संदेश

सरहुल पर्व हमें यह सिखाता है कि प्रकृति के बिना जीवन संभव नहीं है और उसकी रक्षा करना हम सभी की जिम्मेदारी है। लहसन भोगता जैसे चिंतकों के विचार यह स्पष्ट करते हैं कि पारंपरिक पर्व केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि समाज को जोड़ने और जागरूक करने का माध्यम भी हैं। आज के समय में जब पर्यावरण संकट बढ़ रहा है, ऐसे पर्वों का महत्व और भी बढ़ जाता है। यह जरूरी है कि हम इन परंपराओं को समझें और आगे बढ़ाएं। हर खबर पर रहेगी हमारी नजर।

प्रकृति से जुड़ें और परंपराओं को अपनाएं

सरहुल जैसे पर्व हमें अपनी जड़ों से जुड़े रहने की प्रेरणा देते हैं। यह केवल उत्सव नहीं, बल्कि प्रकृति और समाज के प्रति हमारी जिम्मेदारी को याद दिलाने का अवसर है। हमें चाहिए कि हम अपने आसपास के पर्यावरण को सुरक्षित रखें और अपनी सांस्कृतिक धरोहर को संजोए रखें।

आप भी इस पर्व के संदेश को अपनाएं, पेड़-पौधों की रक्षा करें और समाज में एकता बनाए रखने में अपनी भूमिका निभाएं। अपनी राय कमेंट में जरूर साझा करें, इस खबर को दूसरों तक पहुंचाएं और जागरूकता फैलाने में अपना योगदान दें।

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Jitendra Giri

खलारी, रांची

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