मायापुर में पारंपरिक उल्लास के साथ मनाया गया सरहुल पर्व, मांदर की थाप पर झूमे ग्रामीण

मायापुर में पारंपरिक उल्लास के साथ मनाया गया सरहुल पर्व, मांदर की थाप पर झूमे ग्रामीण

author Jitendra Giri
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#मायापुर #सरहुल_पर्व : पारंपरिक रीति से पूजा और सांस्कृतिक नृत्य का आयोजन हुआ।

रांची जिले के खलारी प्रखंड अंतर्गत मायापुर में सरहुल पर्व पारंपरिक आस्था और उत्साह के साथ मनाया गया। झखरा स्थल पर पाहन द्वारा विधि-विधान से पूजा-अर्चना की गई और इसके बाद सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित हुए। मांदर-नगाड़ों की थाप पर ग्रामीणों ने पारंपरिक नृत्य प्रस्तुत किया। इस आयोजन ने प्रकृति संरक्षण और सामुदायिक एकता का संदेश दिया।

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  • मायापुर के झखरा स्थल पर पारंपरिक विधि से सरहुल पूजा संपन्न।
  • पाहन शिबू पाहन और खुदा गंझू ने मुर्गा बलि देकर की पूजा।
  • कार्यक्रम में मुखिया पुष्पा खलखो और अमृत भोगता रहे मुख्य अतिथि।
  • मांदर, ढोल-नगाड़ों पर पारंपरिक नृत्य से उत्सवमय माहौल।
  • ग्रामीणों के बीच खिचड़ी प्रसाद का वितरण किया गया।

खलारी प्रखंड के मायापुर गांव में प्रकृति पर्व सरहुल पूरे उत्साह, श्रद्धा और पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ मनाया गया। इस अवसर पर सुबह से ही गांव में धार्मिक और सांस्कृतिक गतिविधियों का माहौल बना रहा। ग्रामीणों ने एकजुट होकर इस पर्व को मनाया और प्रकृति के प्रति अपनी आस्था व्यक्त की। कार्यक्रम में बड़ी संख्या में लोगों की भागीदारी देखने को मिली, जिससे पूरे क्षेत्र में उत्सव जैसा वातावरण बन गया।

झखरा स्थल पर पारंपरिक पूजा-अर्चना

सरहुल पर्व की शुरुआत मायापुर स्थित झखरा स्थल से हुई, जहां पाहन शिबू पाहन और खुदा गंझू द्वारा पारंपरिक विधि-विधान के साथ पूजा-अर्चना की गई। इस दौरान मुर्गे की बलि देकर प्रकृति देवताओं की आराधना की गई।

यह पूजा सरहुल पर्व का मुख्य अनुष्ठान होता है, जिसमें प्रकृति और पेड़-पौधों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त की जाती है। ग्रामीणों ने श्रद्धा और विश्वास के साथ इस पूजा में भाग लिया।

सरहुल महोत्सव में जुटे जनप्रतिनिधि और ग्रामीण

पूजा के बाद सरहुल झखरा परिसर में महोत्सव कार्यक्रम का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में मायापुर मुखिया पुष्पा खलखो और खरवार भोगता समाज विकास संघ के जिला अध्यक्ष अमृत भोगता उपस्थित रहे।

इसके अलावा रामलखन गंझू, रामजतन गंझू, शंभूनाथ गंझू, प्रभाकर गंझू, अनिल गंझू, रामसूरत यादव, मुकेश भुइयां सहित कई गणमान्य लोग कार्यक्रम में शामिल हुए।

कार्यक्रम की अध्यक्षता चैता मुंडा ने की, जबकि संचालन राजेश गंझू द्वारा किया गया। सभी अतिथियों का सरना गमछा देकर सम्मान किया गया।

प्रकृति संरक्षण का दिया संदेश

कार्यक्रम को संबोधित करते हुए मुखिया पुष्पा खलखो ने सरहुल पर्व के महत्व पर प्रकाश डाला।

पुष्पा खलखो ने कहा: “सरहुल पर्व हमें प्रकृति से जुड़ने और उसकी रक्षा करने का संदेश देता है। पेड़-पौधे हमारे जीवन का आधार हैं, इसलिए उनकी सुरक्षा करना हम सभी की जिम्मेदारी है।”

उन्होंने ग्रामीणों से पर्यावरण संरक्षण के लिए जागरूक रहने की अपील भी की।

मांदर-नगाड़ों की थाप पर पारंपरिक नृत्य

कार्यक्रम के दौरान मायापुर, चीनाटांड़ और सरना गांव के सांस्कृतिक खोड़हा टीमों ने शानदार प्रस्तुति दी। मांदर, ढोल और नगाड़ों की थाप पर पारंपरिक नृत्य ने पूरे माहौल को उत्सवमय बना दिया।

ग्रामीणों ने भी इन प्रस्तुतियों में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया और देर शाम तक नृत्य का सिलसिला चलता रहा। अतिथियों ने भी खोड़हा टीमों के साथ नृत्य कर उत्साह को और बढ़ाया।

प्रसाद वितरण और सामूहिक सहभागिता

कार्यक्रम के अंत में समिति द्वारा ग्रामीणों के बीच खिचड़ी प्रसाद का वितरण किया गया। इस दौरान सभी ने एक साथ बैठकर प्रसाद ग्रहण किया, जो सामूहिक एकता का प्रतीक बना।

इस अवसर पर बीरबल गंझू, हुसैन खान, भोला गंझू, रामसूरत यादव, रमेश गंझू, बिगन गंझू, रवि गंझू, पौलुस मुंडा, शिवदयाल गंझू, महेंद्र गंझू, रुदन मुंडा, पिंटू लोहरा, दिलीप गंझू, रामलाल गंझू, दरबारी सिंह, देवेंद्रनाथ भगत, पुष्पा कुमारी, आशा एक्का, हिना कुमारी, रिंकी कुमारी, ललिता कुमारी, किशोरी खेस, सूरज मुंडा, डहरा गंझू, देवचरन गंझू, वीरेंद्र गंझू, वीरेंद्र मुंडा, रुपनाथ मुंडा, रमेश मुंडा सहित बड़ी संख्या में ग्रामीण मौजूद रहे।

सांस्कृतिक विरासत और एकता का प्रतीक

सरहुल पर्व आदिवासी संस्कृति का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है, जो प्रकृति के प्रति सम्मान और सामुदायिक एकता को दर्शाता है। इस आयोजन ने एक बार फिर यह साबित किया कि पारंपरिक त्योहार समाज को जोड़ने और सांस्कृतिक विरासत को जीवित रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

न्यूज़ देखो: परंपरा के साथ पर्यावरण संरक्षण का संदेश

मायापुर में सरहुल पर्व का आयोजन यह दर्शाता है कि आदिवासी संस्कृति में प्रकृति के प्रति कितना गहरा सम्मान है। ऐसे आयोजन न केवल परंपराओं को जीवित रखते हैं, बल्कि समाज को पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूक भी करते हैं। अब यह जरूरी है कि इस संदेश को केवल त्योहार तक सीमित न रखकर दैनिक जीवन में भी अपनाया जाए। हर खबर पर रहेगी हमारी नजर।

प्रकृति से जुड़ें, परंपरा को आगे बढ़ाएं

सरहुल जैसे पर्व हमें सिखाते हैं कि प्रकृति के बिना जीवन संभव नहीं है।
आइए, हम सभी मिलकर पेड़-पौधों की रक्षा करने और पर्यावरण को सुरक्षित रखने का संकल्प लें।
अपने आसपास हरियाली बढ़ाएं और दूसरों को भी इसके लिए प्रेरित करें।
पारंपरिक त्योहारों के माध्यम से समाज में एकता और जागरूकता का संदेश फैलाएं।

आप भी इस पर्व से जुड़े अपने अनुभव साझा करें, कमेंट में अपनी राय दें और इस खबर को अधिक से अधिक लोगों तक पहुंचाकर प्रकृति संरक्षण का संदेश फैलाएं।

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Written by

खलारी, रांची

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