
#बानो #सिमडेगा #सरहुल_उत्सव : जराकेल सरना में पारंपरिक रीति से मनाया गया प्रकृति महापर्व।
सिमडेगा जिले के बानो प्रखंड अंतर्गत जराकेल गांव में सरहुल पर्व हर्षोल्लास के साथ मनाया गया। सरना स्थल पर पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ पूजा-अर्चना और सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित हुए। कार्यक्रम में जनप्रतिनिधियों और ग्रामीणों की सक्रिय भागीदारी देखने को मिली। सरहुल पर्व के माध्यम से प्रकृति संरक्षण और सामाजिक एकता का संदेश दिया गया।
- जराकेल सरना स्थल पर सरहुल पर्व पारंपरिक रीति से मनाया गया।
- बिरजो कुंडलना, सुधीर डांग, सनिका मुंडा समेत कई अतिथि रहे उपस्थित।
- सांस्कृतिक नृत्य प्रतियोगिता में पाहन टोली जराकेल रही प्रथम।
- सबाटोली और बगीचा टोली ने क्रमशः द्वितीय व तृतीय स्थान प्राप्त किया।
- तीरंदाजी प्रतियोगिता आयोजन की घोषणा अगले वर्ष के लिए की गई।
सिमडेगा जिले के बानो प्रखंड के कानारोवां पंचायत अंतर्गत जराकेल गांव में आदिवासी समाज का प्रमुख प्रकृति पर्व सरहुल पूरे उत्साह और पारंपरिक आस्था के साथ मनाया गया। सरना स्थल पर आयोजित इस कार्यक्रम में बड़ी संख्या में आदिवासी मूलवासी समुदाय के लोग शामिल हुए और सामूहिक रूप से पर्व का आनंद उठाया।
कार्यक्रम की शुरुआत पारंपरिक पूजा-अर्चना से हुई, जिसमें प्रकृति और ग्राम देवताओं के प्रति आस्था व्यक्त की गई। इसके बाद सांस्कृतिक गीत-संगीत और नृत्य कार्यक्रमों ने पूरे वातावरण को उत्सवमय बना दिया। ग्रामीणों ने पारंपरिक वेशभूषा में मांदर और ढोल की थाप पर नृत्य कर सरहुल पर्व की खुशियां मनाईं।
अतिथियों की उपस्थिति और सरहुल का महत्व
कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में जिला परिषद सदस्य बिरजो कुंडलना, प्रमुख सुधीर डांग, पड़हा महाराज सनिका मुंडा, मुखिया मिन्सी लीना तिर्की, बिरसा पाहन, लोक गायक रूपेश बड़ाइक एवं विकास मघैया उपस्थित रहे। सभी अतिथियों का स्वागत मुखिया और पाहन द्वारा पारंपरिक तरीके से किया गया।
अतिथियों ने कहा: “सरहुल पर्व प्रकृति पूजा और सामाजिक एकता का प्रतीक है, जो हमें अपनी संस्कृति से जुड़े रहने की प्रेरणा देता है।”
वक्ताओं ने अपने संबोधन में सरहुल के ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्व पर प्रकाश डालते हुए इसे प्रकृति और समाज के बीच संतुलन का प्रतीक बताया।
सांस्कृतिक प्रतियोगिता में दिखी प्रतिभा
कार्यक्रम के दौरान विभिन्न आदिवासी नाच मंडलियों के बीच सांस्कृतिक नृत्य प्रतियोगिता का आयोजन किया गया। इसमें पाहन टोली जराकेल ने शानदार प्रदर्शन करते हुए प्रथम स्थान प्राप्त किया। वहीं सबाटोली की मंडली द्वितीय और बगीचा टोली तृतीय स्थान पर रही।
विजेता टीमों को अतिथियों द्वारा सम्मानित किया गया। प्रतियोगिता के बाद सामूहिक नृत्य का आयोजन हुआ, जिसमें सभी ग्रामीणों ने बढ़-चढ़कर भाग लिया और पूरा वातावरण उल्लास से भर गया।
भविष्य की योजनाएं और समिति की भूमिका
इस आयोजन को लगातार दूसरे वर्ष सफलतापूर्वक संपन्न किया गया। सरहुल सरना समिति जराकेल ने आगामी वर्ष में युवाओं के लिए भगवान बिरसा मुंडा की तीरंदाजी परंपरा को बढ़ावा देने के उद्देश्य से तीरंदाजी प्रतियोगिता आयोजित करने की घोषणा की।
कार्यक्रम को सफल बनाने में समिति के अध्यक्ष प्यारा मुंडा, उपाध्यक्ष थोमस लुगुन, सचिव विलियम लुगुन, उपसचिव बिरेन डुंगडुंग, कोषाध्यक्ष गोबिंद लुगुन, संरक्षक कुलदीप सिंदुरिया, विकास मघैया, जॉर्ज सोरेंग, फागु लुगुन, अनुप सिंदुरिया, राजेश लोहरा, सदस्य लुकास मुंडा, आशीष सुखराम बुढ़, मरकुस लुगुन, नितेश डुंगडुंग, ललित सोरेंग, विद्यासागर लोहार, पिरूस लुगुन, रूपधर बड़ाइक सहित अन्य ग्रामीणों की महत्वपूर्ण भूमिका रही।
न्यूज़ देखो: संस्कृति संरक्षण की दिशा में सरहुल जैसे आयोजन अहम
जराकेल में आयोजित सरहुल कार्यक्रम यह दर्शाता है कि पारंपरिक संस्कृति को सहेजने के लिए सामूहिक प्रयास कितने महत्वपूर्ण हैं। ऐसे आयोजन न केवल संस्कृति को जीवित रखते हैं, बल्कि युवाओं को अपनी जड़ों से जोड़ने का काम भी करते हैं। क्या इस तरह के प्रयास हर गांव में नियमित हो पाएंगे? हर खबर पर रहेगी हमारी नजर।
अपनी संस्कृति से जुड़ें, परंपराओं को आगे बढ़ाएं
सरहुल जैसे पर्व हमें अपनी जड़ों से जोड़ते हैं और हमें अपनी पहचान का अहसास कराते हैं।
आइए हम सभी मिलकर अपनी संस्कृति, परंपराओं और प्रकृति के संरक्षण का संकल्प लें।
युवाओं को अपनी विरासत से जोड़ें और उन्हें ऐसे आयोजनों में सक्रिय भागीदारी के लिए प्रेरित करें।
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