#महुआडांड़ #सरहुल_पर्व : जामडीह गांव में पारंपरिक रस्मों के साथ सरहुल और रंगोत्सव मनाया गया।
लातेहार जिले के महुआडांड़ प्रखंड अंतर्गत जामडीह गांव में 03 मार्च 2026 को पारंपरिक धाईध काटने की रस्म के साथ सरहुल पर्व की शुरुआत की गई। गांव के पहान और बुजुर्गों की उपस्थिति में पूजा-अर्चना कर प्रकृति और ग्राम देवताओं से सुख-समृद्धि की कामना की गई। अगले दिन 04 मार्च को आदिवासी समाज ने पारंपरिक नृत्य-गान के साथ सरहुल पर्व मनाया, जबकि गैर आदिवासी समाज ने रंगोत्सव का आयोजन किया।
- जामडीह गांव, महुआडांड़ (लातेहार) में 03 मार्च 2026 को धाईध काटने की परंपरागत रस्म संपन्न।
- गांव के पहान और बुजुर्गों की उपस्थिति में प्रकृति और ग्राम देवताओं की पूजा-अर्चना।
- 04 मार्च 2026 को आदिवासी समाज ने पूरे उत्साह के साथ मनाया सरहुल पर्व।
- अखड़ा में पारंपरिक नृत्य-गान, मांदर और नगाड़ों की थाप पर झूमे ग्रामीण।
- गैर आदिवासी समाज ने भी रंगोत्सव (होली) मनाकर दिया भाईचारे और सौहार्द का संदेश।
लातेहार जिले के महुआडांड़ प्रखंड स्थित जामडीह गांव में इस वर्ष भी आदिवासी परंपरा और सांस्कृतिक विरासत की जीवंत झलक देखने को मिली। 03 मार्च 2026 को गांव में पारंपरिक धाईध काटने की रस्म पूरी की गई, जिसके साथ ही सरहुल पर्व के उत्सव की शुरुआत हो गई। गांव के पहान और समाज के बुजुर्गों की मौजूदगी में यह धार्मिक अनुष्ठान विधि-विधान के साथ संपन्न हुआ। इस अवसर पर ग्रामीणों ने प्रकृति, ग्राम देवी-देवताओं और धरती माता की पूजा-अर्चना कर गांव की खुशहाली, अच्छी फसल और सुख-समृद्धि की कामना की। अगले दिन 04 मार्च को पूरे गांव में सरहुल पर्व उत्साह और श्रद्धा के साथ मनाया गया।
धाईध काटने की परंपरा से शुरू होता है सरहुल उत्सव
आदिवासी समाज की मान्यताओं के अनुसार सरहुल पर्व की शुरुआत धाईध काटने की रस्म से होती है। यह रस्म प्रकृति और धरती के प्रति आभार व्यक्त करने की प्रतीक मानी जाती है। जामडीह गांव में भी यह परंपरा वर्षों से निभाई जा रही है।
03 मार्च 2026 को गांव के पहान और समाज के बुजुर्गों की मौजूदगी में यह रस्म पूरी की गई। पूजा-अर्चना के दौरान प्रकृति देवता और ग्राम देवी-देवताओं से गांव की समृद्धि, खेतों में अच्छी फसल और समाज में शांति की प्रार्थना की गई। इस दौरान गांव के लोग पारंपरिक वेशभूषा में उपस्थित रहे और पूरे वातावरण में धार्मिक और सांस्कृतिक उत्साह देखने को मिला।
सरहुल पर्व पर अखड़ा में गूंजे पारंपरिक गीत और नृत्य
धाईध काटने की रस्म के अगले दिन 04 मार्च 2026 को जामडीह गांव में सरहुल पर्व पूरे उत्साह के साथ मनाया गया। सरहुल आदिवासी समाज का प्रमुख प्रकृति पर्व है, जिसमें साल वृक्ष और प्रकृति की पूजा कर नए मौसम और नई फसल के आगमन का स्वागत किया जाता है।
इस अवसर पर गांव के अखड़ा में पारंपरिक नृत्य और गीतों का आयोजन किया गया। युवक-युवतियों के साथ-साथ बुजुर्गों ने भी इस कार्यक्रम में बढ़-चढ़कर भाग लिया। मांदर और नगाड़ों की थाप पर लोग पारंपरिक नृत्य करते हुए झूमते नजर आए। पूरे गांव में उत्सव का वातावरण बना रहा।
ग्रामीणों ने बताया कि सरहुल पर्व उनके जीवन में प्रकृति के प्रति सम्मान और सामुदायिक एकता का प्रतीक है। यह पर्व लोगों को अपनी संस्कृति और परंपराओं से जुड़े रहने का संदेश देता है।
रंगोत्सव के साथ गैर आदिवासी समाज ने भी मनाई खुशियां
जामडीह गांव में जहां आदिवासी समाज सरहुल पर्व मना रहा था, वहीं गांव के गैर आदिवासी समाज के लोगों ने भी रंगोत्सव यानी होली का त्योहार बड़े ही उत्साह और हर्षोल्लास के साथ मनाया।
लोगों ने एक-दूसरे को अबीर-गुलाल लगाकर होली की शुभकामनाएं दीं और मिठाइयां बांटीं। इस अवसर पर गांव में खुशी और उल्लास का माहौल देखने को मिला। बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक सभी ने इस पर्व का आनंद लिया।
इस दौरान ग्रामीणों ने कहा कि होली और सरहुल जैसे पर्व समाज में प्रेम, भाईचारे और आपसी सौहार्द को मजबूत करने का संदेश देते हैं।
गांव में दिखी सामाजिक एकता और सांस्कृतिक समरसता
जामडीह गांव में सरहुल और रंगोत्सव के दौरान सामाजिक एकता और सांस्कृतिक समरसता की सुंदर झलक देखने को मिली। आदिवासी और गैर आदिवासी समाज के लोगों ने अपने-अपने पारंपरिक त्योहारों को मनाते हुए एक-दूसरे के प्रति सम्मान और सहयोग का भाव प्रदर्शित किया।
ग्रामीणों के अनुसार, जामडीह गांव में हर वर्ष इसी तरह पारंपरिक तरीके से सरहुल और रंगोत्सव मनाया जाता है। यह परंपरा गांव की सांस्कृतिक पहचान और सामाजिक एकता को मजबूत करने का कार्य करती है।
गांव के बुजुर्गों ने कहा कि आने वाली पीढ़ियों को भी इन परंपराओं से जोड़ना आवश्यक है, ताकि उनकी सांस्कृतिक विरासत सुरक्षित रह सके और समाज में सामूहिकता की भावना बनी रहे।
न्यूज़ देखो: परंपरा और भाईचारे का जीवंत उदाहरण बना जामडीह
महुआडांड़ के जामडीह गांव में मनाया गया सरहुल और रंगोत्सव यह दर्शाता है कि ग्रामीण समाज में परंपराएं आज भी जीवित हैं। जहां आदिवासी समाज प्रकृति की पूजा कर अपनी सांस्कृतिक पहचान को मजबूत कर रहा है, वहीं गैर आदिवासी समाज भी अपने त्योहारों को उत्साह से मनाकर सामाजिक सौहार्द का संदेश दे रहा है। ऐसे आयोजन यह साबित करते हैं कि विविधता के बीच भी समाज एकजुट रह सकता है। हर खबर पर रहेगी हमारी नजर।
संस्कृति और एकता को आगे बढ़ाने का समय
त्योहार केवल उत्सव का अवसर नहीं होते, बल्कि समाज को जोड़ने का माध्यम भी होते हैं।
सरहुल और होली जैसे पर्व हमें प्रकृति, संस्कृति और सामाजिक संबंधों का महत्व समझाते हैं।
यदि गांव और समाज मिलकर अपनी परंपराओं को जीवित रखें तो आने वाली पीढ़ियां भी अपनी पहचान और विरासत पर गर्व कर सकेंगी।
ऐसे आयोजन हमें यह सिखाते हैं कि विविधता में ही हमारी असली ताकत छिपी है।
आपके क्षेत्र में भी यदि इस तरह के सांस्कृतिक या पारंपरिक आयोजन हो रहे हैं, तो उनकी जानकारी जरूर साझा करें।
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